सिद्धेश्वर सिंह की रचनाएँ

कौसानी में घर की याद

कैसे-कैसे
करिश्माई कारनामे
कर जाता है एक अकेला सूर्य….
किरणों ने कुरेद दिए हैं शिखर
बर्फ़ के बीच से
बिखर कर
आसमान की तलहटी में उतरा आई है बेहिसाब आग ।

कवि होता तो कहता —
सोना – स्वर्ण – कंचन – हेम…
और भी न जाने कितने बहुमूल्य धातुई पर्याय

पर क्या करूँ —
तुम्हारे एकान्त के
स्वर्ण-सरोवर में सद्यस्नात
मैं आदिम-अकिंचन… निस्पॄह.. नि:शब्द..

क्या इसी तरह का
क्या ऐसा ही
रहस्यमय रोशनी का-सा होता है राग !

कौसानी में सुबह के चार चित्र-1

मुँह अँधेरे
कमरे से बाहर हूँ पंडाल में
यहीं, कल यहीं जारी था जलसा.

अभी तो –
सोया है मंच
माइक ख़ामोश
कुर्सियाँ बेतरतीब – बेमकसद…
तुम्हारी याद से गुनगुना गया है शरीर ।

उग रहा है
सूर्य के उगने का उजास
मंद पड़ता जा रहा है
बिजली के लट्टुओं का जादुई खेल
ठंड को क्यों दोष दूँ
भले – से लग रहे हैं
उसके नर्म , नुकीले , नन्हें तीर !

कौसानी में सुबह के चार चित्र-2

कैसे – कैसे
करिश्माई कारनामे
कर जाता है एक अकेला सूर्य….
किरणों ने कुरेद दिए हैं शिखर
बर्फ़ के बीच से
बिखर कर
आसमान की तलहटी में उतरा आई है बेहिसाब आग ।

कवि होता तो कहता –
सोना – स्वर्ण – कंचन – हेम…
और भी न जाने कितने बहुमूल्य धातुई पर्याय
पर क्या करूँ –
तुम्हारे एकान्त के
स्वर्ण-सरोवर में सद्यस्नात
मैं आदिम -अकिंचन…निस्पॄह..निश्शब्द..
क्या इसी तरह का
क्या ऐसा ही
रहस्यमय रोशनी का-सा होता है राग !

कौसानी में सुबह के चार चित्र-3

हवा में खुनक है
ठंड की
सूर्य की किरणों के साहचर्य में
खुल रही है
पेड़ों की ठिठुरी देह ।

मैं यहीं हूँ
इस अजगुत को देखता
संग है तुम्हारी आभा
बार -बार पुकारता है गेह ।

कौसानी में सुबह के चार चित्र-4

पूरब में
आधा उगा सूर्य
पच्छिम में
अस्त होने को आतुर पूरा चाँद
बीच में खड़े हैं
नींद में डूबे – उनींदे पहाड़
अंधियारे की चादर को
चीर रहे हैं चीड़ के नुकीले पात ।
इस अधबनी सड़क पर मैं हूँ
हिमशिखरों की छाया के साथ-
एकान्त
तुम वहाँ कहीं दूर
चलो कोई सुने या नहीं
कह लेते हैं – शुभ, शुभ प्रभात ।

रामगढ़ से हिमालय की तीन छवियाँ-1

पहाड़ों के माथे पर
बर्फ़ की सफ़ेदी है
और मेरे बालों में
उतर रहा है
बीतते जाते वक़्त उजलापन ।

अडिग
अचल
खड़ा है नगाधिराज…
मैं ही क्यों होता रहता हूँ
प्रतिकूलताओं से दोलायमान ।

थोड़ी-सी हिम्मत मुझे भी बख़्शो
मेरे हिमालय !
मेरे हिमवान ! !

रामगढ़ से हिमालय की तीन छवियाँ-2

तिरछी ढलानों पर
सीधे तने खड़े हैं देवदार
आकाश के नीले कैनवस पर
कुछ लिखना चाहती हैं
उनकी नुकीली फुनगियाँ..

यह हिमालय है
यहाँ कौन नहीं है कवि
कौन नहीं बनना चाहता है चित्रकार !

रामगढ़ से हिमालय की तीन छवियाँ-3

अभी तो
कवि कविता करते हैं
और कहानीकार बुनता है कोई कहानी
आलोचक चुप रहते हैं
उन्हें नहीं सूझता गुण-दोष ।

अभी तो
आलमारियों में बन्द हैं क़िताबें
जो ख़ुद से बतियाती हैं निश्शब्द
सड़क पहचानती है सबके पैरों के निशान
पेड़ इशारा करते हैं हिमशिखरों की ओर ।

संगोष्ठी के समापन पर
करतल ध्वनि करता है हिमालय
शायद कोई नहीं देख रहा है
विदा में उठा हुआ उसका हाथ ।

