मनमोहन की रचनाएँ

शर्मनाक समय

कैसा शर्मनाक समय है
जीवित मित्र मिलता है
तो उससे ज़्यादा उसकी स्मृति
उपस्थित रहती है

और उस स्मृति के प्रति
बची खुची कृतज्ञता

या कभी कोई मिलता है
अपने साथ ख़ुद से लम्बी
अपनी आगामी छाया लिए

लीजिए, अब पढ़िए इस कविता के चार विभिन्न अँग्रेज़ी अनुवाद
Man Mohan
AN AWFUL TIME

What awful times these are
One meets an old friend
And what marks the occasion is
His old self

And gratitude
For the remnants of memory

And sometimes there is the one
Carrying the burden of shadows
Still in the future

(Translated from Hindi by Nalini Taneja)

  • * *

Man Mohan
DISGARECEFUL TIMES

Disgraceful times—
you meet a friend, he’s
alive.
Yet more than him there is
his remembrance.

And whatsoever remains
of gratitude
for the remembrance.

Or sometimes
someone meets you,
lugging with him
his coming shadow,
taller than him.

(Translated by Rajesh Sharma )

  • * *

Manmohan
A SHAMEFUL TIME

What a shameful time
One meets a living friend
More than him, his memory
Presents itself

And towards such memory
Is one’s leftover gratitude

Or does someone meet
With his future shadow
Taller than him?

(Translated by Pallavi Prasad)

  • * *

Man Mohan
TIME OF SHAME

in these shameful times
Meeting a friend who still lives
Is finding memories of him mean much more
Than his present self

And that feeling of gratefulness
Towards whatever is left of that memory

Or else one meets someone
Dragging with him
The tall shadows of his future

(Translated by Asad Zaidi)

नया रिपब्लिक

वे कहते हैं
हत्यारा है तो क्या हुआ
हमारा है

जादू जानता है
बिना आवाज़
सर को धड़ से जुदा कर देता है
बच्चे को तलवार की नोंक पर उठा लेता है
खेल-खेल में
जेब से पैसे
थाली से रोटी
हाथ से लुकमा
ग़ायब कर देता है

कितना साफ़ कितना सफ़ेद झूठ बोलता है
कौन कह सकता है कि
झूठ बोलता है
जो कुछ बोलता है
बिन्दास बोलता है
डँके की चोट पर बोलता है

बकते रहो, देशद्रोहियो !
कि घटिया है
कि बेहया है
वो क्या किसी की परवाह करता है
वो क्या किसी से डरता है
जो कुछ चाहता है
कर गुज़रता है

हर बार
जब शिकार से वापस लौटता है
बन्दूक लिए
कन्धे पर किसी लाश को डाले
या किसी बस्ती को उजाड़ कर
या कुछ रौन्द कर, कुचल कर
गिरा कर या मिटा कर

तो मँच पर आता है
पसीना पोंछता है
हाथ-मुँह धोता है
गान्धी की तस्वीर पर
फूल चढ़ा कर दिखाता है
दर्प से मुस्कराता है
हाथ हिलाता है
और भीड़ से कहता है — ज़रा, ज़ोर से बोलो
भारत माता की जय !

वे चीख़ते हैं
तालियाँ बजाते हैं
कहते हैं — मस्त !
कहते हैं — वाओ !
वाओ जानेमन !!
हाउ मैनली ! हाउ कूल !!
जुग जुग जियो हमारे शेर !!

वे कहते हैं —
वाओ ! भारत माता के सपूत !
एक बार फिर से हमारे लिए आओ
एक बार फिर से अपना ज़ल्वा दिखाओ
एक बार फिर से हाँका लगाओ ।

