ब्रह्मदेव शर्मा

ब्रह्मदेव शर्मा की रचनाएँ

खुली या बंद हों आँखें दिखाई देता है

खुली या बंद हों आँखें दिखाई देता है।
उसी का नाद है वह ही सुनाई देता है॥

समा चुका है हमारी हरेक सांसों में,
वही तो धड़कनों में भी सुझाई देता है।

गिरा सको तो गिरा दो दिवार नफरत की,
बुरा हो सोच तो केवल बुराई देता है।

उगा सको तो उगालो यहाँ मुहब्बत को,
भला-सा शख़्स ही सबको भलाई देता है।

तमस की सोच का कुछ भी बुरा नहीं लगता,
कि साया साये में सिमटा दिखाई देता है।

मचल रही है कहीं अमावस, भटक रहा है कहीं उजाला

मचल रही है कहीं अमावस, भटक रहा है कहीं उजाला।
सिखा न पाई सुबह सलीके कि शाम आई पहन दुशाला।

कि छूट जाती हैं हाथ आयी तमाम मंजिल हवा सरीखी,
यही बताता रहा है सबसे हमारे पग का हर एक छाला।

दिये बमुश्किल किये हैं रोशन बड़ी खतरनाक आँधियाँ हैं,
सुनामियाँ दे रही हैं दस्तक उगल रहा है पयोधि ज्वाला।

अलग समय की अलग कहानी, छले गये हैं कदम-कदम पर,
ठगें स्वयं को स्वयं के साये समय नहीं है भरोसे वाला।

दिखीं नहीं हैं कहीं पर रौनक फिसल रही है चमक खुशी की,
सुनाई देती गमों की सरगम गमों का है आज बोलबाला।

खड़ा हुआ है बज़ार में वह हुनर की बोली लगा रहा है,
क्षुधा मिटेगी कहाँ से उसकी मिला नहीं जब उसे निवाला।

न मंदिरों की न मस्जिदों की कभी ज़रूरत अगर हैं इंसां,
धरम हमारा सिखा रहा है तमाम जग में हमी हैं आला।

जिकर उसका न कर फ़साने में

जिकर उसका न कर फ़साने में।
पता जिसका नहीं जमाने में॥

दिलों में दूरियाँ बहुत-सी हैं।
समय लगता है पास आने में॥

किसी का घर दखल किसी का है।
बहुत मुश्किल यहाँ निभाने में॥

फरक ज़्यादा नहीं दिखा हमको।
नये इस दौर में पुराने में॥

पता है पाप पुण्य का लेकिन।
लगे हैं पाप ही सजाने में॥

जवानी जोश में गुजरती है।
बुढ़ापा दर्द के तराने में॥

सागर, नदी तुम्हारी, पर्वत गगन तुम्हारा

सागर, नदी तुम्हारी, पर्वत गगन तुम्हारा।
इक हम नहीं तुम्हारे सारा वतन तुम्हारा॥

जो पास है हाँ उसपे नीयत बुरी तुम्हारी।
पर एक बात सुन लो जीवन रहन तुम्हारा॥

हर बात में तुम्हारी स्वारथ झलक रहा है।
काँटों के वास्ते ही खिलता चमन तुम्हारा॥

चहरे पर गंदगी है कुछ धूल जिस्म पर भी।
जलता हुआ अँगारा ज़ालिम बदन तुम्हारा॥

बेनूर हो गयीं हैं सारी ज़फाएँ तेरी।
कालिख पुता हुआ है सारा ज़हन तुम्हारा॥

बोझा बने हुए हैं सोचों के कारवां भी।
साँसें बताओ कब तक ढोएँ वज़न तुम्हारा॥

सच अगर सच न कह पाएँगे एक दिन

सच अगर सच न कह पाएँगे एक दिन।
हाशियों पर चले जाएँगे एक दिन॥

जिन विषय सूचियाँ पर असहमत अभी।
वे कथानक तुम्हें भाएँगे एक दिन॥

तुम पुकारो हमें नाम लेकर कभी।
पाँव नंगे चले आएँगे एक दिन॥

ख्वाब इससे हसीं और क्या देखते?
पेट भर रोटियाँ खाएँगे एक दिन॥

उन हिजाबों का क्या फायदा है बता?
यदि हटे तो जुरम ढाएँगे एक दिन॥

सूरज जैसा तेज जमीं पर बरसाने की कोशिश में

सूरज जैसा तेज जमीं पर बरसाने की कोशिश में।
झुलस गया खुद चाँद जमीं को झुलसाने की कोशिश में॥

हँसी रात के मुख से गायब दुखी हुए झिलमिल तारे।
मुँह टेढ़ा कर बैठा चंदा मुस्काने की कोशिश में॥

छत पर बैठी रही चाँदनी आँगन से रूठी रूठी।
दालानों ने किया रतजगा बहलाने की कोशिश में॥

कढ़े साँतिये उसने छूकर ओढ़ा वंदनवारों को।
कलियों को फिर चूमा उसने महकाने की कोशिश में॥

धूप जली बैठी है मेरे साये की कुछ गर्मी से।
धुँआ धुँआ पानी-पानी हिम दहकाने की कोशिश में।

जाने क्या-क्या उल्टी सीधी हरकत बादल कर बैठा।
श्यामल घटा झमाझम नाची शरमाने की कोशिश में॥

मंजिल तक ले जाने वाली पगडंडी पर पैर रखे।
चौराहे फिर शुरू हो गये बहकाने की कोशिश में॥

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