बालकवि बैरागी

बालकवि बैरागी की रचनाएँ

शिशुओं के लिए पाँच कविताएँ-1

1.

तितली करती ताथा थैया,
भँवरा करता गुन गुन गुन ।
खिलकर हँसते फूल हमेशा,
कलियाँ कहतीं हमे न चुन ।।

2.

जब से हम स्कूल गए हैं,
खेल-कूद सब भूल गए हैं ।
सब कहते हैं- पढ़ो-पढ़ो,
एक हिमालय रोज़ चढ़ो ।।

3.
माली वो जो जड़ को सींचे
हर डाली को प्यार करे ।
कली-कली को फूल बनाए,
ख़ुशबू का सत्कार करे ।।

4.

पेड़ हमें देते हैं फल,
पौधे देते हमको फूल ।
मम्मी हमको बस्ता देकर
कहती है जाओ स्कूल ।।

5.

कोयल कुहू-कुहू कर गाती
मीठे सुर में गाती मैना ।
काँव-काँव करते कौवे को
मौसम से क्या लेना-देना ?

शिशुओं के लिए पाँच कविताएँ-2

1.

सोचो-समझो और विचारो,
पेड़ों को पत्थर मत मारो ।
समझाता हमको विज्ञान,
उनमें भी होती है जान ।।

2.

सबसे हँसकर मीठा बोलो,
हमें बड़ों ने यही सिखाया ।
यही अगर हम सीख सके तो,
समझो जीवन सफल बनाया ।।

3.

चाट रही गैया बछड़े को,
पिला रही है अपना दूध ।
कूद रहा मस्ती से बछड़ा,
लम्बी, ऊँची, नीची कूद ।।

4.

फ़ोन की घंटी ज्यों ही बजती,
दीदी कहती- चलो ! चलो !
(पर) कुछ भी नहीं सुनाई पड़ता,
करते रहिए हलो ! हलो !

5.

नानी मेरी प्यारी नानी,
बातें करती बड़ी सयानी ।
मुझे कहानी रोज़ सुनाती,
मम्मी तक को डाँट पिलाती ।।

शिशुओं के लिए पाँच कविताएँ-3

1.

कंधे पर बंदूक चढ़ा कर,
ज्यों ही चला सिपाही ।
थर-थर लगा काँपने दुश्मन,
शामत आई ! शामत आई !!

2.

चाचा जी ने कुत्ता पाला,
चाची जी ने बिल्ली ।
मैंने जब तोता पाला तो,
गुस्सा हो गई दिल्ली ।।

3.

पापा जी ने कार ख़रीदी,
मम्मी जी ने साड़ी ।
मैंने जब आइसक्रीम ख़रीदी,
तब चल पाई गाड़ी ।।

4.

नुक्कड़-नुक्कड़ रीछ नचाता,
और कूटता पेट ।
मुफ़्त तमाशा देख-देख कर,
तोंद खुजाता सेठ ।।

5.

हमको समझाओ टीचर जी,
आख़िर ये है किसकी मर्ज़ी ।
बच्चे हलके, बस्ता भारी,
सॉरी-सॉरी, वेरी सॉरी ।।

विश्वास

शाम ढले पंछी घर आते,
अपने बच्चों को समझाते।
अगर नापना हो आकाश,
पंखों पर करना विश्वास।
साथ न देंगे पंख पराए,
बच्चों को अब क्या समझाए?

चाँद में धब्बा

गोरे-गोरे चाँद में धब्बा
दिखता है जो काला काला,
उस धब्बे का मतलब हमने
बड़े मजे से खोज निकाला।
वहाँ नहीं है गुड़िया बुढ़िया
वहाँ नहीं बैठी है दादी,
अपनी काली गाय सूर्य ने
चँदा के आँगन में बाँधी।

चाय बनाओ

बड़े सवेरे सूरज आया,
आकर उसने मुझे जगाया,
कहने लगा, ‘बिछौना छोड़ो
मैं आया हूँ सोना छोड़ो!’

मैंने कहा, ‘पधारो आओ,
जाकर पहले चाय बनाओ,
गरम चाय के प्याले लाना
फिर आ करके मुझे जगाना,
चलो रसोईघर में जाओ
दरवाजे पर मत चिल्लाओ।’’

-साभार: मेला, अप्रेल, 1980

आकाश

ईश्वर ने आकाश बनाया
उसमें सूरज को बैठाया
अगर नहीं आकाश बनाता
चाँद-सितारे कहाँ सजाता?
कैसे हम किरणों से जुड़ते?
ऐरोप्लेन कहाँ पर उड़ते?

खुद सागर बन जाओ

नदियाँ होतीं मीठी-मीठी
सागर होता खारा,
मैंने पूछ लिया सागर से
यह कैसा व्यवहार तुम्हारा?
सागर बोला, सिर मत खाओ
पहले खुद सागर बन जाओ!

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल
हो नंदलाल, रे नंदलाल

संग संग चढ़ाऊँगी नंदजी की गैयाँ
आठों पहर लूँगी तेरी बलैयाँ
बन के रहूँगी छबीली तेरी छैयाँ
मन के महल में रखूँगी नटखट
तुझे लाखों जनम लाखों साल
हो रे नंदलाल, रे नंदलाल
मुझ को भी राधा बना ले नंदलाल

मुझको भी राधा बना ले नंदलाल

यशोदा की अँगना मैं दूँगी बुहारी
तेरी मुरलिया को दूँगी न गारी
मटकी लुटा दूँगी माखन की सारी
बंसी बजैया …
बंसी बजैया ओ रे कन्हैया
मुझ को भी कर दे निहाल
मुझको भी राधा …

चरणों में तेरे लिपटके रहूँगी
तेरा दिया हर सुख\-दुख सहूँगी
छलिये तुझे कभी कुछ ना कहूँगी
जमुना किनारे …
जमुना किनारे रखूँगी सजाके
काया का केसरिया थाल

मुझको भी राधा ..

तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रे

तू चंदा मैं चांदनी, तू तरुवर मैं शाख रे
तू बादल मैं बिजुरी, तू पंछी मैं पात रे

ना सरोवर, ना बावड़ी, ना कोई ठंडी छांव
ना कोयल, ना पपीहरा, ऐसा मेरा गांव रे
कहाँ बुझे तन की तपन, ओ सैयां सिरमोल रे
चंद्र-किरन तो छोड़ कर, जाए कहाँ चकोर
जाग उठी है सांवरे, मेरी कुआंरी प्यास रे
(पिया) अंगारे भी लगने लगे आज मुझे मधुमास रे

तुझे आंचल मैं रखूँगी ओ सांवरे
काली अलकों से बाँधूँगी ये पांव रे
चल बैयाँ वो डालूं की छूटे नहीं
मेरा सपना साजन अब टूटे नहीं
मेंहदी रची हथेलियाँ, मेरे काजर-वाले नैन रे
(पिया) पल पल तुझे पुकारते, हो हो कर बेचैन रे

ओ मेरे सावन साजन, ओ मेरे सिंदूर
साजन संग सजनी बनी, मौसम संग मयूर
चार पहर की चांदनी, मेरे संग बिठा
अपने हाथों से पिया मुझे लाल चुनर उढ़ा
केसरिया धरती लगे, अम्बर लालम-लाल रे
अंग लगा कर साहिब रे, कर दे मुझे निहाल रे

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