‘बेख़ुद’ देहलवी की रचनाएँ

आप हैं बे-गुनाह क्या कहना

आप हैं बे-गुनाह क्या कहना
क्या सफ़ाई है वाह क्या कहना

उस से हाल-ए-तबाह क्या कहना
जो कहे सुन के वाह क्या कहना

हश्र में ये उन्हें नई सूझी
बन गए दाद-ख़्वाह क्या कहना

उज्र करना सितम के बाद तुम्हें
ख़ूब आता है वाह क्या कहना

तुम ने रोको निगाह को अपनी
हम करें ज़ब्त-ए-आह क्या कहना

तुझ से अच्छे कहाँ ज़माने में
वाह ऐ रश्‍क-ए-माह क्या कहना

ग़ैर पर लुत्फ़-ए-ख़ास का इज़्हार
मुझ से टेढ़ी निगाह क्या कहना

ग़ैर से मांग कर सबूत-ए-वफ़ा
बन गए ख़ुद गवाह क्या कहना

दिल भी लेकर नहीं यक़ीन-ए-वफ़ा
है अभी इश्तिबाह क्या कहना

बल्बे चितवन तेरी मआज़-अल्लाह
उफ़ रे टेढ़ी निगाह क्या कहना

उन गुनों पर नजात की उम्मीद
‘बे-ख़ुद’-ए-रू-सियाह क्या कहना

आशिक़ हैं मगर इश्‍क़ नुमायाँ नहीं रखते \

आशिक़ हैं मगर इश्‍क़ नुमायाँ नहीं रखते
हम दिल की तरह गिरेबाँ नहीं रखते

सर रखते हैं सर में नहीं सौदा-ए-मोहब्बत
दिल रखते हैं दिल में कोई अरमाँ नहीं रखते

नफ़रत है कुछ ऐसी उन्हें आशुफ़्ता-सरों से
अपनी भी वो ज़ुल्फों को परेशां नहीं रखते

रखने को तो रखते हैं ख़बर सारे जहाँ की
इक मेरे ही दिल की वो ख़बर हाँ नहीं रखते

घर कर गईं दिल में वो मोहब्बत की निगाहें
उन तीरों का जख़्मी हूँ जो पैकाँ नहीं रखते

दिल दे कोई तुम को तो किस उम्मीद पर अब दे
तुम दिल तो किसी का भी मेरी जाँ नहीं रखते

रहता है निगह-बान मेरा उन का तसव्वुर
वो मुझ को अकेला शब-ए-हिज्राँ नहीं रखते

दुश्‍मन तो बहुत हज़रत-ए-नासेह हैं हमारे
हाँ दोस्त कोई आप सा नादाँ नहीं रखते

दिल हो जो परेशान तो दम भर भी ने ठहरे
कुछ बाँध के तो गेसू-ए-पेचाँ नहीं रखते

गो और भी आशिक़ हैं ज़माने में बहुत से
‘बे-ख़ुद की तरह इश्‍क़ को पिन्हाँ नहीं रखते

आशिक़ समझ रहे हैं मुझे दिल लगी से आप

आशिक़ समझ रहे हैं मुझे दिल लगी से आप
वाक़िफ़ नहीं अभी मेरे दिल की लगी से आप

दिल भी कभी मिला के मिले हैं किसी से आप
मिलने को रोज़ मिलते हैं यूँ तो सभी से आप

सब को जवाब देगी नज़र हस्ब-ए-मुद्दआ
सुन लीजे सब की बात न कीजे किसी से आप

मरना मेरा इलाज तो बेशक है सोच लूँ
ये दोस्ती से कहते हैं या दुश्‍मनी से आप

होगा जुदा ये हाथ न गर्दन से वस्ल में
डरता हूँ उड़ न जाएँ कहीं नाज़ुकी से आप

ज़ाहिद खुदा गवाह है होते फ़लक पर आज
लेते खुदा का नाम अगर आशिकी से आप

अब घूरने से फ़ाएदा बज़्म-ए-रकीब में
दिल पर छुरी तो फेर चुके बे-रूखी से आप

दुश्‍मन का ज़िक्र क्या है जवाब उस का दीजिए
रस्ते में कल मिले थे किसी आदमी से आप

शोहरत है मुझ से हुस्न की इस का मुझे है रश्‍क
होते हैं मुस्तफ़ीज़ मेरी ज़िंदगी से आप

