भारती पंडित की रचनाएँ

माँ

तुम जो चल पडी अनंत यात्रा के पथ पर
सुगंध विहीन हो गए गुलाब सारे
विलीन हो गई पाजेब की झनकार
और मूक हो गए सरगम के सातों स्वर
अब भी जब यादों के पंछी फड़फड़ाते हैं अपने पंख
खोलकर झरोखे स्मृति के
तो लगता है तुम यही हो
मेरे नजदीक , बिलकुल समीप
बिंदिया सजाती , चूड़ी खनकाती
तुलसी के पौधे पर जल चढ़ाती
सांध्य दीप जलाती
मेरी पसंद का भोजन बनाती
लाड-मनुहार से मुझे खिलाती
हां यहीं तो थी तुम
गीता ज्ञान मुझे बताती
संस्कारों का पाठ पढ़ाती
मेरी नासमझी को अपनी
समझा से संवारती
मेरी विदाई पर आंसू बहाती
मेरे बिखेरे चावल अपने
आंचल में संजोती
हां यही तो थी तुम
और शायद आज भी यहीं हो
मेरी स्मृति में , संस्कारों में
मेरी उपलब्धियों में, मेरे विचारों में
मेरी हंसी में , मेरे गम में
मेरे अस्तित्व के हर रोम में
रची बसी बस तुम ही हो
हाँ माँ ,
तुम न होकर भी यहीं हो
क्योंकि अपने रूप में रचा है
तुमने मुझे
अपनी परछाई, अपनी पहचान बनाकर

इस बार होली पर

रंगों से दिल सजा लूं इस बार होली पर
रूठों को अब मना लूं इस बार होली पर |

इक स्नेह रंग घोलूँ आंसू की धार में
पानी ज़रा बचा लूं इस बार होली पर |

अपनों की बेवफाई से मन है हुआ उदास
इक मस्त फाग गा लूं इस बार होली पर |

रिश्तों में आजकल तो है आ गई खटास
मीठा तो कुछ बना लूं इस बार होली पर |

उम्मीद की कमी से फीकी हुई जो आँखें
उनमें उजास ला दूं इस बार होली पर |

सपने

उस दिन जब मैं पहली बार गया पाठशाला
और उस दिन जब मैंने सीखा ककहरा
ढेरों अधूरे सपने
धम से आ गिरे थे मेरी झोली में ..
दादा के सपने, दादी के सपने
माँ के सपने , पिताजी के सपने
वे सब मानो जोह रहे थे
मेरे बड़े होने की बाट,
कि उनके भी सपनों को
मिल जाये मंजिल…
आज उनके सपनों को जीता मैं
सोचता हूँ कि देख लूं
अपने भी कुछ सपने ,
और उन्हें पूरा भी
मैं ही कर डालूँ ..
डरता हूँ कि मेरे सपने कहीं
मेरे नन्हें की आँखों में घर न बना ले …

औरत हूँ मैं

अल-सुबह जब सूरज खोलता भी नहीं है
झरोखे आसमान के
चिडिया करवटें बदलती हैं
अपने घरोंदों में
उसके पहले उठ जाती हूँ मैं
घर को सजाती संवारती
सुबह के काम समेटती
चाय के कप हाथ में लिए
सबको जगाती हूँ मैं
जानती हूँ, औरत हूँ मैं ……..

बच्चों की तैयारी,
पतिदेव की फरमाइशें
रसोई की आपा धापी
सासू माँ की हिदायतें
इन सब के बीच खुद को
समेटती सहेजती हूँ मैं.
कोशिश करती हूँ कि माथे पर
कोई शिकन न आने पाए
जानती हूँ औरत हूँ मैं…..

घर, दफ्तर,, मायका ससुराल
गली, कूचा ,मोहल्ला पड़ोस
सबके बीच संतुलन बनाती मैं
चोटों को दुलार, बड़ों को सम्मान
अपनापन सभी में बाँटती मैं
चाहे प्यार के चंद मीठे बोल
न आ पाए मेरी झोली में
जानती हूँ औरत हूँ मैं …….

कोई ज़ुबां से कहे न कहे
मेरी तारीफ़ के दो शब्द
भले ही ना करे कोई
मेरे परिश्रम की कद्र
अपने घर में अपनी अहमियत
जानती हूँ ,पहचानती हूँ मैं
घर जहां बस मैं हूँ
हर तस्वीर में दीवारों में
बच्चो की संस्कृति संस्कारों में
रसोई में, पूजाघर में
घर की समृद्धी, सौंदर्य में
पति के ह्रदय की गहराई में
खुशियों की मंद पुरवाई में
जानती हूँ बस मैं ही मैं हूँ
इसीलिए खुश होती हूँ
कि मैं एक औरत हूँ..

