बाक़र आग़ा वेलोरी

बाक़र आग़ा वेलोरी की रचनाएँ

अगरचे दिल को ले साथ अपने आया अश्क मिरा

अगरचे दिल को ले साथ अपने आया अश्क मिरा
निगाह में तिरी हरगिज़ न भाया अश्क मिरा

मैं तेरे हिज्र में जीने से हो गया था उदास
पे गर्म-जोशी से क्या क्या मनाया अश्क मिरा

हज़र ज़रूरी है ऐ सर्व-ए-नाज़ इस से तुझे
कि आबशार-ए-मिज़ा का बहाया अश्क मिरा

हुआ है कौन सै ख़ुर्शीद-रू से गर्म इतना
कि मेरे दिल को जो ऐसा जलाया अश्क मिरा

ब-रंग-ए-ग़ुंचा-ए-अफ़्सुर्दा हो गया था ये दिल
सो वैसे मुर्दा को पल में जलाया अश्क मिरा

हुआ वो जब नज़र-अंदाज़ यार का ‘आगाह’
मुझे ये बे-असरी पर हँसाया अश्क मिरा

क्यूँ कर न ऐसे जीने से या रब मलूल हूँ

क्यूँ कर न ऐसे जीने से या रब मलूल हूँ
जब इस तरह अदम का भी मैं ना-क़ुबूल हूँ

क्या ख़ूब मेरे बख़्त की मंडवे चढ़ी है बे
ना बाग़ न बहार न काँटा ना फूल हूँ

इस इश्क़ में ही कट गई सब उम्र पर हुनूज़
नालाएक़-ए-फ़िराक़ ना बाब-ए-वसूल हूँ

तालए की मेरे देखिए फूली है क्या बहार
अनवा ख़ार ख़ार से मैं जूँ बबूल हूँ

‘आगाह’ अब किसी की शिकायत में क्या करूँ
देखा जो ख़ूब आप ही अपना में मूल हूँ

महव-ए-फ़रियाद हो गया है दिल

महव-ए-फ़रियाद हो गया है दिल
आह बर्बाद हो गया है दिल

सीना-कावी में अपने नाख़ुन से
रश्क-ए-फ़रहाद हो गया है दिल

देखते देखते सितम तेरा
सख़्त नाशाद हो गया है दिल

करते ही करते तेरे क़द का ख़याल
मिस्ल-ए-शमशाद हो गया है दिल

हो के पाबंद तेरे काकुल से
सर से आज़ाद हो गया है दिल

उल्फ़त-ए-अहल-ए-बैत से ‘आगाह’
हैदराबाद हो गया है दिल

रहता है ज़ुल्फ़-ए-यार मिरे मन से मन लगा

रहता है ज़ुल्फ़-ए-यार मिरे मन से मन लगा
ऐ नाग तिरे हाथ से क्या ख़ूब मन लगा

देखा है जिन ने रू-ए-दिल-अफ़रोज़ को तिरे
बे-शक नज़र में बाग़-ए-इरम उस की बन लगा

सरसब्ज़ नित रखेंगे उन्हें मेरे अश्क ओ आह
ऐ नौ-बहार-ए-हुस्न जो चाहे चमन लगा

सीना सिपर कर आऊँगा कूचे में मैं तिरे
गरचा रक़ीब बैठे हैं वाँ तन से तन लगा

क्या फ़ाएदा है क़िस्सा-ए-रिज़वान से तुझे
कोई शम्अ-रू परी सते तू भी लगन लगा

‘आगाह’ ख़ार ख़ार जुदाई से हैं हज़ीं
यक-बार तू गले से उसे गुल-बदन लगा

शाहिद-ए-ग़ैब हुवैदा न हुआ था सो हुआ

शाहिद-ए-ग़ैब हुवैदा न हुआ था सो हुआ
हुस्न पर आप नै शैदा न हुआ था सो हुआ

ग़म्ज़ा-ए-शोख़-ए-सियह-मस्त तिरा मिज़्गाँ से
क़त्ल-ए-आशिक़ पे सफ़-आरा न हुआ था सो हुआ

हँस के वो ग़ुंचा-ए-दहन मेरी जिगर-ख़्वारी पर
कह दिया तेरा दिलासा न हुआ था सो हुआ

रिश्ता-ए-साफ निगह में हो मुसल्सुल आँसू
सीना-ए-यार में माला न हुआ था सो हुआ

सर-ए-सौदा पे तिरे शेर-ए-रसा से ‘आगाह’
सिलसिला हश्र का बरपा न हुआ था सो हुआ

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