विष्णु नागर की रचनाएँ

चिड़िया

चिड़िया
मैं फिर कहता हूँ कि चिड़िया
अपने घोंसले से बड़ी है
घोंसले से बड़ी चिड़िया का
अपना कोई मोह नहीं होता
वह दूसरों के चुगे दोनों में
अपना त्याग बीनती है।

फालतू चीज़

घर में कोई चीज़
फालतू नहीं थी
टूटा कंघा लगता था
अमर है
भरोसा था अब खोएगा भी नहीं

घड़ी बंद थी
पुरानी थी
उस दिन से बंद थी
जिस दिन गांधीजी मरे थे
मालूम था नहीं चलेगी
मगर तब की थी
जब पिताजी विद्यार्थी थे
आंखों के सामने बार-बार आ जाती थी

और एक तलवार थी
बहुत भारी
जंग लगी
पता नहीं किस पुरखे की थी
किससे लड़ने के काम आयी थी
बेचते डर लगता था
जीवन में लौट आयेगी

सारे घर में
एक ही चीज़ फालतू थी —
दरवाजा
सबको समान रूप से रोकता था
उसे मैंने सुबह से खुला छोड़ दिया है।

हम सब

हम सब जहाँ से होते हुए जायेंगे
वहाँ कुछ देर अपनी गठरियाँ रखेंगे
तम्बाकू खायेंगे।

हम जहाँ-जहाँ जायेंगे
गठरियाँ रखेंगे
तम्बाकू खायेंगे।

मैंने सोचा

मैंने सोचा तुम्हें बहुत भूख लगी होगी
और मैंने कुछ नहीं सोचा।

हवा में

हवा में उड़ गये उसके कपड़े
उड़ने दो, हवा में उड़े हैं।

बाजा

मुझे बाजा बनाया गया
और मैं बजने से पहले ही रो दिया
क्या करँ कि मुझे बनाने वालों के दिल रोते हैं

मुझे बाजा बनाया गया
और मैं बजने से पहले ही हँस दिया
हँसने से काम नहीं चलेगा
और हँसना बाजे का काम भी नहीं
लेकिन यह हँसी उनकी है
जिनका मैं हूँ

मैं हैरान हूँ कि बाजा होते हुए भी मैं कैसे हँस दिया
मुझे हँसना नहीं चाहिए था
दरअसल यह हँसी मेरी थी भी नहीं
मैं तो सिर्फ़ इसलिए हँसा
कि यह हँसी मेरी क्यों नहीं?

मैं हैरान हुआ कि बाजा होते हुए भी
मैं अपने आप कैसे बजने लगा
और पृथ्वी ने कहा, तुम्हारे तो पाँव हैं
और हवा ने कहा, तुम्हारे तो हाथ हैं
और सिर तो मेरा ख़ुशी से झूम ही रहा था

मैं परेशान हूँ
बाजे का जीवन पाकर
यह जो कुछ मैं कर रहा हूँ
यह ठीक-ठीक है भी या नहीं?
कल मैं बोलने लगूँ
तो सब मुझे प्रेत समझकर
भागने तो नहीं लगेंगे?
मुझे गोली मार देना
मगर भागना नहीं, मुझसे मेरे लोगो

सुबह होगी अभी

मैं दिन हूँ
या रात हूँ अंधेरी
या दिन अंधेरा हूँ
रात हूँ उजेली
या दिन हूँ कि साफ़ दीखता है
या रात हूँ कि दिया जलता है
या दिन हूँ कि डूबने वाला हूँ
या रात हूँ कि सुबह होगी अभी।

वहाँ से भी आगे हूँ

मुझे दौड़ना आता है
और मैं वहाँ हूँ
मैं वहाँ भी नहीं हूँ
और वहाँ से भी आगे हूँ

मैं दौड़ रहा हूँ
और आकाश में हूँ
मैं बादलों के बीच हूँ
और दीख नहीं रहा हूँ
मैं हाँफ रहा हूँ
और पृथ्वी मेरे आसपास घूम रही है
और मैं गिरा
मैं गिरा
पृथ्वी की गोद में

फिर न कहना

मुझे पेड़ पर चढ़ाया
और मैं उड़ गया
तो न कहना
यह तो आदमी था
यह उड़ कैसे गया ?