दिल तो नहीं किसी का तुझे तोड़ते हैं हम
पहले चमन में पूछ लें इतना कली से आप

मैं बेवफ़ा हूँ ग़ैर निहायत वफ़ा शेआर
मेरा सलाम लीजे मिलें अब उसी से आप

आधी तो इंतिज़ार ही में शब गुज़र गई
उस पर ये तुर्रा सो भी रहेंगे अभी से आप

बदला ये रूप आपने क्या बज़्म-ए-ग़ैर में
अब तक मेरी निगाह में हैं अजनबी से आप

पर्दे में दोस्ती के सितम किस कदर हुए
मैं क्या बताऊँ पूछिए ये अपने जी से आप

ऐ शैख़ आदमी के भी दर्जे हैं मुख़तलिफ़
इंसान है ज़रूर मगर वाजिबी से आप

मुझ से सलाह ली न इजाज़त तलब हुई
बे-वजह रूठ बैठे हैं अपनी ख़ुशी से आप

‘बेख़ुद’ यही तो उम्र है ऐश ओ नशात की
दिल में न अपने तौबा की ठानें अभी से आप

ऐसा बना दिया तुझे कुदरत ख़ुदा की है

ऐसा बना दिया तुझे कुदरत ख़ुदा की है
किस हुस्न का है हुस्न अदा किस अदा की है

चश्‍म-ए-सियाह-ए-यार से साज़िश हया की है
लैला के साथ में ये सहेली बला की है

तस्वीर क्यूँ दिखाएँ तुम्हें नाम क्यूँ बताएँ
लाए हैं हम कहीं से किसी बे-वफ़ा की है

अंदाज़ मुझ से और हैं दुश्‍मन से और ढंग
पहचान मुझ को अपनी पराई क़ज़ा की है

मग़रूर क्यूँ हैं आप जवानी पर इस क़दर
ये मेरे नाम की है ये मेरी दुआ की है

दुश्‍मन के घर से चल के दिखा दो जुदा जुदा
ये बाँकपन की चाल ये नाज़ ओ अदा की है

रह रह के ले रही है मेरे दिल में चुटकियाँ
फिसली हुई गिरह तेरे बंद-ए-क़बा की है

गर्दन मुड़ी निगाह लड़ी बात कुछ न की
शोख़ी तो ख़ैर आप की तम्कीं बला की है

होती है रोज़ बादा-कशों की दुआ कबूल
ए मुहतसिब ये शान-ए-करीमी ख़ुदा की है

जितने गिले थे उन के वो सब दिल से धुल गए
झेंपी हुई निगाह तलाफ़ी जफ़ा की है

छुपता है खून भी कहीं मुट्ठी तो खोलिए
रंगत यही हिना की यही बू हिना की है

कह दो कि बे-वजू न छूए उस को मोहतसिब
बोतल में बंद रूह किसी पारसा की है

मैं इम्तिहान दे के उन्हें क्यूँ न मर गया
अब ग़ैर से भी उन को तमन्ना वफ़ा की है

देखो तो जा के हज़रत-ए-बेख़ुद न हूँ कहीं
दावत शराब-ख़ाने में इक पारसा की है

बज़्म-ए-दुश्‍मन में बुलाते हो ये क्या करते हो

बज़्म-ए-दुश्‍मन में बुलाते हो ये क्या करते हो
और फिर आँख चुराते हो ये क्या करते हो