बिटिया की विदाई पर पिता का पत्र

मेरी नन्ही कली
अभी कल ही की तो बात है
परी सी आई थी आँगन में मेरे
जीवन को नंदनवन बनाने ,
तुतलाते शब्दों से कानों को
अमृतपान कराने ,
अभी कल ही की तो बात है.

तेरी खिलखिलाहटे जो जगाती थी घर को,
तेरी अठखेलियाँ जो मोहती थी मन को ,
तेरा रोना- हंसना रूठना -मनाना ,
मनोजीवित हो जाता था घर ,
अभी कल ही की तो बात थी .

बढ़ाने लगी तू पुष्पलता सी ,
रिश्तों के नए रंग सुवासित करती ,
कभी दोस्तों सा अधिकार जताती ,
कभी माँ सी डांट लगाती ,
कभी बची सी मचल भी जाती ,
अभी कल ही की तो बात है .

आज विदाई की इस बेला में ,
तेरा पिता निस्तब्ध अकेला है ,
ओंठों पर है आशीषों की झड़ी,
आँखों में स्मृतियों का मेला है ,
आज जो हुई पराई ,रौनक थी मेरे घर की ,
हाँ अभी कल ही की तो बात है ..

इस बार दिवाली पर

इस बार दिवाली पर
घर को खूब सजाना,
झिलमिल दीपों से दमकाना ,
बस एक दीप सहेज लेना
उस अंधेरी दहलीज़ के लिए
जिसका मासूम चिराग
हाल ही में बुझ गया है .

इस बार दिवाली पर
खूब खुशियां मनाना ,
मिलना और मिलाना ,
बस कुछ पकवान सहेज लेना
उस घर के बच्चों के लिए
जिनका त्योहार भी जूठन पर मनता है.

इस बार दिवाली पर
अपने घर की पूजा के साथ
माँ लक्ष्मी का आह्वान करना ,
हे माँ इस दिवाली पर
उस मजदूर बस्ती में भी जाना ,
जहां गरीबी करती है तांडव ,
चरित्र -संस्कार चढ़ते हैं भेंट भूख की ,
आशा की उजास वहां भी फैलाना ,
माँ , उस बस्ती में भी जाना .

आओ ज्योत जलाएं

आओ हर दहलीज़ पर
जगमग ज्योत जलाएं .
गहन निराशा के तम में
एक आस किरण दमकाएं .
अज्ञान-अशिक्षा के तम को
शिक्षा की लौ से दूर भगाएं .
हिंसा में तपते जीवन को
शान्ति वृक्ष की छांव दिखाएं .
दुःख से बंजर बनते घर को
नंदन वन सा महकाएं ,
आओ ज्योत जलाएं.

माँ तो बस माँ ही होती है

बच्चो को भरपेट खिलाती खुद भूखी ही सोती है
माँ तो बस माँ ही होती है .

बच्चों की चंचल अठखेली देख देख खुश होती है
बचपन के हर सुन्दर पल को बना याद संजोती है
माँ तो बस माँ ही होती है .

देख तरक्की बच्चों की वो आस के मोती पोती है
बच्चों की खुशहाली में वो अपना जीवन खोती है
माँ तो बस माँ ही होती है .

बच्चों की बदली नज़रों से नहीं शिकायत होती है
जब-जब झुकता सर होठों पर कोई दुआ ही होती है
माँ तो बस माँ ही होती है .

गरीब की लडकी

नहीं सोती है पूरी नींद
करती माँ की हिदायत का पालन
कि नींद में न आ जाये कोई सपना सलोना
जिसे पाने को मचल पड़े मन की नदी
अपने प्रवाह को अनियंत्रित करके ..

गरीब की लड़की
जानती है सीमाएं अपनी कि
अव्वल तो कोख में ही मार दी जाएगी ,
जी गयी तो अनचाही सी दुलार दी जाएगी ,
पढ़ना चाहेगी तो ब्याह दी जायेगी,
बोझ सी दूजे आँगन उतार दी जाएगी ….

गरीब की लड़की
फिर भी झपका ही लेती है उनींदी पलकें ,
देखने को सुनहले जीवन का सुकुमार सपना ,
क्योंकि बचपन में दादी की कहानी में सुना था कि
सपने भी कभी- कभी
सच हो जाया करते हैं….

