फ़ाज़िल जमीली

फ़ाज़िल जमीली की रचनाएँ

गुज़रती है जो दिल पर वो कहानी याद रखता हूँ

गुज़रती है जो दिल पर वो कहानी याद रखता हूँ
मैं हर गुल-रंग चेहरे को ज़ुबानी याद रखता हूँ

मैं अक्सर खो सा जाता हूँ गली कूचें के जंगल में
मगर फिर भी तेरे घर की निशानी याद रखता हूँ

मुझे अच्छे बुरे से कोई निसबत है तो इतनी है
के हर ना-मेहर-बाँ की मेहर-बानी याद रखता हूँ

कभी जो ज़िंदगी की बे-सबाती याद आती है
तो सब कुछ भूल जाता हूँ जवानी याद रखता हूँ

मुझे मालूम है कैसे बदल जाती हैं तारीखें
इसी ख़ातिर तो मैं बातें पुरानी याद रखता हूँ

ख़िज़ाँ का रंग दरख़्तों पे आ के बैठ गया

ख़िज़ाँ का रंग दरख़्तों पे आ के बैठ गया
मैं तिलमिला के उठा फड़फड़ा के बैठ गया

किसी ने जाम उछाला ब-नाम-ए-शाम-ए-अलम
कोई मलाल की वहशत छुपा के बैठ गया

मिला न जब कोई महफ़िल में हम-नशीनी को
मैं इक ख़याल के पहलू में जा के बैठ गया

पुराने यार भी आपस में अब नहीं मिलते
न जाने कौन यहाँ दिल लगा के बैठ गया

मिल बग़ैर बिछड़ने को क्या कहा जाए
बस इक ख़लिश थी जिसे मैं निभा के बैठ गया

मैं अपने आप से आगे निकलने वाला था
सो ख़ुद को अपनी नज़र से गिरा के बैठ गया

किस ख़बर थी न जाएगी दिल की वीरानी
मैं आईनों में बहुत सज-सजा के बैठ गया

ख़्वाब में देख रहा हूँ के हक़ीक़त में उसे

ख़्वाब में देख रहा हूँ के हक़ीक़त में उसे
मैं कभी देख नहीं सकता मुसीबत में उसे

वो मेरा यार-ए-तरह-दार के ख़ुश-फ़हम भी है
कोई धोका ही न दे जाए मोहब्बत में उसे

ज़िंदगी हो तो कई काम निकल आते हैं
याद आऊँगा कभी मैं भी ज़रूरत में उसे

इक तअल्लुक़ था के शीशे की तरह टूट गया
जोड़ सकता ही नहीं मैं किसी सूरत में उसे

आज तक जिस्म मेरा टूट रहा है ‘फ़ाज़िल’
मैं ने देखा था कभी नींद की हालत में उसे

मेरे होटों पे तेरे नाम की लरज़िश तो नहीं

मेरे होटों पे तेरे नाम की लरज़िश तो नहीं
ये जो आँखों में चमक है कोई ख़्वाहिश तो नहीं

रंग मलबूस हुए लम्स हुई है ख़ुश-बू
आज फिर शहर में फूलों की नुमाइश तो नहीं

एक ही साँस में दोहराए चले जाते हैं
ये मोहब्बत कहीं अल्फ़ाज की वरज़िश तो नहीं

देखता रहता हूँ चुप-चाप गुज़रते बादल
ये तअल्लुक भी कोई धूप की बारिश तो नहीं

तुम कभी एक नज़र मेरी तरफ़ भी देखो
एक तवक़्को ही तो है कोई गुज़ारिश तो नहीं

मिल भी जाएँ कहीं आँखें तो मरम्मत न करें
हम में ऐसी कोई तल्ख़ी कोई रंजिश तो नहीं

मेरे वजूद को परछाइयों ने तोड़ दिया / फ़ाज़िल जमीली
फ़ाज़िल जमीली »

