बेनी की रचनाएँ

हाव भाव विविध दिखावै भली भाँतिन सों

हाव भाव विविध दिखावै भली भाँतिन सों,
मिलत न रतिदान जोग सँग जामिनी।
सुबरन भूषन सँवारे ते विफल होत,
जाहिर किये ते हँसैं नर गजगामिनी।
रहै मन मारे लाज लागत उघारे बात,
मन पछितात न कहत कहूँ भामिनी।
बेनी कवि कहैं बड़े पापन तें होत दोऊ,
सूम को सुकवि औ नपुँसक को कामिनी।

करि की चुराई चाल, सिंह को चुरायो कटि

करि की चुराई चाल सिंह को चुरायो लंक
दूध को चुरायो रंग, नासा चोरी कीर की
पिक को चुरायो बैन, मृग को चुरायो नैन
दसन अनार, हाँसी बीजुरी गँभीर की
कहे कवे ‘बेनी’ बेनी व्याल की चुराय लीनी
रति रति सोभा सब रति के सरीर की
अब तो कन्हैया जी को चित हू चुराय लीनो
चोरटी है गोरटी या छोरटी अहीर की

धूधर सी वन, धूमसी धामन

धूधर सी वन, धूमसी धामन, गावन तान लगै नर बोरी।
बौरी लता, बनिता भई बौरी, सु औधि अध्याय रही अब थोरी॥

‘बेनी बसंत के आवत ही बिन कंत अनंत सहै दुख कोरी।
ओरी! घरै हरि आए न जो, पहिले हौं जरौं, जरिहै फिर होरी॥

राधा औ माधो खदोउ भीजत, बा झरि में झपकै बन मांहीं।
‘बेनी गए जुरि बातन में, सिर पातन के छतना गल बांहीं॥

पामरी प्यारी उत प्यारे को, प्यारौ पितंबर की करै छांहीं।
आपस में लहालेह में, छोह में, का को भीजिबे की सुधि नांहीं॥

भोर ही न्योति गई ती

भोर ही नयोति गई ती तुम्हें वह गोकुल गाँव की ग्वालिनी गोरी.
आधिक राति लौं बेनी प्रवीन कहा ढिग राखी करी बरजोरी.
आवै हँसी मोहिं देखत लालन,भाल में दीन्ही महावर घोरी.
एते बड़े ब्रजमंडल में न मिली कहूँ माँगेन्हु रंचक रोरी.

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