ज़ाहिदा जेदी

ज़ाहिदा जेदी की रचनाएँ

तख़ईल का दर खोले हुए शाम खड़ी है

तख़ईल का दर खोले हुए शाम खड़ी है
गोया कोई तस्वीर ख़यालों में जड़ी है

हर मंज़र-ए-इदराक में फिर जान पड़ी है
एहसास-ए-फ़रावाँ है कि सावन की झड़ी है

है वस्ल का हंगाम कि सैलाब-ए-तजल्ली
तूफ़ान-ए-तरन्नुम है कि उल्फ़त की घड़ी है

तहज़ीब-ए-अलम कहिए कि इरफ़ान-ए-ग़म-ए-ज़ात
कहने को तो दो लफ़्ज़ हैं हर बात बड़ी है

साया हो शजर का तो कहीं बैठ के दम लें
मंज़िल तो बहुत दूर है और धूप कड़ी है

सीने पर मिरे वक़्त का ये कौन गिराँ हैं
नेज़े की अनी या कि कलेजे में गड़ी है

वो मेरी ही गुम-गश्ता हक़ीक़त तो नहीं है
रस्ते में कई रोज़ से शय कोई पड़ी है

हर लहज़ा पिरोती हूँ बिखर जाते हैं हर बार
लम्हात-ए-गुरेज़ाँ हैं कि मोती की लड़ी है

हम और ख़ुदा का भी ये एहसान उठाते
इंसान है कुछ ऐसी ही बात आन पड़ी है

बू-ए-गुल रक़्स में है बाद-ए-ख़िज़ाँ रक़्स में है

बू-ए-गुल रक़्स में है बाद-ए-ख़िज़ाँ रक़्स में है
ये ज़मीं रक़्स में है सारा जहाँ रक़्स में है

रूह सरशार है और चश्म-ए-तख़य्युल बेदार
बाद मुद्दत के वही शोला-ए-जाँ रक़्स में है

जल उठे ज़ेहन के ऐवान में लफ़्ज़ों के चराग़
आज फिर गर्मी-ए-अंदाज-ए-बयाँ रक़्स में है

फिर किसी याद की कश्ती में रवाँ है लम्हात
जू-ए-दिल रक़्स में है वादी-ए-जाँ रक़्स में है

कितना जाँ-बख़्श है ये इश्क़ की वादी का सफ़र
नग़्मा-ज़न ताइफ़-ए-लज़्ज़त-ए-जाँ रक़्स में है

बंद आँखों में लरज़ता है कोई मंज़र-ए-नूर
जैसे ताबिंदा सितारों का जहाँ रक़्स में है

महज़र-ए-शौक़ में पैकार-ए-गुमाँ से आगे
ज़ेहन है नग़्मा-सरा जज़्ब-ए-निहाँ रक़्स में है

ख़्वाब तो ख़्वाब हैं पल भर में बिखर जाते हैं
सच तो ये है कि बस इक काहिश-ए-जाँ रक़्स में है

बीच सागर में तो थे हौसले मौजों सें बुलंद
और साहिल पे इक एहसास-ए-ज़ियाँ रक़्स में है

बू-ए-गुल रक़्स में है बाद-ए-ख़िज़ाँ रक़्स में है

बू-ए-गुल रक़्स में है बाद-ए-ख़िज़ाँ रक़्स में है
ये ज़मीं रक़्स में है सारा जहाँ रक़्स में है

रूह सरशार है और चश्म-ए-तख़य्युल बेदार
बाद मुद्दत के वही शोला-ए-जाँ रक़्स में है

जल उठे ज़ेहन के ऐवान में लफ़्ज़ों के चराग़
आज फिर गर्मी-ए-अंदाज-ए-बयाँ रक़्स में है

फिर किसी याद की कश्ती में रवाँ है लम्हात
जू-ए-दिल रक़्स में है वादी-ए-जाँ रक़्स में है

कितना जाँ-बख़्श है ये इश्क़ की वादी का सफ़र
नग़्मा-ज़न ताइफ़-ए-लज़्ज़त-ए-जाँ रक़्स में है

बंद आँखों में लरज़ता है कोई मंज़र-ए-नूर
जैसे ताबिंदा सितारों का जहाँ रक़्स में है

महज़र-ए-शौक़ में पैकार-ए-गुमाँ से आगे
ज़ेहन है नग़्मा-सरा जज़्ब-ए-निहाँ रक़्स में है