फिर न कहना
हमारा आदमी पेड़ से उड़ गया
हमीं ने चढ़ाया था उसे

मुझे पेड़ पर चढ़ाया
तो मैं उड़ जाऊंगा निश्चित
मेरे आदमी होने पर भरोसा न करते रहना
तब मैं साइबेरिया तक जा सकता हूँ उड़के ।

मेरा एक रंग है

मेरा एक रंग है

एक तो नाकाफ़ी है वैसे
एक से तो कुछ होता नहीं
दो-तीन तो होने ही चाहिए
तीन चार हो तो बेहतर
पाँच-छह हों तो कहना ही क्या
सात-आठ तो शायद ही किसी के होते हों
और नौ-दस की तो सोचना भी फ़िजूल है

लेकिन एक रंग से कुछ होता नहीं
एक की क्या हस्ती है
एक रंग तो सभी का होता है
इसमें मेरा-तेरा क्या है
एक से ज़्यादा हो तो बात करो
एक पर दिन-रात एक मत करो

होने से बेहतर कुछ भी नहीं

एक दिन
मैंने पाया
मनुष्य होने से बेहतर कुछ नहीं

हूंगा मैं
औरों से बहुत-बहुत बुरा
हूंगा अपने वुगत से भी बुरा
फिर भी
मनुष्य होने से तो बेहतर कुछ भी नहीं

ताकतवर मारेगा
तो मैं भागूंगा
चूहे की तरह
फिर झपटूंगा
कुत्ते की तरह

एक दिन मैं कहूंगा
होने से बेहतर कुछ भी नहीं ।

कल ही मैं सोच रहा था

आज मैंने पाया
मैं क्या हूँ
कल ही मैं सोच रहा था
मैं क्या हूँ

कितनी जल्दी हर कर लिया सवाल
छुट्टी तेरी रामगोपाल।

होना चाहिए एक पत्ती

मुझे पेड़ में
होना चाहिए एक पत्ती
मुझे हवा में गिर सकना चाहिए

तो पानी निकलेगा

एक पत्थर भी मैंने तोड़ लिया
तो पानी निकलेगा

एक पत्थर भी जो उठ सकता हो
जो जवाब देता हो
जिस पर धूल बैठती हो
जो बरसात के ठीक बाद
गीला रहता हो।

वह ख़ुद नाचेगी

वह मुझे नाचने नहीं देगी
वह ख़ुद नाचेगी
क्योंकि मैं पुरुष हूँ

अभय

अभय मैं नहीं
अभय कौन है ?
अभय किसी का नाम तो नहीं !
अभय ! अभय !! अभय !!!

मैं हँसा कब

मैं तब हँसा
जब कोई नहीं हँसा
मैं हँसा ही तब
जब हर कोई हँसा
मैं हँसा कब
मैं तो घर में था !

मैं जाता क्या

मैं जाता क्या
पर मुझे बुलाया है
खाते-खाते उठवाया है

मैं जाता क्या
माया होती तो जाता
पर मुझे बुलाया है
जाते-जाते कहलवाया है

मैं जाता क्या
जाकर करता क्या
पर मुझे बुलाया है
ग़रीबी में आटा गीला करवाया है

मैं जाता क्या
मेरे जाने से होता क्या
पर मुझे बुलाया है
रास्ता तक बताया है

मैं जाता क्या
जाता तो खाता क्या
पर मुझे बुलाया है
सत्तू खिलाने का
भरोसा दिलाया है

आपका कवि !

भाइयो, बहनो
कवि
इस समय रोटी खा रहा है
और भाइयो, बहनो
आज खाना अच्छा बना है
तो
भाइयो, बहनो
कवि के इस दिन का
यह अच्छा अंत हो रहा है

मगर
भाइयो, बहनो
अब मैं यह कहने नहीं जा रहा
कि यह कवि अब गया काम से
यह कवि
आज खाने से इतना ख़ुश है
कि पान खाने
और सिगरेट पीने की भी सोच रहा है
और बहुत मुमकिन है भाइयो
आज वह कविता भी लिखे

भरोसा रखिये
कवि पर, भाइयो
आज वह अपनी खटिया पर
बच्चे को सुलाने से भी मना नहीं करेगा।

एक बूंद, एक बूंद है

मैंने पृथ्वी पर पाप की एक बूंद गिराई

क्या
पृथ्वी पर
पाप की एक बूंद
ठंडे
पारदर्शी
पानी की एक बूंद की तरह
दीखती है?

मैं बुदबुदाता हूँ
समुद्र में
एक बूंद
एक बूंद है
और धरती सिवाय समुद्र के और क्या है?

