तोरनदेवी ‘लली’की रचनाएँ

नवसंवत

यही सोचती हूँ नवसंवत्!
कैसी होंगी तेरी-
वे नई लहर की घड़ियाँ।
जब सबके हृदयों में होगा, सहज आत्म-अभिमान।
जब सब भाँति प्रदर्शित होगा, माता का सम्मान॥
जब टूट चुकेंगी सारी-
इस दृढ़ बन्धन की कड़ियाँ।
जब नारी सतवन्ती हांेगी, लाज बचाने वाली।
जब शिशुओं के मुख पर होगी, स्वतंत्रता की लाली॥
जब समय आप पहनेगा, सुन्दर मोती की लड़ियाँ।
‘लली’ विश्व में गूंज उठेगा, अमर राष्ट्र का गान॥
जिसके प्रति शब्दों में होगा, देश-धर्म का ज्ञान॥
नव संवत्! तब देखूँगी-
वे तेरी सुख की घड़ियाँ।

प्रणाम!

सादर सस्नेह प्रणाम आज, उन चरणों में शतकोटिवार!
माता के लाल लड़ैते थे,
भगिनी के वीर बाँकुरे थे,
सौभाग्यवान जीवन के थे,
जीवन थे प्राण-पियारे थे।
वे सब की भावाी आशा थे, थे जन्मभूमि के होनहोर!!
वे देश-प्रेम मतवाले थे,
माता के चरण-पुजारी थे,
पुरुषों मंे थे वे पुरुष-सिंह,
कर्त्तव्य-धर्म-ब्रत-धारी थे!
प्राणों को हँसकर छोड़ दिया, पर प्राण न तजा अपना अपार!!
वे ज्ञानवान थे, योगी थे,
अनुपम त्यागी थे, सज्जन थे,
वे वीर हठीले सैनिक थे,
तेजस्वी थे, विद्वज्जन थे!
कर्त्तव्य-कर्म की ओर बढ़े, फल की सारी सुध-बुध बिसार!!
तम-पूर्ण निशा में ज्योति हुए,
पथ-दर्शक कंटकमय मग के,
मरकर भी हैं वे अमर बने,
आदर्श हुए भावी जग के!
मंगलमय था बलिदान और वे थे भारतमाँ के शृँगार!
सादर सस्नेह प्रणाम आज, उन चरणों में शतकोटिवार!!

मनमोहन श्याम हमारे!

मनमोहन श्याम हमारे!
अब फिर कब दर्शन दोगे?
शबरी गणिका गीध अजामिल
सब को लिया उबार।
द्रु पदसुता की लाज बचाकर
कर गज का उद्वार।
हे दीनन के रखवारे,
क्या मेरी भी सुध लोगे?
भूली नहीं मधुर मुरली की
विश्व विमोहनि तान।
नाथ आज भी जाग रहा
वह गीता का ज्ञान।

जसुदा के लालन प्यारे

जसुदा के लालन प्यारे कब कुंजों में विहरोगे?
कब हे आराध्य हमारे हमसे फिर आन मिलोगे?
सुख से ही परिपूरित होगा मिट जायेंगे वलेश।
केवल ‘लली’ इसी आशा पर जीवित है यह देश।

अभिलाषा

मुझसे मिल जाना इकबार।
कहाँ-कहाँ मैं ढूँढ़ रही हूँ, कब से रहो पुकार।
मुझसे मिल जाना इकबार॥
नव-कुसुमों की कुंज-लता में,
निशि-तारों की सुन्दरता में,
सरल हृदय की उज्ज्वलता में,
कुसुमित दल की माधुरता में।
कितना तुमको खोज चुकी हूँ,
जिसका वार न पार।
मुझसे मिल जाना इकबार॥
सरिता की गति मतवाली में,
प्रिय वसन्त की हरियाली में,
बाल-प्रभाकर की लाली में,
निशा-नाथ की उजियाली में।
आशावादी बनकर लोचन,
अब तक रहे निहार।
मुझसे मिल जाना इकबार॥
अब देखूँगी उत्थानों में,
देश-प्रेम के अभिमानों में,
वीर-श्रेष्ठ के गुण-गानों में,
अमर सुयश शुभ सम्मानों में।
दर्शन होते ही तज दूँगी,
हिय-वेदना अपार।
मुझसे मिल जाना इकबार।

कलिका

नव कलिका तुम कब विकसी थीं,
इसका मुझको ज्ञान नहीं।
हुई समर्पित श्रीचरणों पर,
कब इसका कुछ ध्यान नहीं॥
हृदय-संगिनी सरल मधुरता-
में देखा अभिमान नहीं।
सच है गुण, धन, यौवन-मद का,
दुनियाँ में सम्मान नहीं॥
इसी हेतु सब श्रेष्ठ गुणों से,
पूरित तुमको अपनाया।
नव कलिका जब तुमको देखा,
तभी पूर्ण विकसित पाया॥
नन्दन कानन में सुरभित-
होने की तुमको चाह नहीं।
हृदय वेधकर हृदय-स्थल तक,
जाने को है दाह नहीं॥
मंत्र-मुग्ध से जग-जन होवें,
इसकी कुछ परवाह नहीं।
इन पवित्र मुसकानों में है,
छिपी हुई वह आह! नहीं॥
प्रेममयी इस अखिल-विश्व को,
अचल प्रेम से अपनाना।
यदि मिल जावें युगल चरण वह,
तुम उन पर बलि हो जाना॥

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