मैदानों में उतरकर
कवि कविता करते रहेंगे
कहानीकार बुनते रहेंगे कहानियाँ
आलोचक चुप्पी तोड़ेंगे और निकालेंगे मीन-मेख
फिर भी
सबके सपनों में आएगा हिमालय
हाँ , वही हिमालय
वही नगाधिराज
जिसके लिए सुमित्रानंदन ने अपनी कविताओं में
लुटाया है बेशुमार सोना
वही हिमालय
जहाँ महादेवी वर्मा को बादल में दिखा था रूपसी का केशपाश
वही हिमालय
जहाँ खिलते हैं बुराँश
और मैदानों को आर्द्र करने के लिए निकलती हैं नदियाँ ।

आइए, यह भी याद करें
यह वही हिमालय है वही नगाधिराज
हमारी लालसाओं की भठ्ठी की आँच से
पिघल रही है जिसकी देह
और कोपेनहेगेन के सम्म्लेन द्वार तक
शायद पहुँच रही जिसकी करुण पुकार ।

शिमला प्रसंग : सात स्मरण

एक / सामना

न्यू गेस्ट हाउस की
खुली खिड़की से झाँकते ही रहते हो
भाई देवदार ।

भूलने में ही है भलाई
पर
कहो तो
कैसे भूल पाऊँगा
मैं तुम्हारा प्यार

दो / खिलौना गाड़ी

हरियाली के
ऊँचे – नीचे मैदान में
पहाड़ खेल रहे हैं खेल

भूधर की खुरदरी हथेली पर
लट्टू-सी घूमती है रेल ।

तीन / सुरंग

जाना है उस पार
ऐसा ही कुछ कहता है अंधकार
भीतर सिहरते हैं
हर्ष और भय साथ-साथ

ऊँचे कड़ियल पहाड़ो का
सीना चीर देते हैं
छोटे-छोटे एक जोड़ी हाथ

बुदबुदाती है हवा बार-बार ।

चार/ रिज पर

एक छोटा-सा आभास
सुघड़ समतल संसार का
नीचे दीखती हैं मकानों की छतें
सर्दियों में जिन पर
धूप सेंकती होगी बर्फ़

ऊपर आसमान से होड़ करते पहाड़
एक सिरे पर खड़ा हैं
गाँधी बाबा का सादा बुत
यह जो दमक रही है चमकदार दुनिया
हमें बनाती हुई कूड़ा-कबाड़ ।

पाँच / समर हिल

रात में कवितायें सुनते हैं पेड़
स्टेशन उतारता है दिन भर की थकान
सड़क याद दिलाती है
बालूगंज के ‘कृष्णा’ की जलेबियों का स्वाद

हि०प्र० विश्वविद्यालय की
लाइब्रेरी के सबसे ऊपरी तल्ले से
आँख खोल देखो तो
घाटी में क़िताबों की तरह खुलते दीखते हैं बादल ।

कितना छोटा है मुलाक़ातों का सिलसिला
कल जब चला जाऊँगा मैदानों के समतल में
साथी होंगे धूल-धक्कड़ गर्द-ग़ुबार
तब नींद में थपकियाँ देने आएँगे पहाड़
और याद आएगी भूलती-सी याद ।

छह / बारिश

बारिश में कौन भीगता है
कौन होता है आर्द्र
कौन निचोड़ता है अपने गीले वसन
कौन सुखाता है धूप होते ही अपनी छतरी
कई-कई सवालों के साथ लौटूँगा अपने बियाबान में
क्या पता यहीं कहीं किसी पेड़ तले
ठिठका होगा मन ।

सात / लक्कड़ बाज़ार

काठ में जान
या जान हुई जाती है काठ
ठाठें मारते इस जन-समुद्र में
वनस्पतियों का सुनते हैं विलाप
भाषा यह नहीं है अबूझ
पकड़ में आते हैं इसके भी स्वर और व्यंजन
जब मटरगश्ती करते वानर भी कर लेते हैं संवाद
तब आपकी आँखों में क्यों उभरती है
अपरिचय की एकतरफ़ा धुन
निर्मल वर्मा होते तो देखते
‘चीड़ों पर चाँदनी’ और ‘लाल टीन की छत’
पर यहाँ तो
आरा मशीनों की ओर कूच कर रहे हैं चीड़
और छतों पर जमी है कत्थई काई ।

पहाड़ केवल पहाड़ नहीं होते
न ही होते हैं
नदी नाले पेड़ बादल बारिश बर्फ़
पहाड़ वैसी कविता भी नहीं होते
जैसा कि बताते आए हैं सुमित्रानंदन पन्त ।

क्या करूँ
काठ के भीतर उतर गया अनायास
बेमतलब बेतुका-सा लगता रहा माल
चक्कर लगाए चार-पाँच यूँ ही निरुद्देश्य
रुका बुक स्टाल पर ज़रूर
पर पत्रिकाएँ लगीं सभी पुरानी
कोई क़िताब पसंद नहीं आई आज
अख़बार छुआ तो लुगदी में सन गए हाथ ।

कभी स्कूली दिनों में पढ़ा था
हरिऔध कॄत ‘ठेठ हिन्दी का ठाठ’
लेकिन अभी तो
मुक्तिबोध का ‘काठ का सपना’ भी नहीं
हर ओर काठ और केवल काठ ।

रात

रात
ख़ुद से कर रही है बात ।

शब्दों की बिसात पर
ख़ुद को ही शह ख़ुद से ही मात ।

कौन है
जो नींद को जगाए हुए है ?