ख़्वाब तो ख़्वाब हैं पल भर में बिखर जाते हैं
सच तो ये है कि बस इक काहिश-ए-जाँ रक़्स में है

बीच सागर में तो थे हौसले मौजों सें बुलंद
और साहिल पे इक एहसास-ए-ज़ियाँ रक़्स में है

मारा हमें इस दौर की आसाँ-तलबी ने

मारा हमें इस दौर की आसाँ-तलबी ने
कुछ और थे इस दौर में जीने के करीने

हर जाम लहू-रंग था देखा ये सभी ने
क्यूँ शीशा-ए-दिल चूर था पूछा न किसी ने

अब हल्क़ा-ए-गिर्दाब ही आग़ोश-ए-सुकूँ है
साहिल से बहुत दूर डुबोए हैं सफ़ीने

हर लम्हा-ए-ख़ामोश था इक दौर-ए-पुर-आशोब
गुज़रे हैं इसी तौर से साल और महीने

माज़ी के मज़ारो की तरफ़ सोच के बढ़ना
हो जाओगे मायूस न खो दो ये दफ़ीने

हर बज़्म-ए-सुख़न झूठे नगीनों की नुमाइश
सरताज-ए-सुख़न थे जो कहाँ है वो नगीने

वो हमें राह में मिल जाएँ ज़रूरी तो नहीं

वो हमें राह में मिल जाएँ ज़रूरी तो नहीं
ख़ुद-ब-ख़ुद फ़ासले मिट जाएँ ज़रूरी तो नहीं

चाँद चेहरे कि हैं गुम वक़्त के सन्नाटे में
हम मगर उन को भुला पाएँ ज़रूरी तो नहीं

जिन से बिछड़े थे तो तारीक थी दुनिया सारी
हम उन्हें ढूँढ के फिर लाएँ ज़रूरी तो नहीं

तिश्नगी हद से सिवा और सफ़र जारी है
पर सराबों से बहल जाएँ ज़रूरी तो नहीं

ज़िंदगी तू ने तो सच है कि वफ़ा हम से न की
हम मगर ख़ुद तुझे ठुकराएँ ज़रूरी तो नहीं

जू-ए-एहसास में लर्ज़ां ये गुरेजाँ लम्हात
नग़्मा-ए-दर्द में ढल जाएँ ज़रूरी तो नहीं

ये तो सच है कि इक उम्र से बस एक तलाष
हम मगर अपना पता पाएँ ज़रूरी तो नहीं

सिवा है हद से अब एहसास की गिरानी भी

सिवा है हद से अब एहसास की गिरानी भी
गिराँ गुज़रने लगी उन की मेहरबानी भी

किस एहतिमाम से पढ़ते रहे सहीफ़ा-ए-ज़ीस्त
चलहें कि ख़त्म हुई अब तो वो कहानी भी

लिखो तो ख़ून-ए-जिगर से हवा की लहरों पर
ये दास्ताँ अनोखी भी है पुरानी भी

किसी तरह से भी वो गौहर-ए-तलब न मिला
हज़ार बार लुटाई है ज़िंदगानी भी

हमीं से अंजुमन-ए-इश्क़ मो‘तबर ठहरी
हमीं को सौंपी गई ग़म की पासबानी भी

ये क्या अजब कि वही बहर-ए-नीस्ती में गिरी
नफ़्स की मौज में मस्ती भी थी रवानी भी

शुऊर ओ फ़िक्र से आगे है चश्मा-ए-तख़्लीक
हटेगा संग तो बहने लगेगा पानी भी

क़तरा-ए-आब को कब तक मेरी धरती तरसे

क़तरा-ए-आब को कब तक मेरी धरती तरसे
आग लग जाए समुन्दर में तो पानी बरसे

सुर्ख़ मिट्टी की रिदा ओढ़े है कब से आकाश
ना शफ़क़ फूले ना रिमझिम कहीं बादल बरसे

हम को खींचे लिए जाते हैं सराबोरी के भँवर
जाने किस वक़्त में हम लोग चले थे घर से

किस की दहशत है कि परवाज़ से ख़ैफ़ हैं तुयूर
क़ुमरियाँ शोर मचाती नहीं किस के डर से

चार-सू कूचा ओ बाज़ार मेरी महशर है बापा
ख़ौफ़ से लोग निकलते नहीं अपने घर से

मुड़ के देखा तो हमें छोड़ के जाती थी हयात
हम ने जाना था कोई बोझ गिरा है सर से

Share