पति, पत्नी और बच्चा

बच्चे
तू हमें न देख
न देख
हम नंगे हैं
न देख
मजसद अभी अधूरा है
न देख
हम खो जाने वाले हैं
न देख
हम उड़ जाने वाले हैं
न देख
कि हमारा हुआ क्या?

आपसे पूछते हैं हम

आप हमारे घर आए हैं
आप हमारे क्या हैं?

आप हमारी आँखें हैं
कान हैं
जीभ हैं
स्वाद हैं
या सगे हैं कोई?

आप हमारे घर में बैठे आराम से
क्या आप हमारी चिन्ता हैं?
आपसे पूछते हैं हम
आप हमसे कुछ पूछते ही कहाँ हैं?

मुझे जो जान गया

मुझे जो जान गया
पेड़ से बाँध गया

मैं रोता
पर तभी
मुझे
पेड़ ने बाँध लिया।

माँ जब जगाने आई

नींद और गहरी हुई
माँ जब
जगाने आई

पेड़
हरे-हरे हुए
पहाड़
गहरे-गहरे

यही है रास्ता

यही है
रास्ता
तो चलो

धूल भी
यही होगी

मेरी किताब

मेरी किताब
किस बात ने बना दिया
इसे
मेरी किताब !

मूल्य चुकाकर
मैं हैरान हूँ !

उसने मुझे कुचला

उसने
मुझे कुचलकर
कहा –
“यह घास है”
और
आग की लपटें
उठने लगीं

दुअन्नी का आदमी

मैं दुअन्नी का आदमी
आठ आने की क़लम से
लिखता हूँ
वह भी
वर्तमान के बारे में

अखिल भारतीय लुटेरा

(१)
दिल्ली का लुटेरा था अखिल भारतीय था
फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता था
लुटनेवाला चूँकि बाहर से आया था
इसलिए फर्राटेदार हिंदी भी नहीं बोलता था
लुटेरे को निर्दोष साबित होना ही था
लुटनेवाले ने उस दिन ईश्वर से सिर्फ एक ही प्रार्थना की कि
भगवान मेरे बच्चों को इस दिल्ली में फर्राटेदार अंग्रेजी बोलनेवाला जरूर बनाए

और ईश्वर ने उसके बच्चों को तो नहीं
मगर उसके बच्चों के बच्चों को जरूर इस योग्य बना दिया।

(२)
लूट के इतने तरीके हैं
और इतने ईजाद होते जा रहे हैं
कि लुटेरों की कई जातियाँ और संप्रदाय बन गए हैं
लेकिन इनमें इतना सौमनस्य है कि
लुटनेवाला भी चाहने लगता है कि किसी दिन वह भी लुटेरा बन कर दिखाएगा।

(३)
लूट का धंधा इतना संस्थागत हो चुका है
कि लूटनेवाले को शिकायत तभी होती है
जब लुटेरा चाकू तान कर सुनसान रस्ते पर खड़ा हो जाए
वरना वह लुट कर चला आता है
और एक कप चाय लेकर टी.वी. देखते हुए
अपनी थकान उतारता है।

(४)
जरूरी नहीं कि जो लुट रहा हो
वह लुटेरा न हो
हर लुटेरा यह अच्छी तरह जानता है कि लूट का लाइसेंस सिर्फ उसे नहीं मिला है
सबको अपने-अपने ठीये पर लूटने का हक है
इस स्थिति में लुटनेवाला अपने लुटेरे से सिर्फ यह सीखने की कोशिश करता है कि
क्या इसने लूटने का कोई तरीका ईजाद कर लिया है जिसकी नकल की जा सकती है।

(५)
आजकल लुटेरे आमंत्रित करते है कि
हम लुट रहे हैं आओ हमें लूटो
फलां जगह फलां दिन फलां समय
और लुटेरों को भी लूटने चले आते हैं
ठट्ठ के ठट्ठ लोग
लुटेरे खुश हैं कि लूटने की यह तरकीब सफल रही
लूटनेवाले खुश हैं कि लुटेरे कितने मजबूर कर दिए गए हैं
कि वे बुलाते हैं और हम लूट कर सुरक्षित घर चले आते हैं।

(6)
होते-होते एक दिन इतने लुटेरे हो गए कि
फी लुटेरा एक ही लूटनेवाला बचा
और ये लुटनेवाले पहले ही इतने लुट चुके थे कि
खबरें आने लगीं कि लुटेरे आत्महत्या कर रहे हैं
इस पर इतने आँसू बहाए गए कि लुटनेवाले भी रोने लगे
जिससे इतनी गीली हो गई धरती कि हमेशा के लिए दलदली हो गई।

आहटें!