बाद मेरे कोई मुझ सा न मिलेगा तुम को
ख़ाक में किस को मिलाते हो ये क्या करते हो

हम तो देते नहीं कुछ ये भी ज़बरदस्ती है
छीन कर दिल लिए जाते हो ये क्या करते हो

कर चुके बस मुझे पामाल अदू के आगे
क्यूँ मेरी ख़ाक उड़ाते हो ये क्या करते हो

छींटे पानी के न दो नींद भरी आँखों पर
सोते फ़ितने को जगाते हो ये क्या करते हो

हो न जाए कहीं दामन का छुड़ाना मुश्‍किल
मुझ को दीवाना बनाते हो ये क्या करते हो

मुहतसिब एक बला-नोश है ऐ पीर-ए-मुगाँ
चाट पर किस को लगाते हो ये क्या करते हो

काम क्या दाग़-ए-सुवैदा का हमारे दिल पर
नक़्श-ए-उल्फ़त को मिटाते हो ये क्या करते हो

फिर उसी मुँह पे नज़ाकत का करोगे दावा
ग़ैर के नाज़ उठाते हो ये क्या करते हो

उस सितम-केश के चकमों में न आना ‘बे-ख़ुद’
हाल-ए-दिल किस को सुनाते हो ये क्या करते हो

बे-ताब रहें हिज्र में कुछ दिल तो नहीं हम

बे-ताब रहें हिज्र में कुछ दिल तो नहीं हम
तड़पें जो तुझे देख के बिस्मिल तो नहीं हम

हैं याद बहुत मक्र ओ फ़रेब ऐसे हमें भी
मुट्ठी में जो आ जाएँ तेरी दिल तो नहीं हम

अब आप कोई काम सिखा दीजिए हम को
मालूम हुआ इश्‍क़ के क़ाबिल तो नहीं हम

कहने को वफ़ा-दार तुम्हें लाख में कह दें
दिल से मगर इस बात के क़ाइल तो नहीं हम

क्यूँ ख़िज्र के पैरौं होतेरी राह-ए-तलब में
आवारा ओ गुम-कर्दा-ए-मंज़िल तो नहीं हम

कहते हैं तमन्ना-ए-शहादत को वो सुन कर
क्यूँ क़त्ल करें आप को क़ातिल तो नहीं हम

हैं दिल में अगर तालिब-ए-दीदार तुम्हें क्या
कुछ तुम से किसी बात के साइल तो नहीं हम

वो पूछते हैं मुझ से ये मज़मूँ तो नया है
तेरी ही तरह से कहीं बे-दिल तो नहीं हम

हम जाते हैं या हज़रत-ए-दिल आप सिधारें
जाएंगे अब उस बज़्म में शामिल तो नहीं हम

इन आँखों से हम ने भी तो देखा है ज़माना
हम से न कहो ग़ैर पे माइल तो नहीं हम

मरने के लिए वक़्त कोई ताक रहे हैं
इस काम को समझे अभी मुश्‍किल तो नहीं हम

कहते हैं तुझे देख के आता है हमें रश्‍क
बैठे हुए दुश्‍मन के मुक़ाबिल तो नहीं हम

हर साँस में रहता है तेरी याद का खटका
‘बे-ख़ुद’ हैं तो हों काम से ग़ाफिल तो नहीं हम

बे-वफ़ा कहने से क्या वो बे-वफ़ा हो जाएगा

बे-वफ़ा कहने से क्या वो बे-वफ़ा हो जाएगा
तेरे होते इस सिफ़त का दूसरा हो जाएगा

शर्त कर लो फिर मुझे बर्बाद होना भी क़ुबूल
ख़ाक में मिल कर तो हासिल मुद्दआ हो जाएगा

सर न होगा दोष पर तो क्या न होगी गुफ़्तुगू
हिचकियों से शुक्र क़ातिल का अदा हो जाएगा

सीना तोड़ा दिल में चुटकी ली जिगर ज़ख्मी किया
क्या ख़बर थी तीर भी तेरी अदा हो जाएगा

मेरे कहने में है दिल जब तक मेरे पहलू में है
आप ले लीजे इसे ये आप का हो जाएगा

साथ उन के जान भी अरमान भी जाएँगे आज
सुब्ह से पहले रवाना क़ाफिला हो जाएगा

मैं मलूँ तलवों से आँखें वो कहें समझूँगा मैं
याद रख फीका अगर रंग-ए-हिना हो जाएगा

फिर वही झगड़े का झगड़ा है अगर क़ुम कह दिया
तेग़ का मंसूख़ सारा फ़ैसला हो जाएगा

किस ख़ुशी में हाए कैसा रंज फैला क्या करूँ
क्या ख़बर थी हँसते हँसते वो ख़फा हो जाएगा