कौन है
जो आधी रात को कह रहा है शुभ प्रभात !

रात-2

यह रात है
कुछ विगत
कुछ आगत
यह रात है
साँझ की स्मृति
सुबह का सहज स्वागत

यह रात है
कुछ कल्मष
कुछ उजास
यह रात है
राग-विराग मिलन-वनवास

यह रात है
कुछ नहीं बस रात
यह रात है
ख़ुद से ख़ुद की कोई बात

यह रात है
आधी बात आधा मौन
यह रात है
आधा हम
आधा न जाने कौन !

पूर्वानुमान

फ़ोन पर
लरजता है वही एक स्वर
जिसे सुनता हूँ
दिन भर – रात भर ।

छँट रहा है कुहासा
लुप्त हो रही है धुन्ध
इधर-उधर
उड़-उड़ कर ।

मैं कोई मौसम विज्ञानी तो नहीं
पर सुन लो —
आज के दिन
कल से ज़्यादा गुनगुना होगा
धूप का असर ।

नाम

असमर्थ-अवश हो चले हैं शब्दकोश
शिथिल हो गया है व्याकरण
सहमे-सहमे हैं स्वर और व्यंजन
बार-बार बिखर जा रही है वर्णों की माला.

यह कोई संकट का समय नहीं है
न ही आसन्न है भाषा का आपद्काल
अपनी जगह पर टिके हैं ग्रह-नक्षत्र
धूप और उमस के बावजूद
हल्का नहीं हुआ है गुलमुहर का लाल परचम ।

संक्षेप में कहा जाय तो
बस इतनी-सी है बात
आज और अभी
मुझे अपने होठों से
पहली बार उच्चारना है तुम्हारा नाम ।

आओ चलें

तुम —
सितारों की ज्यामितीय कला से प्रेरित
अनन्त व्योम की उज्ज्वलता में
व्यवस्थित-गुन्थित
बेहिसाब – बेशुमार – बेशकीमती रेशम ।

मैं —
इस पृथिवी के चारो ओर
उपजी-बिलाती वनस्पतियों की साँस से संचालित
हवा में उड़ता-भटकता हुआ
एक अदना-सा गोला भर कपास ।

यह एक दूरी है
जो खींच लाई है कुछ निकट — तनिक पास
अपनी दैनन्दिन साधारणता में
भुरभुराता हुआ यह जीवन
लगने लगा है कुछ विशिष्ट – तनिक खास.

इसी में छिपी है निकटता
इसी में है एक दबी-दबी सी आग
इसी में है सात समुद्रों का जल
इसी में हैं वाष्प-ऊष्मा-ऊर्जा के सतत स्रोत

इसी में हैं सात आसमानों की प्रश्नाकुल इच्छाएँ
इसी में रमी है पंचतत्वों से बनी यह देह
जिसमें विराजती हैं कामनाओं की असंख्य अदृश्य नदियाँ
अपने ही बहाव में मुग्ध – अवरुद्ध
एक तट पर विहँसता है राग
और दूसरे पर शान्त मंथर विराग ।

फिर भी भला लगता है
अगर रोज़ाना बरती जा रही भाषा में
तुम्हें कहा जाए रेशम
और स्वयं को कपास ।

अपने करघे से एक धागा तुम उठाओ
मैं अपनी तकली से अलग करूँ ज़रा-सा सूत
बुनें दो-चार बित्ता कपड़ा
और तुरपाई कर बना डालें
दो फुदकती गिलहरियों के लिए नर्म-नाज़ुक मोज़े ।

मौसम के आईने में
कोई छवि नहीं है स्थिर-स्थायी
आँख खोल देखो तो

सर्दियाँ सिर पर सवार होने को हैं
पेड़ों से गिरने लगे हैं चमकीले -चीकने पात
आओ चलें
थामे एक दूजे का हाथ
चलते रहें साथ-साथ ।

पुस्तक समीक्षा

काग़ज़ –
उजला चमकीला
मुलायम सुचिक्कण

छपाई –
अच्छी पठनीय
फ़ाँट-सुंदर

आवरण –
बढ़िया शानदार
कलात्मक आकर्षक

आकार –
डिमाई क्राउन रायल जेबी
(चाहे जो समझ लें)

कीमत –
थोड़ी अधिक
( क्या करें इस महँगाई का
वैसे भी,
बिकती कहाँ हैं हि्न्दी की क़िताबें )

पुरस्कार –
लगभग तय
( जय जय जय )

अख़बारों में बची नहीं जगह
पत्रिकाओं में शेष हैं इक्का – दुक्का पृष्ठ
सुना है ब्लाग भी कोई जगह है
( विस्तार के भय से
वहाँ का हाल -चाल फिर कभी ।)

साहित्य के मर्मज्ञ पाठकवॄंद
अब आप ही बताएँ
एक अदद क़ितबिया पर
आख़िरकार कितना लिखा जाय !