मैं क्यों अनजान बना बैठा हूँ
जैसे मुर्गा हूँ
क्यों कुकड़ू कूँ करता घूम रहा हूँ
जैसे मैं बिल्कुल बैचेन नहीं हूँ
क्यों अपनी कलगी पर कुछ ज्यादा इतराने लगा हूँ
क्यों पिंजड़े में बन्द जब कसाई की दूकान पर
ले जाया जा रहा हूँ तो
ऐसा बेपरवाह नजर आ रहा हूँ जैसे कि सैर पर जा रहा हूँ
क्यों मैं पंख फड़फड़ाने, चीखने और चुपचाप मर जाने में
इतना विश्वास करने लगा हूँ
क्यों मैं मानकर चल रहा हूँ कि मेरे जिबह होने पर
कहीं कुछ होगा नहीं
क्यों मैं खाने मे लजीज लगने की तैयारी में जुटा हूँ
क्यों मैं बेतरह नस्ल का मुर्गा बनने की प्रतियोगिता मं शामिल हूँ
और क्यों मैं आपसे चाह रहा हूँ कि कृपया आप मुझे मनुष्य ही समझे

मोदी

मोदी के घर में उसके कई सेवक हैं
उसका वहाँ कोई भाई, कोई बहन नहीं
उसके आँगन में खेलता कोई बच्चा नहीं
उसके अनुयायी लाखों में है
उसका कहने को भी कोई मित्र नहीं
वह जब आधी रात को चीख़ पड़ता है भय से काँप कर

उसे हिलाकर, जगाकर
‘क्या हुआ’, यह पूछने वाला कोई नहीं
‘कुछ नहीं हुआ’ यह उत्तर सुनने वाला कोई नहीं
ऐसा भी कोई नहीं जिसकी चिन्ता में
वह रात-रात भर जागे
ऐसा कोई नहीं
जिसकी मौत उसे दहला सके

किसी दिन उसे उलटी आ जाए
तो उसकी पीठ सहलाने वाला कोई नहीं
आधी-आधी रात जागकर
उसके दुख सुन सके, उसके सुख साझा कर सके
ऐसा कोई नहीं
कोई नहीं जो कह सके आज तो तुम्हें
कोई फ़िल्मी गाना सुनाना ही पड़ेगा
उसकी एक माँ ज़रूर हैं
जो उसे आशीर्वाद देते हुए फ़ोटो खिंचवाने के काम
जब तब आती रहती हैं

यूँ तो पूरा गुजरात उसका है
मगर उसके घर पर उसका इन्तज़ार करने वाला कोई नहीं
उसे प्रधानमन्त्री बनाने वाले तो बहुत हैं
उसको इनसान बना सके, ऐसा कोई नहीं।

एडजस्टमेण्ट

ज़िन्दगी एडजस्टमेण्ट से ही चलती है
उसी से नौकरी मिलती है, पदोन्नति होती है
मालिक या अफ़सर का विश्वास हासिल होता है
दुकान चलती है
एडजस्टमेण्ट करनेवालों की ज़िन्दगी में
तूफ़ान नहीं आते, बाढ़ नहीं आती
आ भी जाए तो नुक़्सान दूसरों का होता है

एडजस्टमेण्ट करना भला — शरीफ़ होने का लक्षण है
चरित्र का प्रमाण है
औरत का सुहाग है, तलाक़ से बचने का शर्तिया उपाय है
एडजस्टमेण्ट से ही सत्ता मिलती है, देर तक टिकती है
पैसा बनता है, लोकप्रियता मिलती है
हार्टअटैक और ब्रेन हैमरेज से बचने के लिए
डॉक्टर इसकी सलाह दिया करते हैं
एडजस्टमेण्ट करके चलो
तो दुनिया में अपनी तूती बोलती है
एडजस्टमेण्ट कर लो तो कुछ भी अश्लील
कुछ भी अकरणीय नहीं रह जाता
कुछ भी बेचैन-परेशान नहीं करता
कुछ भी,कैसे भी करना धर्म सरीखा लगता है
हत्यारे सज्जन पुरुषों में तब्दील हुए दीखते हैं
आदरणीय होकर फादरणीय हो जाते हैं
हक़ की लड़ाई नक्सलवाद लगने लगती हैं
नफ़रत फैलाना संस्कृति के प्रचार-प्रसार का
अभिन्न अंग मालूम देता है

