'ज़फ़र' इक़बाल

‘ज़फ़र’ इक़बाल की रचनाएँ

अभी आखें खुली हैं और क्या क्या

अभी आखें खुली हैं और क्या क्या देखने को
मुझे पागल किया उस ने तमाशा देखने को

वो सूरत देख ली हम ने तो फिर कुछ भी न देखा
अभी वर्ना पड़ी थी एक दुनिया देखने को

तमन्ना की किसे परवा के सोने जागने में
मुयस्सर हैं बहुत ख़्वाब-ए-तमन्ना देखने को

ब-ज़ाहिर मुतमइन मैं भी रहा इस अंजुमन में
सभी मौजूद थे और वो भी ख़ुश था देखने को

अब उस को देख कर दिल हो गया है और बोझल
तरसता था यही देखो तो कितना देखने को

अब इतना हुस्न आँखों में समाए भी तो क्यूँकर
वगरना आज उसे हम ने भी देखा देखने को

छुपाया हाथ से चेहरा भी उस ना-मेहरबाँ ने
हम आए थे ‘ज़फ़र’ जिस का सरापा देखने को.

बस एक बार किसी ने गले लगाया था

बस एक बार किसी ने गले लगाया था
फिर उस के बाद न मैं था न मेरा साया था

गली में लोग भी थे मेरे उस के दुश्मन लोग
वो सब पे हँसता हुआ मेरे दिल में आया था

उस एक दश्त में सौ शहर हो गए आबाद
जहाँ किसी ने कभी कारवाँ लुटाया था

वो मुझ से अपना पता पूछने को आ निकले
के जिन से मैं ने ख़ुद अपना सुराग़ पाया था

मेरे वजूद से गुलज़ार हो के निकली है
वो आग जिस ने तेरा पैरहन जलाया था

मुझी को ताना-ए-ग़ारत-गरी न दे प्यारे
ये नक़्श मैं ने तेरे हाथ से मिटाया था

उसी ने रूप बदल कर जगा दिया आख़िर
जो ज़हर मुझ पे कभी नींद बन के छाया था

‘ज़फर’ की ख़ाक में है किस की हसरत-ए-तामीर
ख़याल-ओ-ख़्वाब में किस ने ये घर बनाया था

चलो इतनी तो आसानी रहेगी

चलो इतनी तो आसानी रहेगी
मिलेंगे और परेशानी रहेगी

इसी से रौनक़-ए-दरिया-ए-दिल है
यही इक लहर तूफ़ानी रहेगी

कभी ये शौक़ ना-मानूस होगा
कभी वो शक्ल अनजानी रहेगी

निकल जाएगी सूरत आइने से
हमारे घर में हैरानी रहेगी

सुबुक-सर हो के जीना है कोई दिन
अभी कुछ दिन गिराँ-जानी रहेगी

सुनोगे लफ़्ज़ में भी फड़फड़ाहट
लहू में भी पर-अफ़शानी रहेगी

हमारी गरम-गुफ़्तारी के बा-वस्फ़
हवा इतनी ही बर्फ़ानी रहेगी

अभी दिल की सियाही ज़ोर पर है
अभी चेहरे पे ताबानी रहेगी

‘ज़फ़र’ मैं शहर में आ तो गया हूँ
मेरी ख़सलत बयाबानी रहेगी

चमकती वुसअतों में जो गुल-ए-सहरा

चमकती वुसअतों में जो गुल-ए-सहरा खिला है
कोई कह दे अगर पहले कभी ऐसा खिला है

अज़ल से गुलशन-ए-हस्ती में है मौजूद भी वो
मगर लगता है जैसे आज ही ताज़ा खिला है

बहम कैसे हुए हैं देखना ख़्वाब और ख़ुश-बू
गुज़रते मौसमों का आख़िरी तोहफ़ा खिला है

लहू में इक अलग अंदाज़ से मस्तूर था वो
सर-ए-शाख़-ए-तमाशा और भी तन्हा खिला है

कहाँ ख़ाक-ए-मदीना और कहाँ ख़ाकस्तर-ए-दिल
कहाँ का फूल था लेकिन कहाँ पर आ खिला है

कभी दिल पर गिरी थी शबनम-ए-इस्म-ए-मोहम्मद
मेरी हर साँस में कलयों का मजमूआ खिला है

यही रोज़न बनेगा एक दिन दीवार-ए-जाँ में
मेरे दिल में नदामत का जो इक लम्हा खिला है

यहीं तक लाई है ये ज़िन्दगी भर की मसाफ़त
लब-ए-दरियाँ हूँ मैं और वो पस-ए-दरिया खिला है

बिखरता जा रहा है दूर तक रंग-ए-जुदाई
‘ज़फर’ क्या पूछते हो ज़ख्म-ए-दिल कैसा खुला है

Share