याद नहीं

स्मृति में रहना
नींद में रहना हुआ
जैसे नदी में पत्थर का रहना हुआ

ज़रूर लम्बी धुन की कोई बारिश थी
याद नहीं निमिष भर की रात थी
या कोई पूरा युग था

स्मृति थी
या स्पर्श में खोया हाथ था
किसी गुनगुने हाथ में

एक तकलीफ़ थी
जिसके भीतर चलता चला गया
जैसे किसी सुरंग में

अजीब ज़िद्दी धुन थी
कि हारता चला गया

दिन को खूँटी पर टाँग दिया था
और उसके बाद क़तई भूल गया था

सिर्फ़ बोलता रहा
या सिर्फ़ सुनता रहा
ठीक-ठी

आ राजा का बाजा बजा

यह कविता आपात्काल की दहशत भरी परिस्थिति में लिखी गई थी और घोर आपात्काल के दिनों में ही ‘उत्तरार्ध’ के संभवतः ग्यारहवें फासीवाद विरोधी अंक में अन्य कुछ कविताओं के साथ प्रकाशित हुई थी। उन दिनों इसका अनेक ढंग से उपयोग हुआ। आपात्काल खत्म होने के बाद के वर्षों में जन नाट्य मंच ने ‘राजा का बाजा’ नाम से बेरोज़गारी पर एक नाटक किया, जिसका शीर्षक के अलावा कविता से सिर्फ़ इतना लेना-देना था कि उसमें इस कविता की चंद पंक्तियों को अपने ढंग से बदलकर और एक आरती की धुन में ढालकर पैरोडी की तरह इस्तेमाल कर लिया गया था।

देश की मौजूदा परिस्थिति आपात्काल के मुक़ाबले कहीं ज्यादा गम्भीर और भयावह है। आपात्काल के तुरन्त बाद के समय की
मानसिकता से तो यह और भी उलट है। ऐसे में इस कविता के नाम पर चल रहा पैरोडी पाठ और उसकी उत्फुल्ल ‘जय जगदीश हरे’ धुन मुझे खासतौर पर परेशान कर रही थी।

‘उत्तरार्ध’ के अनेक पुराने अंक नापैद हो गए हैं। मैंने उन्हेें हासिल करने की कोशिश कई बार की लेकिन नाकामयाब रहा। अचानक करीब आठ-दस साल पहले अपनी ही पत्रिकाओं में आपात्काल के दौर का एक क्षत-विक्षत जर्जर अंक हाथ लगा, तभी यह और कुछ अन्य कविताएँ किसी तरह फोटोकाॅपी कराकर रख ली थीं। उन्हीं को ढूँढ़कर निकाला है और अब (रिकाॅर्ड ठीक करने के लिए) यह पोस्ट कर रहा हूँ।

आ राजा का बाजा बजा
ता ऽ थे ई ता ऽ
ता ऽ गा ऽ
रो टी खा … न खा …
गा ऽ
आ …
आ रा जा का बा जा ब जा
स च म त क ह
चु प र ह… चु प र ह …
स ह स ह स ह
रा श न
न न … न न …
ईं ध न …
न न … न न …
ब र त न ठ न ठ न
चु प… चु प…
श ठ सु न…
सु न… चा बु क च म का र
ज न ग न म न
अ धि ना य क…. ना य क …
उ न्ना य क… प त वा र
जी व न खे व न हा र
त न म न वे त न
स ब अ र प न क र
तु र त तु र त
भ ज उ त्पा द न … पा द न…
के व ल
मू क ब धि र बन
व ध ल ख
म त क र
कु न मु न
झु ल स न ठि ठु र न स ब
म न की त न की पी…
पी… जी…
ल ब रँ ग चु न ज प
अ नु शा स न
शा स न
के व ल
मु ड़ तु ड़ नि चु ड़ नि चु ड़
इ त उ त उ ड़ म त
लु ट पि ट बि क
धि क् उ फ म त क र
जु त च ल उ ठ
झ ट प ट क र
श्र म से न ड र
श्र म से न ड र
श्र म से न ड र
ड ग में ड ग म ग म त क र
म ग में म त क र ह र क त
ब क ब क ब स क र
च ट प ट क र क र त ल
सं भ ल सं भ ल च ल
आ ता है र थ
ल थ प थ ज न प थ प र
छ म…छ म…
ल क द क स ज ध ज
आ ता है रा ज कुं व र को म ल
ओ रे ख ल ब न ट म ट म
इ ठ म त
ह ठ त ज
च ल उ ठ
झ ट प ट क र
आ … गा…
ता … थे ई …ता …ऽ ऽ
आ ऽ
आ रा जा का बा जा ब जा।

क याद नहीं

 

Share