हश्र तक क्यूँ बात जाए क्यूँ पड़े गै़रों के मुँह
घर में समझौता हमारा आप का हो जाएगा

आँख से है वस्ल का इक़रार दिल दुगदा में है
तुम ज़बाँ से अपनी कह दोगे तो क्या हो जाएगा

ज़ुल्म से गर ज़ब्ह भी कर दो मुझे परवा नहीं
लुत़्फ़ से डरता हूँ ये मेरी कज़ा हो जाएगा

उसे न छेड़ा था मुझे तुम जान दोगे कब हमें
कह दिया मैं ने भी जब वादा वफ़ा हो जाएगा

यूँ सवाल-ए-वस्ल पर टाला किया बरसों कोई
सब्र कर मुज़्तर न हो तेरा कहा हो जाएगा

लाख दुनिया में हसीं हों लाख हूरें ख़ुल्द में
मुझ को जो तू है वो कोई दूसरा हो जाएगा

तौबा भी कर ली थी ये भी नश्‍शा की थी इक तरंग
आप समझे थे कि ‘बे-ख़ुद’ पारसा हो जाएगा

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर

दे मोहब्बत तो मोहब्बत में असर पैदा कर
जो इधर दिल में है या रब वो उधर पैदा कर

दूद-ए-दिल इश्‍क़ में इतना तो असर पैदा कर
सर कटे शमअ की मानिंद तो सर पैदा कर

फिर हमारा दिल-ए-गुम-गश्‍ता भी मिल जाएगा
पहले तू अपना दहन अपनी कमर पैदा कर

काम लेने हैं मोहब्बत में बहुत से या रब
और दिल दे हमें इक और जिगर पैदा कर

थम ज़रा ऐ अदम-आबाद के जाने वाले
रह के दुनिया में अभी ज़ाद-ए-सफ़र पैदा कर

झूठ जब बोलते हैं वो तो दुआ होती है
या इलाही मेरी बातों में असर पैदा कर

आईना देखना इस हुस्न पे आसान नहीं
पेश-तर आँख मेरी मेरी नज़र पैदा कर

सुब्ह-ए-फुर्क़त तो क़यामत की सहर है या रब
अपने बन्दों के लिए और सहर पैदा कर

मुझ को रोता हुआ देखें तो झुलस जाएँ रक़ीब
आग पानी में भी ऐ सोज़-ए-जिगर पैदा कर

मिट के भी दूरी-ए-गुलशन नहीं भाती या रब
अपनी क़ुदरत से मेरी ख़ाक में पर पैदा कर

शिकवा-ए-दर्द-ए-जुदाई पे वो फ़रमाते हैं
रंज सहने को हमारा सा जिगर पैदा कर

दिन निकलने को है राहत से गुज़र जाने दे
रूठ कर तो न क़यामत की सहर पैदा कर

हम ने देखा है कि मिल जाते हैं लड़ने वाले
सुल्ह की ख़ू भी तो ऐ बानी-शर पैदा कर

मुझ से घर आने के वादे पे बिगड़ कर बोले
कह दिया ग़ैर के दिल में अभी घर पैदा कर

मुझ से कहती है कड़क कर ये कमाँ क़ातिल की
तीर बन जाए निशाना वो जिगर पैदा कर

क्या क़यामत में भी पर्दा न उठेगा रूख से
अब तो मेरी शब-ए-यलदा की सहर पैदा कर

देखना खेल नहीं जलवा-ए-दीदार तेरा
पहले मूसा सा कोई अहल-ए-नज़र पैदा कर

दिल में भी मिलता है वो काबा भी उस का हैं मक़ाम
राह नज़दीक की ऐ अज़्म-ए-सफर पैदा कर