अत:
अस्तु
अतएव –
इति समीक्षा ।

इंटरनेट पर कवि

कवि अब इंटरनेट पर है
व्योम में विचर रहा है उसका काव्य
दिक्काल की सीमाओं से परे
नाच रहे हैं उसके शब्द
विश्वग्राम के निविड़ नुक्कड़ पर ।

कवि अभिभूत है
अब नहीं रहा तनिक भी संशय
कि एक न एक दिन
भूतपूर्व हो जाएँगे छपे हुए शब्द
और पुरातात्विक उत्खनन के बाद ही
सतह पर उतराएगी क़िताबों की दुनिया
जिन पर साफ़ पढ़े जा सकेंगे
दीमकों – तिलचट्टों – गुबरैलों के खुरदरे हस्ताक्षर ।

कवि अब भी लौटता है बारम्बार
कुदाल खुरपी खटिया बँहगी सिल लोढ़ा
और..और उन तमाम उपादानों की ओर
जिनका तिरोहित होना लाजमी है
तभी तो दीखती हैं जड़ें
जिन्हें देख-देख होता है वह मुग्ध मुदित ।

सारे सतगुरु सारे संत कह गए हैं
काग़ज़ की पुड़िया है यह निस्सार संसार
इसे गलना है गल जाना है
सब कुछ हो जाना है काग़ज़ से विलग विरक्त
जैसे कि यह इंटरनेट
जिस पर अब कवि है अपनी कविता के साथ ।

रात के एकान्त अँधेरे में
जब जुगनू भी बुझा देते हैं अपनी लालटेन
तब कोई शख़्स
चोर की तरह खोलता है एक जंग लगा बक्सा
और निकालता है पीले पड़ चुके पत्र
जिनके लिखने का फार्मूला कहीं गुम हो गया है ।

आओ एक काम करें
इंटरनेट खँगालें और किसी पाठक को करें ईमेल
देखें कि वह कहाँ है
इस विपुला पॄथ्वी
और अनंत आकाश के बीच
कवि तो अब इंटरनेट पर है
व्योम में विचर रहा है उसका काव्य ।

वेलेन्टाइन डे

शोध के लायक है
एक अकेले दिन का इतिहास
और प्रतिशोध की संभावना से परिपूर्ण भूगोल
कैसा – किस तरह का हो
इस दिवस का नागरिकशास्त्र..
सब चुप्प
सब चौकन्ने
सब चकित
इस शामिलबाजे में
भीतर ही भीतर बज रहा है कोई राग ।

आज वेलेन्टाईन डे पर
अपने घोंसले से दूर स्मॄतियों में सहेज रहा हूँ
अपना चौका
अपने बासन
रोटी की गमक
तरकारी की तरावट
चूल्हे पर दिपदिप करती आग ।

और उसे.. उसे
जिसने आटे की तरह
गूँथ दिया है ख़ुद को चुपचाप
सुना है इसी दिन
पता चलता है संस्कॄति के पैमाने का ताप ।
मैं मूढ़ – मैं मूरख क्या जानूँ
प्यार है किस चिड़िया का नाम
आज वेलेन्टाईन डे पर
अपने घोंसले से दूर
तुम्हें याद करते हुए
क्या कर रहा हूँ – क्या पुण्य – क्या पाप !

उत्सर्ग एक्सप्रेस

एक उदास उजाड़ उनींदा टीसन
इसे रेलवे स्टेशन की संज्ञा से विभूषित करना
एक संभ्रांत शब्द के साथ अन्याय होगा
एक जघन्य अपराध उस शब्दकोश के साथ भी
जो विलुप्त प्रजातियों की लुगदी के कायान्तरण पर
उदित हुआ है आश्चर्य की तरह
और शीशेदार आलमारी में लेटा है निश्चेष्ट ।

जाड़े पाले के जादू में लिपटी हुई यह रात
बीत जाने को विकल व्याकुल नहीं है अभी
कितना काव्यमय नाम है इस रेलगाड़ी का
जिससे अभी-अभी उतरा हूँ
माल असबाब और बाल बच्चों के साथ
प्लेटफ़ार्म पर मनुष्य कम दीखते हैं वानर अधिसंख्य
फ़र्श फाटक और लोहे की ठंडी मजबूत शहतीरों पर
काँपते कठुआये हमारे पूर्वज
एक दूसरे की देह की तपन को तापने में एकाग्र एकजुट ।
बाहर अँधेरा है
थोड़ा अलग थोड़ा अधिक गाढ़ा
जैसा कि पाया जाता है आजकल
हम सबके भीतर भुरभुराता हुआ
कुछ रिक्शे
कुछ तिपहिए
इक्का-दुक्का गाड़ियाँ जिन्हें मोटरकार कहा जाता था कभी
अब वे अपनी रंगत व बनावट से नहीं
ब्रान्ड से जानी जाने लगी हैं
असमंजस में हूँ फिर भी तय करता हूँ-
थोड़ा ठहर लिया जाना चाहिए अभी
भोर होने का इंतज़ार करते हुए
जैसा कि आम समझदारी का चलन है इन दिनों
अभी कुछ देर और देख लिया जाय वानरों का करतब
उनकी बहुज्ञता और बदमाशी के मिश्रण का कारनामा
किसी क़िताब में तो मिलने से रहा
उनमें भी नहीं जो वज़नी पुरस्कारों से नवाजी जा चुकी हैं
और फ़िलवक़्त मेरे बैग में विराजमान हैं
गर्म कपड़ों साबुन-तौलिए व बिस्कुट नमकीन के पूरक की तरह ।

