सरफ़राज़ दानिश की रचनाएँ

आरज़ूओं की रूतें बदले ज़माने हो गए 

आरज़ूओं की रूतें बदले ज़माने हो गए
ज़िंदगी के साथ सब रिश्ते पुराने हो गए

आबला-पाई ने ऐसी शोख़ियाँ कीं रेत से
वक़्त के तपते हुए सहरा सुहाने हो गए

चंद लम्हे को तू ख़्वाबों में भी आ कर झाँक ले
ज़िंदगी तुझ से मिले कितने ज़माने हो गए

रात दरवाजे पे बैठी थी सो बैठी ही रही
घर हमारे रौशनी के कार-ख़ाने हो गए

शोख़ियाँ ‘दानिश’ मतानत की तरफ़ हैं गामज़न
ऐसा लगता है कि अब हम भी पुराने हो गए

इस से पहले कि सर उतर जाएँ

इस से पहले कि सर उतर जाएँ
हम उदासी में रंग भर जाएँ

ज़ख़्म मुरझा रहे हैं रिश्तों के
अब उठें दोस्तों के घर जाएँ

ग़म का सूरज तो डूबता ही नहीं
धूप ही धूप है किधर जाएँ

अपना एहसास बन गया दुश्मन
जब भी चाहा कि ज़ख़्म भर जाएँ

वार चारों तरफ़ से हैं हम पर
शायद इस मारके में सर जाएँ

सामना दुश्मनों से हो जब भी
आप हँसते हुए गुज़र जाएँ

कोई सूरत निकालिए ‘दानिश’
बस्तियाँ ख़ुशबुओं से भर जाएँ.

लम्हा लम्हा तजरबा होने लगा 

लम्हा लम्हा तजरबा होने लगा
मैं भी अंदर से नया होने लगा

शिद्दत-ए-ग़म ने हदें सब तोड़ दीं
ज़ब्त का मंज़र हवा होने लगा

फिर नए अरमान शाख़ों को मिले
पŸाा पŸाा फिर हरा होने लगा

ग़ौर से टुक आँख ने देखा ही था
मुझ से हर मंज़र ख़फ़ा होने लगा

रात की सरहद यक़ीनन आ गई
जिस्म से साया जुदा होने लगा

मैं अभी तो आईने से दूर हूँ
मेरा बातिन क्यूँ ख़फ़ा होने लगा

‘दानिश’ अब तीरों की ज़द में आ गया
ज़िंदगी से सामना होने लगा

सफ़ीना मौज-ए-बला के लिए इशारा था

सफ़ीना मौज-ए-बला के लिए इशारा था
न फिर हवा थी मुआफ़िक़ न फिर किनारा था

हम अपने जलते हुए घर को कैसे रो लेते
हमारे चारों तरफ़ एक ही नज़ारा था

ये वाक़िआ जो सुनेंगे तो लोग हँस देंगे
हमें हमारी ही परछाइयों ने मारा था

तिलिस्म तोड़ दिया इक शरीर बच्चे ने
मिरा वजूद उदासी का इस्तिआरा था

ये हौसला तो गुलों का था हँस पड़े लेकिन
उन्हें किसी का तबस्सुम भी कब गवारा था

ग़ुरूर-ए-अक़्ल में ईमान भी गँवा बैठे
ये इक जज़ीरा तो सब के लिए किनारा था

उसे भी आज किया मैं ने आँधियों के सुपुर्द
बहुत दिनों से मिरे पास इक शरारा था

हम उस को कैसे सुनाते कहानियाँ ‘दानिश’
किताब-ए-दिल का हर इक सफ़हा पारा पारा था

शहर भर के आईनों पर ख़ाक डाली जाएगी

शहर भर के आईनों पर ख़ाक डाली जाएगी

आर फिर सच्चाई की सूरत छुपा जी जाएगी

उस की आँखों में लपकती आग है बेहद शदीद
सोचता हूँ ये क़यामत कैसे टाली जाएगी

मुश्तइल कर देगा उस को इक ज़रा सा एहतिजाज
मुझ पे क्या गुज़री है इस पर ख़ाक डाली जाएगी

क़ैद का एहसास भी होगा न हम को दोस्तो
यूँ हमारे पाँव में ज़ंजीर डाली जाएगी

ऐ मोहब्बत लफ़्ज़ बन कर इतनी संजीदा न हो
एक दिन तू भी किताबों से निकाली जाएगी

शर्म से ख़ुर्शीद अपना मुँह छुपा लेगा कहीं
रोज़-ए-रौशन में भी ‘दानिश’ रात ढा ली जाएगी

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