ज़ोफ़ का हुक्म ये है कि होंट न हिलने पाएँ
दिल ये कहता है कि नाले में असर पैदा कर

नाले ‘बेख़ुद’ के क़यामत हैं तुझे याद रहे
ज़ुल्म करना है तो पत्थर का जिगर पैदा कर

दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो

दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो
चाहत का मज़ा जब है कि तुम भी मुझे चाहो

ये हम नहीं कहते हैं कि दुश्‍मन को न चाहो
इस चाह का अंजाम मगर देखिए क्या हो

शमशीर से बढ़ कर हैं हसीनों की अदाएँ
बे-मौत किया क़त्ल उन अच्छों का बुरा हो

माशूक़ तरह-दार हो अंदाज़ हो अच्छा
दिल आए न ऐसे पे तो फिर दिल का बुरा हो

पूरा कोई होता नज़र आता नहीं अरमाँ
उन को तो ये ज़िद है कि हमारा ही कहा हो

तुम मुझ को पिलाते तो हो मय सीना पे चढ़ कर
उस वक़्त अगर कोई चला आए तो क्या हो

वादा वो तुम्हारा है कि लब तक नहीं आता
मतलब ये हमारा है कि बातों में अदा हो

ख़ंजर की ज़रूरत है न शमशीर की हाजत
तिरछी सी नज़र हो कोई बाँकी सी अदा हो

ख़ाली तो न जाएँ दम-ए-रूख़्सत मेरे नाले
फ़ितना कोई उट्ठे तो क़यामत न बपा हो

चोरी की तो कुछ बात नहीं मुझ को बता दो
मेरा दिल-ए-बेताब अगर तुम ने लिया हो

उन से दम-ए-रफ़्तार ये कहती है क़यामत
फ़ित्ने से न ख़ाली कोई नक़्श-ए-कफ़-ए-पा हो

बद-ज़न हैं वो इस तरह के सुर्मा उसे समझें
बीमार की आँखों में अगर नील ढला हो

ख़त खोल के पढ़ते हुए डरता हूँ किसी का
लिपटी हुई ख़त में न कहीं मेरी क़ज़ा हो

मरना है उसी का जो तुझे देख के मर जाए
जीना है उसी का जो मोहब्बत में जिया हो

है दिल की जगह सीने में काविश अभी बाक़ी
पैकाँ कोई पहलू में मरे रह न गया हो

मुझ को भी कहीं और से आया है बुलावा
अच्छा है चलो आज भी वादा न वफ़ा हो

‘बेख़ुद’ का फ़साना तो है मशहूर-ए-ज़माना
ये ज़िक्र तो शायद कभी तुम ने भी सुना हो

हर एक बात तेरी बे-सबात कितनी है

हर एक बात तेरी बे-सबात कितनी है
पलटना बात को दम भर में बात कितनी है

अभी तो शाम हुइ है अभी तो आए हो
अभी से पूछ रहे हो के रात कितनी है

वो सुनते सुनते जो घबराए हाल-ए-दिल बोले
बयान कितनी हुई वारदात कितनी है

तेरे शहीद को दूल्हा बना हुआ देखा
रवाँ जनाज़े के पीछे बरात कितनी है

किसी तरह नहीं कटती नहीं गुज़र चुकती
इलाही सख़्त ये क़ैद-ए-हयात कितनी है

हमारी जान है क़ीमत तो दिल है बैआना
गिराँ-बहा लब-ए-नाज़ुक की बात कितनी है

जो शब को खिलते हैं ग़ुंचे वो दिन को झड़ते हैं
बहार-ए-बाग़-ए-जहाँ बे-सबात कितनी है

महीनों हो गए देखी नहीं है सुब्ह-ए-उम्मीद
किस ख़बर ये मुसीबत की रात कितनी है

अदू के सामने ये देखना है हम को भी
किधर कोहै निगह-ए-इल्तिफ़ात कितनी है

ग़ज़ल लिखें भी तो क्या ख़ाक हम लिखें ‘बे-ख़ुद’
ज़मीन देखिए ये वाहियात कितनी है

Share