बहादुर पटेल

बहादुर पटेल की रचनाएँ

शब्द

हमारे पास शब्दों की कमी बहुत
यही वज़ह है कि
बचा नहीं सकते कुछ भी ऎसा
कि जैसे चिड़िया की चहचहाहट
सब कुछ होते हुए भी शब्दों का न होना
कुछ नहीं होने जैसा है

दीवार है हमारे पास
जिसे खड़ा करते हम अपने चारों ओर
जीवन के भीतर ऎसा कोई उजास नहीं
जिसके बल पर खड़ी की जा सकती हो कोई इमारत
न कोई ऎसा ठिकाना कि आसपास महसूस हो जीवन

ऎसी कोई आवाज़ भी नहीं
जिसकी धमक से खिंचा चला आए कोई
और सुनें हमें धरती पर जीवन रहने तक
शब्दों के बिना हम कैसे सुना सकते हैं जीवनराग
कैसे बताएँ कि तितली का
रंग और सुगन्ध से बहुत गाढ़ा रिश्ता है
जैसे शब्द का भाषा और संस्कृति से

बिना शब्दों के मनुष्यता से तो बाहर होते ही हैं
भाषा की दुनिया मे भी नहीं हो सकते दाख़िल।

भ्रम

यह जो समय का एक लम्बा-सा हिस्सा
दूर तक दिखाई दे रहा है
और वह छोर जैसा वहाँ कुछ दिखाई दे रहा है
हम उस तक पहुँचना चाहते हैं
सचमुच भ्रम है

आप चाहें कि वहाँ पहुँच कर
खोल दें फन्दा और दिख जाए सब कुछ साफ़-साफ़
भ्रम एक ऎसा अदृश्य द्वार है
जिसके आर-पार देख पाना
ठीक उतना ही कठिन है
जितना कि एक बेईमान आदमी के भीतर
देख पाना बेईमानी

अब आप एक पैमाना तैयार करेंगे
जिससे सब-कुछ माप लेना चाहें
पर कुछ ऎसे क्षण होते हैं
जिनके भीतर इतना ताप होता है
कि आप उसकी पहुँच से दूर रह जाते हैं

वैसे देखा जाए तो लड़ाई शुरू होती है
तो उसका कोई छोर हमारी पकड़ में नहीं आता
भ्रम पैदा होता है छोर तक पहुँचने का
इस तरह भ्रम के संसार में पड़ते हैं हमारे क़दम।

दोस्त

दोस्त! तुम्हारा जो यह दोस्ती का ढंग है
यह तुम जो मेरे साथ
मित्रता का बर्ताव करते हो

सचमुच तुम्हारे भीतर यह जो लावा है
धीरे-धीरे मुझे पिघलाता जा रहा है
इसके बाद यह जो धातु का रेला
तुम्हारी ओर बढ़ता है
इसके पीछे जो निशान है
वे आज तक मेरे हृदय पर मौज़ूद हैं

दोस्त! कितना कठिन होता है
जीवन में बिना किसी मित्र के एक
क़दम उठाना
ये दोस्ती भी अजब चीज़ होती है
इसके भीतर जो गीलापन है
उसमें भीगते रहते हैं हम
और वह धीरे-धीरे हमें करता रहता है ख़त्म

कभी हम दोस्ती के नाम से जाने जाएँ
और ज़बरदस्त यारी के
ज़बरदस्त दुश्मनी में भी
दोस्ती ही बनी र्हे पहचान हमेशा
तो दोस्त एक भी दोस्ती के हक़ में
एक बात तो है ही।

स्मृतियाँ हैं ये भी

पुरानी शिला के नीचे से निकल आती
बिच्छू-सी
अवचेतन में मारती हुई डंक
स्मृतियाँ बार-बार लौटती हैं
टहलते हुए निकल जाते हैं उनमें
दोहराते हुए घटनाओं को
बहुत सारा समय
थोड़ी देर में घूम जाता है भीतर

बचपन का वह मसूम चेहरा
पीछे छिपा शरारत भरा दिमाग़
फ़ज़ीहत रास्ते चलतों की
मनोरंजन हुआ करती हमारे लिए
तैर आती हैं घटनाएँ
अपनी शरारतों पर
बचपन की हँसी चेहरे के परदे पीछे

श्रेणियाँ हुआ करती थीं हमारी
जो तय होती थीं कारस्तानियों की बिना पर
अध्यापकों की छड़ियाँ
जानती थीं हमारे हाथों का स्वाद
उन छड़ियों का स्वाद
हमारे सभ्य होने के पीछे खड़ा है

स्मृतियाँ पीछा नहीं छोड़तीं
पड़ जाती हैं छड़ी लेकर पीछे
और हमें करनी पड़ती है याद
पहाड़ों, प्रश्नोत्तरों की तरह आज भी
वे बना लेती हैं जगह

स्मृति में माफ़ करते हैं
बचपन की शैतानियों को
कचोटने लगती हैं
इस समय की ऎसी घटनाएँ
जो तैयार होती हैं समझ के घालमेल से
स्मृतियाँ हैं ये भी
जिन्हें भुलाना हमारे वश का नहीं होता

हमारे भीतर स्मृतियों के लिए होती है बहुत सारी जगह।

सामंजस्य

तुम्हारा मुस्कुराना इस तरह
दिल में हलचल पैदा करता है
मानो
हरी-हरी कोंपले निकलने
के लिए आतुर हों
और मैं उस पौध को
सींच रहा हूँ अनवरत
ताकि
कोंपलें निकलती रहें
लगातार, लगातार।

सुबह

ऎन सुबह चाँद बहुत सुन्दर लगा
जाते-जाते
उसने अलविदा कहा
फिर मिलने के वास्ते
कुछ टुकड़े चाँदनी के बिखर गए
उसकी रोशनी से सूरज की
लालिमा धुल गई
साफ़ झक्क सूरज चमक रहा
आसमान में ।

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