बाबुषा कोहली

बाबुषा कोहली की रचनाएँ

चार तिलों की चाहत और एक बिन्दी लाल

ये किसकी इच्छा के अश्रु हैं
जो इस गोरी देह पर निर्लज्जता से जमे हुए काले पड़ रहे हैं

मेरी नाक पर एक थक्का है, जिसे घोड़े की पूँछ के बाल से मैं छील देना चाहती थी
मुट्ठी की उम्रक़ैद देना चाहती थी, हथेली पर उगी चाह को
तलुवे की खुजलाहट को घिस-घिस कर छुटाना चाहती थी
छाती के दर्द को मैं कर देना चाहती थी तड़ीपार

किसकी गाढ़ी लालसा ने आकार ले लिया है ?
कौन इन काले धब्बों पर हँसता है ?

रात और कुछ नहीं मेरी चाह की चादर है
मैंने जन्मों ओढ़ी हैं फटी चादरें
किसी नवजात शिशु की उजली देह हूँ मैं रात के अन्तिम पहर
एक क्षण के स्मरण में भीगी हुई बाती है मेरी उम्र
मैं जलती हूँ दीये-सी, मिट्टी की उजली देह हूँ
दीपक राग की तरह मुझे गुनगुनाता है ईश्वर
कौमार्य का आलोक हूँ

मेरी भौंहों के बीच अपने लहू का तिल कौन रख गया ?
कि जैसे दो पर्वतों के बीच उगा सूरज पोंछ जाता है रात की स्याही को

जलपरियाँ

उन मछलियों को अपने काँटों में मत फाँसो
उनकी छाती में पहले ही काँटा गड़ा है
कौन कहता है मछलियों की आवाज़ नहीं होती ?
मछलियों की पलकों में उलझी हैं सिसकियाँ
टुकुर-टुकुर बोलती जाती हैं निरन्तर
उनके स्वर से बुना हुआ है समुद्र का सन्नाटा

ऐसा कोई समुद्र नहीं जहाँ मछलियाँ रहती हों
समुद्र ठहरे हुए हैं मछलियों की आँखों में
दुनिया देख ली हमने बहुत, सातों समुद्र पार किए
जलपरियों के लिए कहीं भी सड़कें नहीं मिलतीं

बुरे वक़्त में

एक रात मैं पूरी ताक़त से चीख़ी कि शायद बुरा वक़्त दरक जाए
उस दिन जाना कि मेरे गले की नसें शीशे की थीं
दर्द के सारे मरहम दस मिनट की सनसनाहट के सिवाय कुछ भी नहीं

आदमी छू सकता है हाथ ऊँचा कर के चाँद को
मंगल में जीवन टटोलता है
अन्तरिक्ष में तैरती हैं जादुई मशीनें
क्या मज़ा कि इन्द्रधनुष अब भी अछूता है

पट्टियाँ रोकती हैं लहू का बहना
माथे पर गहरा चुम्बन दर्द सोखता है
एक कनकटे चितेरे के पास नहीं थी भाषा
यह बताने को, कि आख़िर उसे क्या चाहिए
उसकी जेब में बस कुछ चटख रंग रखे थे

रंगों की समझ अब भी अधकचरा है

बुरा वक़्त सिखाता है सच्ची हँसी का पाठ
हँसना, जीवन की कठिनतम कला है
कौन जानता है मुझसे बेहतर ये एक बात
कि बुद्ध कहते हैं सबसे मज़ेदार चुटकुले

बुरे वक़्त में फ़ाइलातुन-फ़ाइलातुन- फ़ाइलातुन की माला जपना
अपराध से कम तो हरगिज़ नहीं
बुरे वक़्त में हिज्जे की परवाह करना, एक ख़ास क़िस्म की चालाकी है

एक्स-रे रिपोर्ट बन कर रह जाता है आदमी बुरे वक़्त में
गिन लो कितनी गाँठें हैं, कितनी टूटन रूह में
मेरे पास नहीं है कोई भाषा
यह कहने को, कि आख़िर मुझे क्या चाहिए
बस्ते में थोड़े से रंग बचे हैं

आधी रात मेरे कान से लहू रिसता है
हवा में उड़ाती हूँ चुम्बन
टिक-टिक-टिक की लय गूँजती है आसमान में
दीवार पर वान गॉग हँसता है

बुरे वक़्त में सफ़ेद हुआ बाल झड़ भी जाए
तो सहेजा जाना चाहिए किसी जागीर की तरह
अपने बच्चों की ख़ातिर

तेजी ग्रोवर के लिए

निराकार गढ़ते हुए तोड़ना आकार

कब से तो मैं टूटी चप्पल पहने चल रही हूँ..
पाँव के छालों की मवाद नसों तक भर-भर आती हैं
हड्डियाँ अस्थि-कलश में पीड़ा से मुक्त होती हैं
कलश के बाहर लहकती हैं पीड़ा

जिसने जीवन को अपनी जिह्वा से चखा है
जिसने तोड़ा है टहनी पर उगा चन्द्रमा
जो उबलते फफोले पर हौले से ठण्डक बाँध जाता है
वो ब्रह्माण्ड का सबसे दहकता सितारा है

आकृतियाँ अदृश्य की परछाईं हैं
आकारों के पीछे नीला तिलिस्म है
सूर्य की आँखों में नमी खोजना प्रकृति के नियम को चुनौती है.

जादू अदृश्य में आकार लेते हैं.
अश्रु ग्रन्थि फट पड़ी है कठपुतली की आँख में  !
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तेजी ग्रोवर — हिन्दी की कवि

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