चाह एक शिक्षक की

जानती हूँ मैं कि दहलीज पर खड़ी हो तुम,
दस्तक देने को तैयार शायद करती हो इंतज़ार
कि द्वार खुलेगा और थाम लोगी हाथ मेरा
और ले जाओगी महाप्रयाण के उस अनंत पथ पर
जहां से वापसी संभव नहीं,आसान नहीं
पर हे मृत्यु की देवी, तुम्हीं से मांगती हूँ
जीवन के कुछ क्षणों का अमूल्य वरदान
यद्यपि नहीं है अधूरा कोई सपना
नहीं है अधूरी कोई भी चाह
ना ही है आस बिटिया के विवाह की ,
ना ही दिखाना है बेटे को सुनहली राह
बस इतना ही है काम बाकी कि
ज्ञान के जो अनमोल मोती सहेजे है
इस जीवन प्रवास में
डालती जाऊं किसी सुपात्र की झोली में
जो उन मोतियों को पल्लवित करें
बीजों की तरह और
लहलहा दे उन्हें उस वृक्ष की तरह
शिक्षा, सभ्यता और अनुशासन हो जिसके फल
संस्कार, देशप्रेम और जीवन मूल्यों से
जो हो सुगठित,सबल
बस इतना सी है स्वार्थ मेरा
क्योंकि फल खाने वालों के संतोष में
होगा एक हिस्सा मेरा भी
गुमनाम ही सही, कहीं तो स्मृति होगी मेरी
नींव सी ही सही , हस्ती तो होगी मेरी.

हौसला उम्मीदों का

दिखता न हो जब किनारा कोई,
मिलता न हो जब सहारा कोई
जला ले दीया खुद ही की रोशनी का,
कोई तुझसे बढ़कर सितारा नहीं

तूफां तो आए है आते रहेंगे,
ग़मों के अँधेरे भी छाते रहेंगे,
आगाज़ कर रोशनी का कि तुझको,
अंधेरों की महफ़िल गंवारा नहीं.

माना कि ये इतना आसां नहीं है,
मगर सम्हले गिर के जो इन्सां वहीं है,
तारीके शब में उम्मीदों का परचम ,
कहीं इससे बेहतर नज़ारा नहीं .

बिटिया हमारी

यूं मजबूरियों का बने ना तमाशा,
दो सिक्कों की खातिर कोई घर न तोड़ो
न तुम जान से खेलो,
ये रिश्तें न छीनो
ये कहता है इंसानियत का तकाजा,
किसी जिन्दगी का उजाला न छीनों

जो जन्मे हैं बेटा तो गूंजे है सरगम
वही घर में बिटिया के आने पे मातम
क्यों माता ही हाथों में धरती है खंजर
ये बिटिया ही तो घर को घर है बनाती
उसी से सुखों का निवाला न छीनों (१)

सुबह तो हुई पर ये कैसा नजारा
कहीं रोती बहुएँ, कहीं मरती बाला
क्यूं बनती हैं नारी सितम का निवाला
है जीने का हक़ तो उन्हें भी है आखिर
किसी से किसी का सहारा ना छीनों (२)

इमारते

 कल तक जहां दिखाते थे हरे लहलहाते खेत
अब नजर आने लगे हैं मशीनी दानव वहां
धरती के सीने पर चलेंगे पहेये बुलडोजर के
एक ही दिन में धरती बंजर वीरान हो जाएगी .
फिर शुरू होगा खेल खरीदो-फरोख्त का
और माँ सी उपजाऊ धरती बोली की भेंट चढ़ जाएगी ,
धन्ना सेठ ले आएगा आदमियों की फौज भारी
उपजाऊ खेतों को मिटा लम्बी इमारतें तानी जाएँगी .
घर -बाज़ार-स्कूल अस्पताल, लोगों की हलचल होगी
मगर इन सब में गुम हो जाएगी कराह धरती की.
क्या फिर पके दानों की महक हवा को महका पाएगी?
क्या फिर बैलों की घंटियाँ कानों में गूँज पाएंगी ?
शोरगुल में डूबे मन में क्या कभी ये सोच आएगी?
शाश्वत प्रकृति को तो नष्ट किया हमने ,अब
ये नश्वर इमारतें कितना साथ निभाएंगी?

याद आती है पिताजी की सूनी आँखें

आजकल अक्सर याद आती है
पिताजी की सूनी आँखें
जो लगी रहती थी देहरी पर
मेरे लौटने की राह में।

आजकल अक्सर याद आता है,
पिताजी का तमतमाया चेहरा,
जो बिफर-बिफर पड़ता था,
मेरे देर से घर लौटने पर।

अब भली लगती हैं,
पिताजी की सारी नसीहतें
जिन्हें सुन-सुन कभी,
उबल-उबल जाता था मैं।

आजकल सहेजने को जी करता है
चश्मा, छड़ी, धोती उनकी,
जो कभी हुआ करती थी,
उलझन का सामान मेरी।

अक्सर हैरान होता हूँ इस बदलाव पर
जब उनके रूप में खुद को पाता हूँ।
क्योंकि अब मेरा अपना बेटा
पूरे अट्ठारह का हो गया है।

 

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