दिन भर भरपूर उजाला
दिन भर पारिवारिक प्रसंग
आशल कुशल संवाद स्वाद
मानो एक बुझते हुए कौड़े की गर्म राख में रमी गर्माहट ।

दोपहर में पुस्तक मेला
क़िताबों के कौतुक में इंसानों का रेवड़-
बच्चे किशोर युवा और अधियंख्य बूढ़े
जिनकी वाणी में ही बची है
अरुणाभा की खिसियाहट भरी आँच
स्टालों पर बेशुमार काग़ज़ हैं
पर एक भी कोरा नहीं
कंधे छिलते-टकराते हैं
देखता हूँ अगल-बगल
आवारा सज्दे वाले कैफ़ी
दुनिया बदलने को बेचैन राहुल
प्रियप्रवास बाँचते बाबा हरिऔध
अपनी असाध्य वीणा सहेजते सहलाते अज्ञेय
जाने वाले सिपाही से फूलों का पता पूछते मख़्दूम
आदि-इत्यादि की श्रेणी से ऊपर-नीचे
साहित्याकाश के और भी दिपदिपाते ग्रह-उपग्रह-नक्षत्रा ।

अनुमान करता हूँ
इसी भव्य भीड़-भभ्भड़ और बगल के कमरे में चल रही
कविता की कार्यशाला के बीच
फराकथाओं में देखी गई
किंतु आजकल प्राय: अदृश्य कही जाने वाली आत्मा की तरह
मुस्तैद होंगी चंद जोड़ी खुफ़िया निगाहें
वांछित नाक-नक्श पहचानने की क़वायद में तत्पर तल्लीन
अपराध-सा करने की लिजलिजाहट से भरकर
ख़रीदता हूँ दो चार सस्ती क़िताबें
और एक बड़े मेहराबदार दरवाज़े से बाहर निकल आता हूँ
सड़क पर
जहाँ शोर और सन्नाटे रक्तिम आसव रिस रहा है लगातार-
बूँद-बूँद ।

कितना काव्यमय नाम है इस रेलगाड़ी का
जिससे आज ही लौटना है आधी रात के क़रीब
फिर वही टीसन
फिर वही वानर दल
फिर वही प्रतीक्षालय टुटही कुर्सियों वाला
फिर वही अँधेरा
फिर वही सर्द सन्नाटा-खुद से बोलता बतियाता ।

कैसे कहूँ कि गया था तमसा के तट पर
वहाँ आदिकवि की कुटिया तो नहीं मिली
पर एक उदास उजाड़ उनींदा स्टेशन जरूर दिखाई दे गया
जहाँ से गुज़रती हैं गिनी-चुनी सुस्त रफ्रतार रेलगाड़ियाँ
मैं हतभाग्य
अपने ही हाहाकार से हलकान
न मिजवाँ जा सका न पन्दहा
न जोकहरा न सरायमीर
सुना है यहाँ की जरखेज़ ज़मीन पर
कभी अंकुरित होते थे कवि शायर तमाम
अब भी होते होंगे बेशक-ज़रूर-अवश्य
पर उनका ज़िक्र भर छापने लायक
हम ही नहीं बना पाए हैं एक अदद छापाघर
मरहूम अक़बर इलाहाबादी साहब की नेक सलाह
और अपनी तमाम सलाहियत के बावजूद
तनी हुई तोप के मुक़ाबिल
हम ही निकाल नहीं पाए हैं एक भी अठपेज़ी अख़बार
यह दीगर-दूसरा किस्सा है कि
सब धरती को काग़ज़
सात समुद्रों को स्याही
और समूची वनराजियों को क़लम बना लेने का
मंत्रा देने वाला जुलाहा अब भी बुने जा रहा है लगातार-
रेशा-रेशा ।

अँधेरे मुँह गया
अँधेरे मुँह पलट आया
गोया उजाले से मुँह चुराने जैसे मुहावरों का
अर्थ लिखता-वाक्य प्रयोग करता हुआ
गाड़ी अभी लेट है
कितनी पता नहीं
ऊँघता सहायक स्टेशन मास्टर भी कुछ कहने की स्थिति में नहीं है
वानरों के असमाप्य करतब में कट रही है रात
यह न पूछो कि कब आएगी ‘उत्सर्ग एक्सप्रेस’
पूछ सको तो पूछ लो
इस जगह का नाम
जिसे जिहवाग्र पर लाते हुए इन दिनों चौंक जाता हूँ जागरण के बावजूद
वैसे नींद के भीतर चौंक जाना कौन-सी बड़ी बात है ।

