बेगम रज़िया हलीम जंग की रचनाएँ

आरजूएँ जाग उठीं बे-ताब है बज़्म-ए-ख़याल

आरजूएँ जाग उठीं बे-ताब है बज़्म-ए-ख़याल
क्या कहूँ मैं क्या दिगर-गूँ हो गया है दिल का हाल

ऐ सनम मेरे सनम मेरे सनम तेरे बग़ैर
शौक़-ए-हस्ती है बुझा सा ख़्वाहिशें हैं पाएमाल

कब तलक बहलाऊँगी दिल को ख़यालों से तेरे
कब करेगा हाल पर मेरे करम तू ज़ुल-जलाल

क्या ख़ता मुझ से हुई मुझ को बुलाता क्यूँ नहीं
हो गया है अब तो तेरे हिज्र में जीना मुहाल

जान लेना है तो ले लेकिन बुला कर अपने घर
आम लोगों से जुदा हो मेरा तर्ज़-ए-इंतिक़ाल

अर्ज़ किया है मेरी तुम सुनो बोल दूँ

अर्ज़ किया है मेरी तुम सुनो बोल दूँ
तुम बुला लेना मुझ को मैं जब भी कहूँ

भेजते हो ख़ुशी से मुझे किस लिए
क्या नहीं देखते मेरा हाल-ए-ज़बूँ

क्यूँ सुलूक आप का ये बदलता नहीं
जो है औरों से वैसा ही मुझ से है क्यूँ

घर तुम्हारा बसाऊँ हमेशा को मैं
मैं तो ये चाहती हूँ तुम्हारी रहूँ

बयाबाँ हो के सहरा हो मुझे तेरा सहारा हो

बयाबाँ हो के सहरा हो मुझे तेरा सहारा हो
तूई ख़ुर्शीद हो मेरा तूई मेरा सितारा हो

बुलंदी हो के पस्ती हो कहीं बैठूँ कहीं जाऊँ
वहीं पर मेरा काबा हो वहीं तेरा नज़ारा हो

न ये दुनिया न वो उक़बा मेरी तो इक तमन्ना है
रहूँ क़दमों तले तेरे तूई मेरा किनारा हो

रहो पर्दों में तुम मख़्फ़ी मगर जब दिल में झाँकूँ मैं
तुम्हारा ही नज़ारा हो तुम्हारा ही नज़ारा हो

मेरी आँखों में बस जाओ ज़रा तुझ पर तरस खाओ
ज़मीनों आसमानों में तुम्हीं इक माह-पारा हो

बैचेन कर रहा है हर लम्हा क़ल्ब-ए-मुज़्तर

बैचेन कर रहा है हर लम्हा क़ल्ब-ए-मुज़्तर
रातें गुज़र रहीं हैं करवट बदल बदल कर

होता है शोर जैसा कुछ दिल की धड़कनों में
रूकती है साँस मेरी आहट तेरी समझ कर

मुमकिन नहीं अगर-चे फिर भी ये आरज़ू है
महबूब मुझ को कर ने मैं ख़ाक का हूँ पैकर

ज़र से है जिस को निस्बत मैं वो नहीं हूँ मौला
अपनी नवाज़िशों से झोली फ़क़ीर की भर

दामन भी चाक और गिरेबाँ भी तार तार

दामन भी चाक और गिरेबाँ भी तार तार
दिल टुकड़े हो के देखिये रोता है ज़ार ज़ार

काँधे भी झुक गए हैं गुनाहों के बोझ से
लरज़ाँ हूँ हर कदम पे मैं गिरती हूँ बार-बरा

ईमाँ को कर क़वी मेरे क़ुर्बत भी अपनी दे
मुझ को पनाह दे तेरी रहमत के मैं निसार

अल्लाह तुझ को तोला ओ रत्ती की है ख़बर
बच्चों को दे अमाँ मेरे वो भी हैं होनहार

दिल की हालत बिगड़ रही है क्यूँ

दिल की हालत बिगड़ रही है क्यूँ
हर नफ़स मुझ को बे-कली है क्यूँ

दिल लगाता है बस सदा तेरी
बे-क़रारी ये बढ़ रही है क्यूँ

उस के कूचे में उम्र गुज़री फिर
कूचा-ए-यार अजनबी है क्यूँ

जिस्म जंजीर हो भी सकता है
रूह आज़ाद है रूकेगी क्यूँ

अब ये समझी हूँ जब बनी जाँ पर
मरकज़-ए-जाँ तेरी गली है क्यूँ

दुनिया मिली तो क्या है ये मेरी नहीं थी चाह

दुनिया मिली तो क्या है ये मेरी नहीं थी चाह
सब कुछ मुझे मिलेगा जो होगी तेरी निगाह

तेरी निगाह-ए-नाज़ से मसहूर काएनात
तेरी निगाह-ए-नाज़ का जादू है बे-पनाह

तेरी तो काएनात है मैं भी उसी में हूँ
कम-तर मैं एक ज़र्रे से और तू है बादशाह

अपना ले मुझ को और ज़रा क़ुर्ब बख़्श दे
कब से भटक रही हूँ चला मुझ को अपनी राह

फ़ुर्सत की बात मुझ से न कोई जिया करे

फ़ुर्सत की बात मुझ से न कोई जिया करे
छोड़ा कहाँ है इस ग़म-ए-जानाँ ने अब मुझे

जब वक़्त था तो जिन से था मिलना नहीं मिले
अब वक़्त ही नहीं तो मोहब्बत है किस लिए

तन्हाइयों की हम को तो आदत सी हो गई
तुम आए दो घड़ी के लिए और चले गए

हमेशा माँगते रहना मेरी आदत पुरानी है

हमेशा माँगते रहना मेरी आदत पुरानी है
हमेशा ही अता करना ये तेरी मेहर-बानी है

मुकम्मल है तेरी यकताई इस में शक नहीं कोई
न कोई तेरे जैसा है न कोई तेरा सानी है

ये नज़्म-ए-काएनात एहसास ये हम को कराता है
यहाँ हर इक नज़ारा तेरे होने की निशानी है

गुनाहों पर मेरे ये तेरी रहमत का करिश्मा है
ज़मीं पर सब्ज़ हैं जंगल न दरया है न पानी है

मेरे आमाल तो ऐसे नहीं है ऐ मेरे मौला
बना दे तू मुझे मोमिन तो तेरी मेहर-बानी है

गुनाहों पर गुनह करती है लेकिन बख़्श दे इस को
ख़ुदाया उम्मत-ए-महबूब की ये इक दिवानी है

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