बुद्धिलाल पाल की रचनाएँ

सफ़ेद रंग

अक्सर एक पंछी
हौले से उतर आता है
मेरे कंधे पर
और मैं सम्भावनाओं से
घिर जाता हूँ

चल रही हवाएँ बहुत तेज़
कभी पूरब से, कभी पश्चिम से
कभी उत्तर से, कभी दक्षिण से
और मैं डर जाता हूँ

रात में एक रोशनी
तारों के बीच से
गिरती है जंगलों में
और मैं उठाकर ले आता हूँ

मिलते हैं चश्में
रंगो-रंग के बाज़ार में
पर रंग सफ़ेद ही
अच्छा लगता है

यह मेरा मन है

गन्ध

आकाश को
जब होती
प्रसव-वेदना
लुढ़क कर
आ जाता है

ज़मीन पर
कुछ फूलों को
जन्म देता है
आकाश

हो जाता है
हल्का
कुछ समय
के लिए

आकाश तो आकाश होता है
पहुँच से बाहर
आकाश में फूलों का होना
नहीं रखता है
कोई मायने

ख़ुशबू बिखरने के लिए
चाहिए
मिट्टी-हवा-पानी
तब एक सोंधी गन्ध
अनुभव की जा सकती है
फूलों की

ग़रीब और पोस्टर

ख़ाली दीवार पर पोस्टर की तरह चिपके
अहा! मेरे दोस्त
तुम बहुत अच्छे लगते हो
मील के पत्थर पर आज का समय
कील ठोंकता अट्टहास करता है
फिर एक ईसा ने आज दम तोड़ा है
दूर कहीं एक तारा टूटा है
विद्युत से घर्षण फिर एक चिंगारी शोला बन
जाती है

जब भूख धरोहर में मिलती है
तो आश्चासन भी खाली नारों में ही मिलते हैं
और हर बार नारों में तुम
दीवार पर पोस्टर की तरह चिपका दिए जाते हो
अहा! मेरे दोस्त तुम बहुत अच्छे लगते हो!

सूखा समुद्र

सवाल ही नहीं उठता
कभी वहाँ
रहा होगा समुद्र
रहा होगा तो

हट गया होगा
उसके उठते
स्वार्थों को देखकर

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