गजब है सचमुच गजब
बेटे-बिटिया बड़े शान से इतराए
पूरी कॉलोनी को बताए फिर रहे हैं-
हम लोग एक दिन के लिए गए थे आजमगढ़ ।

लैपटाप

जोगियों की तुंबी में
समा जाया करता था पूरा त्रिलोक
जल की एक बूँद में
बिला जाया करते थे वॄहदाकार भूधर
भँवरे की एक गूँज
हिलाकर रख देती थी समूचा भुवन
ये सब बहुत दूर की कौड़ियाँ नहीं हैं
समय के पाँसे पर अभी भी अमिट है उनकी छाप ।

अब इस यंत्र इस जुगत का
किस तरह बखान किया जाय
किन शब्दों में गाई जाय इसकी विरुदावली –
दिनोदिन सिकुड़ रही है इसकी देह
और फैलता जा रहा है मस्तिष्क
लोहा-लक्कड़ प्लास्टिक-कचकड़ तार-बेतार
इन्हीं उपादानों ने रचा है यह संसार
इसका बोझ नही लगता है बोझ
इसी की काया में है हमारे समय की मुक्ति
हमारे काल का मोक्ष ।

नाना रूप धर रिझाती हुई
यह नये युग की माया है
जैसे अपनी ही काया का विस्तार
जैसे अपनी देह को देखती हुई देह
हम सब यंत्र जुगत मशीन
हम सब विदेह ।

हथिया नक्षत्र

हथिया इस बार भी नहीं बरसा
टकटकी लगाए देखते रहे
खेतों के प्यासे-पपड़ाए होंठ ।

मोतियाबिंद से धुँधलाई आँखों से
खाली-खाली आकाश ताक रहे हैं जवाहिर चा’
और बुदबुदा रहे हैं-
हथिया इस बार भी नहीं बरसा ।
लगता है आसमान में कहीं अटक गया है
जैसे भटक जाते हैं गाँव के लड़के
दिल्ली, बंबई, कलकत्ता, जाकर।
-ये कयामत के आसार हैं मियाँ
बात में लग्गी लगाते हैं सुलेमान खाँ
हथिया का न बरसना मामूली बात नहीं है जनाब!
अब तो गोया आसमान से बरसेगी आग
और धरती से सूख जाएगी हरियर दूब।

हथिया का न बरसना
सिर्फ़ जवाहिर चा’
और सुलेमान खाँ की चिंता नहीं है
हथिया का न बरसना
भूख के इतिहास की सबसे बड़ी घटना है।
जवाहिर चा और सुलेमान खाँ नहीं जानते हैं
कि हथिया एक नक्षत्र है
बाकी छब्बीस नक्षत्रों की तरह
जिनकी गणना
पंडित रामजी तिवारी की पोथियों में बंद है ।
हथिया मनमौजी है
वह कोई बंदिश नहीं मानता
दुनिया के रंगबिरंगे नक्शे में
नहीं पहचानता है हिंदुस्तान,
बर्मा या पाकिस्तान
वह नहीं देखता है
हिंदू, सिक्ख, क्रिस्तान या मुसलमान
वह बरसता है तो सब पर
चाहे वह उसर हो या उपजाऊ धनखर।
वह लेखपाल की खसरा-खतौनी की
धज्जियाँ उड़ा देता है
न ही वह डरता है
बी०डी०ओ० और तहसीलदार की
गुर्राती हुई जीप से ।

कभी फ़ुर्सत मिले तो देखना
बिल्कुल मस्ताए हाथी की तरह दीखता है
मूसलाधार बरसता हुआ हथिया नक्षत्र ।

जवाहिर चा’ और सुलेमान खाँ को
प्रभावित नहीं कर सकता है
मेरा यह काव्यात्मक हथिया नक्षत्र
वे अच्छी तरह जानते हैं
हथिया के न बरसने का वास्तविक अर्थ ।

हथिया के न बरसने का अर्थ है-
धान की लहलहाती फसल की अकाल-मृत्यु
हथिया के न बरसने का अर्थ है-
कोठार और कुनबे का खाली पेट
हथिया के न बरसने का अर्थ है-
जीवन और जगत का अर्थहीन हो जाना ।

विद्वतजन!
मुझे क्षमा करें
मैं सही शब्दों को ग़लत दिशा में मोड़ रहा हूँ
मुझे हथिया नक्षत्र पर नहीं
बटलोई में पकते हुए भात पर
कविता लिखनी चाहिए

अपवित्र नदी

फूली हुई सरसों के
खेतों के ठीक बीच से
सकुचाकर निकलती है कर्मनाशा की पतली धारा ।

कछार का लहलहाया पीलापन
भूरे पानी के शीशे में
अपनी शक्ल पहचानने की कोशिश करता है ।
धूप में तांबे की तरह चमकती है
घाट पर नहाती हुई स्त्रियों की देह ।

नाव से हाथ लपकाकर
एक एक अंजुरी जल उठाते हुए
पुरनिया – पुरखों को कोसने लगता हूं मैं –
क्यों – कब – कैसे कह दिया
कि अपवित्र नदी है कर्मनाशा !