मेरे वजूद को परछाइयों ने तोड़ दिया
मैं इस हिसार था तनहाइयों ने तोड़ दिया

बहम जो महफ़िल-ए-अग़्यार में रहे थे कभी
ये सिलसिला भी शनासाइयों ने तोड़ दिया

बस एक रब्त निशानी था अपने पुरखों की
इसे भी आज मेरे भाइयों ने तोड़ दिया

तू बे-ख़बर है मगर नींद से भरी लड़की
मेरा बदन तेरी अँगड़ाइयों ने तोड़ दिया

ख़िजाँ की रूत में भी मैं शाख से नहीं टूटा
मुझे बहार की पुरवाइयों ने तोड़ दिया

मेरा भरम था यही एक मेरी तनहाई

ये इक भरम भी तमाशाइयों ने तोड़ दिया

मेरे वजूद को परछाइयों ने तोड़ दिया

मेरे वजूद को परछाइयों ने तोड़ दिया
मैं इस हिसार था तनहाइयों ने तोड़ दिया

बहम जो महफ़िल-ए-अग़्यार में रहे थे कभी
ये सिलसिला भी शनासाइयों ने तोड़ दिया

बस एक रब्त निशानी था अपने पुरखों की
इसे भी आज मेरे भाइयों ने तोड़ दिया

तू बे-ख़बर है मगर नींद से भरी लड़की
मेरा बदन तेरी अँगड़ाइयों ने तोड़ दिया

ख़िजाँ की रूत में भी मैं शाख से नहीं टूटा
मुझे बहार की पुरवाइयों ने तोड़ दिया

मेरा भरम था यही एक मेरी तनहाई
ये इक भरम भी तमाशाइयों ने तोड़ दिया

मिसाल-ए-शम्मा जला हूँ धुआँ सा बिखरा हूँ

मिसाल-ए-शम्मा जला हूँ धुआँ सा बिखरा हूँ
मैं इंतिज़ार की हर कैफियत से गुज़रा हूँ

सब अपने अपने दियों के असीर पाए गए
मैं चाँद बन के कई आँगनों में उतरा हूँ

कुछ और बढ़ गई बारिश में बे-बसी अपनी
न बाम से न किसी की गली से गुज़रा हूँ

पुकारती थी मुझे साहिलों की ख़ामोशी
मैं डूब डूब के जो बार बार उभरा हूँ

क्यूँ इतना मेरे ख़यालों में बस गया है कोई
कभी किसी के तसव्वुर से मैं भी गुज़रा हूँ

कोई तो आज मुझे आँख भर के देखेगा
मैं आज अपने लहू में नहा के निखरा हूँ

सुफ़ेद-पोशी-ए-दिल का भरम भी रखना है

सुफ़ेद-पोशी-ए-दिल का भरम भी रखना है
तेरी ख़ुशी के लिए तेरा ग़म भी रखना है

दिल ओ नज़र में हज़ार इख़्तिलाफ हों लेकिन
जो इश्‍क़ है तो फिर उन को बहम भी रखना है

बिछड़ने मिलने के मानी जुदा जुदा क्यूँ हैं
हर एक बार जब आँखों को नम भी रखना है

हसीन है तो उसे अपनी बात रखने को
करम के साथ रवा कुछ सितम भी रखना है

ज़्यादा देर उसे देखना भी है ‘फ़ाजिल’
और अपने आप को थोड़ा सा कम भी रखना है

ज़िंदगानी को अदम-आबाद ले जाने लगा

ज़िंदगानी को अदम-आबाद ले जाने लगा
हर गुज़रता दिन किसी की याद ले जाने लगा

एक महफिल से उठाया है दिल-ए-ना-शाद ने
एक महफिल में दिल-ए-ना-शाद ले जाने लगा

किस तरफ़ से आ रहा है कारवाँ असबाब का
किस तरफ़ ये ख़ान-माँ-बर्बाद ले जाने लगा

इस सितारा मिल गया था रात की तमसील में
आसमानों तक मेरी फ़रियाद ले जाने लगा

मैं ही अपनी कै़द में था और मैं ही एक दिन
कर के अपने आप को आज़ाद ले जाने लगा

मैं तुम्हें याद भी आया के नहीं

मैं तुम्हें याद भी आया कि नहीं…

राह चलते या कहीं बैठ के सुस्ताते हुए
आते-जाते हुए, बेवजह कहीं रुकते हुए
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए, ज़ुल्फ़ को सुलझाते हुए
घर में आए किसी मेहमान की तवज्जोह करते
चाय देते हुए हाथों से प्याली गिरते
मैं तुम्हें याद भी आया कि नहीं…

घूमते-फिरते हुए, लांग-ड्राइव करते
चूड़ियाँ लेते हुए, ईद की शॉपिंग करते
घर से जाते हुए या शाम को घर आते हुए
बेख़याली में किसी ख़याल में खो जाते हुए
दुनियादारी से बहुत दूर निकल जाते हुए
मैं तुम्हें याद भी आया कि नहीं…

पिछले दो-चार जो दिन गुज़रे हैं
क्या कहूँ कितने कठिन गुज़रे हैं
इन्तज़ार इतना किया है कि सदी हो जैसे
बेबसी अपने मुक़द्दर में लिखी हो जैसे

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