एडजस्टमेण्ट समय की पुकार है
शास्त्रों का सार है
एडजस्टमेण्ट करना सेल्फ़ी लेने जितना आसान है
एडजस्टमेण्ट हर शहर का महात्मा गाँधी मार्ग है
एडजस्टमेण्ट कण्डोम के समान है
जिसे पहनकर अपने को ब्रहमचारी सिद्ध करना आसान है
एडजस्टमेण्ट 2002 के बाद का
सत्य है, शिव है, सुन्दर है
एडजस्टमेण्ट का पुरस्कार मिलकर रहता है
भारत माँ के सच्चे पुत्र होने का सौभाग्य मिलता है
और कुछ हो न हो मगर देश का विकास होकर रहता है
अरे विकास, विनाश नहीं, विकास।

ताकत

मेरी ताकत यह है
कि मैं हर बार उठ कर खड़ा हो जाता हूँ
जब तक कि मर ही नहीं जाता

‌और मरकर भी ऐसा नहीं है
कि मैं खड़ा होने की कोशिश नहीं करूँगा
चाहे लुड़क ही पड़ूँ।

प्यार में रोना

प्यार ने कई बार रुलाया मुझे
मुश्किलों से ज्यादा प्यार ने
मैं यहाँ प्यार की मुश्किलों की बात नहीं कर रहा
न मुश्किलों में प्यार की।

पानी हूँ इसलिए

मैं पानी हूँ इसलिए मुझ पर आरोप नहीं लगता
कि मैं बर्फ क्यों बन गया
कि मैं भाप क्यों बन गया
या मैं तब ठंडा क्यों था
और अब गर्म क्यों हो गया हूँ
या मैं हर बर्तन के आकार का क्यों हो जाता हूँ।

फिर भी मैं शुक्रगुजार हूँ कि लोग
मेरे बारे में राय बनाने से पहले यह याद रखते हैं
कि मैं पानी हूँ
और यह सलाह नहीं देते
कि मैं कब तक पानी के परंपरागत गुण धर्म निभाता रहूँगा।

चांद – तारे

मुझे चाँद चाहिए था
लेकिन मैं चाँद की तरफ बढ़ने लगा तो मुझे तारों ने मोह लिया
और मैं सोचने लगा एक चाँद के लिए इतने तारों को कोई
कैसे छोड़ दे

चाँद ने जब मेरा रुख भापा तो
एक तारा बन गया।

हर स्वप्न के लिए

हर स्वप्न के लिए
नीन्द चाहिए
हर नीन्द के लिए
थकान

व्यंग्य

मैंने उन पर व्यंग्य लिखा
वही उनका सबसे अच्छा विज्ञापन निकला
वही मेरी सबसे कमाऊ रचना निकली
वही हिन्दी साहित्य मं समादृत भी हुई।

सपने ऐसे भी हों

मैं उसके सपनों में शायद ही कभी आया हूँ
मगर वह मेरे सपनों में कई बार आई है
हो सकता है कि वह किसी और के सपनों में आना चाहती हो
मगर वह न आने देता हो
इसलिए हताशा में वह मेरे सपनों में चली आती हो

सपने ऐसे भी हों जिनमें हम दोनों एक दूसरे से मिलें
फिर यथार्थ में दोनों कहीं मिले तो ऐसे शरमायें
जैसे कल ही कहीं चोरी छुपे- मिले थे
और आगे भी इरादा इस तरह मिलने जुलने का है
मगर इस बीच कोई समझ जाये कि दोनों के बीच कुछ है
वह मुस्कुराये और हम दोनों उसकी मुस्कुराहट के जवाब में ऐसे मुस्कुरायें
जैसे हमारी चोरी पकड़ी गयीं
तो भी क्या!

क्या कव्वा भी चहचहा रहा था

उसने कहा –

आज क्या सुबह थी

क्या हवा थी

कितनी मस्ती से पक्षी चहचहा रहे थे

मैंने कहा रुको

क्या तुम्हारा मतलब ये है

कि कव्वे भी चहचहा रहे थे?

घोडों का गुनगुनाना

उसने कहा

घोडे उस समय हिनहिना रहे थे

मैंने पूछा

तुम्हारा मतलब ये तो नहीं कि घोडे उस समय

गुनगुना नहीं रहे थे?

Share