भला बताओ
फूली हुई सरसों
और नहाती हुई स्त्रियों के सानिध्य में
कोई भी नदी
आख़िर कैसे हो सकती है अपवित्र ?

बनता हुआ मकान

यह एक बनता हुआ मकान है
मकान भी कहाँ
आधा-अधूरा निर्माण
आधा-अधूरा उजाड़
जैसे आधा-अधूरा प्यार
जैसे आधी-अधूरी नफ़रत ।

यह एक बनता हुआ मकान है
यहाँ सबकुछ प्रक्रिया में है — गतिशील गतिमान
दीवारें लगभग निर्वसन है
उन पर कपड़ॊं की तरह नहीं चढ़ा है पलस्तर
कच्चा-सा है फ़र्श
लगता है ज़मीन अभी पक रही है
इधर-उधर लिपटे नहीं हैं बिजली के तार
टेलीफोन-टी० वी० की केबिल भी कहीं नहीं दीखती ।
अभी बस अभी पड़ने वाली है छत
जैसे अभी बस अभी होने वाला है कोई चमत्कार
जैसे अभी बस अभी
यहाँ उग आएगी कोई गृहस्थी
अपनी सम्पूर्ण सीमाओं और विस्तार के साथ
जिसमें साफ़ सुनाई देगी आलू छीलने की आवाज़
बच्चॊं की हँसी और बड़ों की एक ख़ामोश सिसकी भी ।

अभी तो सब कुछ बन रहा है
शुरू कर कर दिए हैं मकड़ियों ने बुनने जाल
और घूम रही है एक मरगिल्ली छिपकली भी
धीरे-धीरे यहाँ आमद होगी चूहों की
बिन बुलाए आएँगी चीटियाँ
और एक दिन जमकर दावत उड़ाएँगे तिलचट्टे ।

आश्चर्य है जब तक आऊँगा यहाँ
अपने दल-बल छल-प्रपंच के साथ
तब तक कितने-कितने बाशिन्दों का
घर बन चुका होगा यह बनता हुआ मकान ।

ऐसा कोई आदमी

पेड़ अब भी
चुप रहने का संकेत करते होंगे ।
चाँद अब भी
लड़ियाकाँटा की खिड़की से कूदकर
झील में आहिस्ता-आहिस्ता उतरता होगा ।
ठण्डी सड़क के ऊपर होस्टल की बत्तियाँ
अब भी काफ़ी देर तक जलती होंगी ।

लेकिन रात की आधी उम्र गुज़र जाने के बाद
पाषाण देवी मन्दिर से सटे
हनुमान मन्दिर में
शायद ही अब कोई आता होगा
और देर रात गए तक
चुपचाप बैठा सोचता होगा —
स्वयं के बारे में नहीं
किसी देवता के बारे में नहीं
मनुष्य और उसके होने के बारे में ।

झील के गहरे पानी में
जब कोई बड़ी मछली सहसा उछलती होगी
पुजारी एकाएक उठकर
कुछ खोजने-सा लगता होगा
तब शायद ही कोई चौंक कर उठता होगा
और मद्धिम बारिश में भीगते हुए
कन्धों पर ढेर सारा अदृश्य बोझ लादे
धुन्ध की नर्म महीन चादर को
चिन्दी-चिन्दी करता हुआ
मल्लीताल की ओर लौटता होगा ।

सोचता हूँ
ऐसा कोई आदमी
शायद ही अब तुम्हारे शहर में रहता होगा
और यह भी
कि तुम्हारा शहर
शायद ही अब भी वैसा ही दिखता होगा !

यूँ ही

तुम्हारी हँसी को मैं
हरसिंगार के फूलों की
अन्तहीन बारिश नहीं कहूँगा
और यह भी नहीं कि
चाँदनी की प्यालियों से उफ़नकर
बहती हुई
मदिर-धार है तुम्हारी हँसी ।
बल्कि यह कि —
टाइपराइटर के खट-खट जैसी
कोई एक आवाज़ है तुम्हारी हँसी
जो मुझे फिलहाल अच्छी लग रही है ।

विलोम

मैं
इस गली के नुक्क्कड़ पर लगा
एक उदास लैम्प पोस्ट ।
अब मैं रोशनी बाँटता नहीं
रोशनी पीता हूँ
और
बे-वज़ह ही
दिन को रात बनाने की
असफल कोशिश में लिप्त रहता हूँ ।

साक्ष्य

बर्फ़ अब भी गिरती है
और खालीपन भर-सा जाता है।
इस निर्जन शहर में
लोग ( शायद ) अब भी रहते हैं
क्योंकि —
पगडण्डियों पर
पाँवों के इक्का-दुक्का निशान हैं
कहीं-कहीं ख़ून के धब्बे
और एक अशब्द चीख़ भी ।

चार शब्द-दीप

1

कुछ है
जिससे जन्म लेती है रोशनी
कोई है
जो अपदस्थ करता है
अन्धकार के क्रूर तानाशाह को
कोई है
जो जलाता है अपना अस्तित्व

तब उदित होती है
रात के काले कैनवस पर एक उजली लकीर ।

2

इस साधारण से शब्द का
पर्यायवाची नहीं है अन्धकार
न ही
यह रंगमंच है किसी कुटिल क्रीड़ा का

रात का होना है प्रभात
और सतत जलता हुआ दीप ।

3

चाहे जितनी भी बड़ी हो
अन्धकार की काली स्लेट
चाहे जितना भी विस्तृत हो तिमिर-लोक
भले आकाश की कक्षा में अनुस्थित हो चाँद

फिर भी
धुँधले न हों
उजाले के अक्षर
और ख़त्म न हो रोशनी की चॉक ।

4

बनी रहे
उजास की अशेष आस
शेष न हो
स्वयं पर सहज विश्वास

आओ करें
रोशनी को राजतिलक
तम को भेज दें वनवास ।

प्रतीक्षा

धूप के अक्षर
अँधेरी रात की काली स्लेट पर
आसानी से लिखे जा सकते हैं
कोई ज़रूरी नहीं कि तुम्हारे हाथों में
चन्द्रमा की चॉक हो ।

इसके लिए मिट्टी ही काफ़ी है
वही मिट्टी
जो तुम्हारे चेहरे पर चिपकी है
तुम्हारे कपड़ों पर धूल की शक्ल में ज़िन्दा है
तुम्हारी सुन्दर जिल्द वाली क़िताबों में
धीरे-धीरे भर रही है।

तुम सूरज के पुजारी हो न ?
तो सुनो
यह मिट्टी यूँ ही जमने दो परत-दर परत ।

देख लेना
किसी दिन कोई सूरज
यहीं से, बिल्कुल यहीं से
उगता हुआ दिखाई देगा
और मुझे तनिक भी आश्चर्य नहीं होगा ।

बारिश में बुद्ध

हिमशिखरों से कुछ नीचे
और उर्वर सतह से थोड़ा ऊपर
अकेले विराज रहे हैं बुद्ध ।

उधर दूसरी पहाड़ी ढलान पर
दूर दिखाई दे रहा है गोंपा
किन्तु उतना दूर नहीं
कि जितनी दूर से आ रही है बारिश
अपनी पूरी आहट और आवाज़ के साथ ।
जहाँ से
जिस लोक से आ रही है बारिश
वहाँ भी तो अक्सर आते जाते होंगे बुद्ध
परखते होंगे प्रकृति का रसायन
या मनुष्य देहों की आँच से निर्मित
इन्द्रधनुष में
खोजते होंगे अपने मन का रंग ।

कमरे की खिड़की से
दिखाई दे रहे हैं आर्द्र होते बुद्ध
उनके पार्श्व से बह रही है करुणा की विरल धार ।
मैं गिनता हूँ उँगलियों पर बीतते जाते दिन
आती हुई रातें
और सपना होता एक संसार ।

यहाँ भी हैं वहीं बुद्ध
जिन्हें देखा था सारनाथ-काशी में
या चौखाम-तेजू-इम्फ़ाल में।
वही बुद्ध
जिन्हें छुटपन से देखता आया हूँ
इतिहास की वज़नी क़िताबों में
कविता में
सिनेमा के पर्दे पर
संग्रहालयों के गलियारे में
सजावटी सामान की दुकानों पर
पर उन्हें देखने से बचता रह स्वयं के भीतर
हर जगह — हर बार।

यह चन्द्रभागा है
नदी के नाम का एक होटल आरामदेह
केलंग की आबादी से तनिक विलग एक और केलंग
जैसे देह से विलग कोई दूसरी देह
काठ और कंक्रीट का एक किलानुमा निर्माण
कुछ दिन का मेरा अपना अस्थाई आवास
फिर प्रयाण
फिर प्रस्थान
फिर निष्क्रमण
जग के बारे में भी
ऐसा ही कहते पाए जाते हैं मुखर गुणीजन
और इस प्रक्रिया में बार-बार उद्धृत किए जाते हैं बुद्ध।

बुद्ध बहुत मूल्यवान हैं हमारे लिए
उनके होने से होता है सब कुछ
उनके होने से कुछ भी नहीं रह जाता है सब कुछ ।
टटोलता हूँ अपना समान
काले रंग की छतरी बैग में है अब भी विद्यमान
चलूँ तान दूँ उनके शीश पर
बारिश में भीग रहे हैं बुद्ध
और उनके पार्श्व से बह रही है करुणा की विरल धार
मैं इसी संसार में हूँ
और सपना होता जा रहा है संसार ।

 

 

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