मनीषा कुलश्रेष्ठ की रचनाएँ

सादा दिल औरत के जटिल सपने

लोग कहते थे वह एक सादा दिल
भावुक औरत थी
मिजाज – लहजे
ढब और चाल से
रफ्तार ओ गुफ्तार से

उसकी रेल अकसर सपनों में
छूट जाया करती थी
अकसर वीरान स्टेशनों पर
सपनों में वह खुद को अकेला पाती
उसके सपनों में
कोलाज जैसे कुछ चेहरे थे
अजनबी शहरों का रास्ता दिखाते
भीतर दबे शहरों का
माकूल – सा पता बताते

उसके सपनों में सैलाब थे
भंवर के बीच खिलते कमल थे
एम्फीथियेटरों में भटकती
वह उनके गलियारों में नाचती थी
न जाने कौनसे अनजाने दृश्य जीती
और
सम्वाद दोहराया करती थी
वह उड़ती थी सपनों में
नीली मीनारों की उंचाइयों से
कूद कर
हवा में ही गुम हो कर

घबरा कर
रोज सुबह
वह पलटा करती थी पन्ने
सपनों का अर्थ जानने वाली किताबों के
सपने जो उसे
बिला नागा हर रात आते
सपने जो दुर्लभ थे
वे और उनके अर्थ वहां नहीं मिलते थे
किसी ने कहा था लिखना खुल कर
अपने सपनों के बारे में देर रात तक
जागना चाय के प्याले, कलम और
कागज़ के साथ
फिर कहा _
रख देना
मेज पर इन कागजों को खुला
फडफ़डाने देना पांच घण्टों तक

वह लिख देती सपने कागजों पर
छोड देती फडफ़डाता
कुछ ही घण्टों में
उनके रंग और अर्थ बदल जाते
तब वह गुमसुम हो जाया करती
बन्द कर देती
एम्फीथियेटरों के विशाल दरवाजे
उतर आती नीली मीनारों से
और लौट जाती
अपनी सादा सी दुनिया में
दिन भर.

एक औरत के यकीन

एक औरत के
यकीनों का क्या है?
टूटते रहते हैं हर रोज
हाथ से गिरे प्यालों की तरह
बटोर कर फैंक देती है वह
उसे शायद नहीं पता
नहीं करती है वह सामना
बाहर की दुनिया का
एक मर्द के लिये
जो कि बहुत आसान नहीं
बहुत बचाता है
बचाना चाहता है
वह औरत के मासूम यकीनों को
लेकिन कई बार
मुमकिन नहीं होता
मर्दों की दुनिया में
मर्द होने की प्रक्रिया में

कई बार लौटा कर
लाया भी है वह
सही सलामत उन कांच से यकीनों को
लेकिन
घर की देहरी तक
लौटते उसके पांव
यूं थक कर लडख़डाते हैं कि
छन्न – से
टूट कर गिर ही पडते हैं
औरत के यकीन

एक औरत की पुकार

क्यों लगता है औरत को
कि
वह नहीं सुनता उसकी
सालों से
एक मोटी दीवार के
पीछे से
बतियाती रही है वह
बेवजह
या
जिसे वह पुकार कहती है
वह महज गूंज हो
आवारा सन्नाटों की
जिनसे वह दिन – दिन भर उलझी है
शायद वह नहीं जानती
कितना कानफाडू शोर है
घर से बाहर की दुनिया में
कितने प्रश्न गैरों के
कितनी कैफ़ियतें अपनों की
कितनी चीखें अजनबियों की
शायद पहुंचती ही न हो
उसकी वह धीमी सी पुकार
कानों में हमेशा के लिये
खिंच गई
शोर की मोटी दीवार के पार

एक औरत के गुनाह

ये गुनाह हैं क्या आखिर?
ये गुनाह ही हैं क्या?
कुछ भरम,
कुछ फन्तासियां
कुछ अनजाने – अनचाहे आकर्षण
ये गुनाह हैं तो
क्यों सजाते हैं
उसके सन्नाटे?
तन्हाई की मुंडेर पर
खुद ब खुद आ बैठते हैं
पंख फडफ़डाते
गुटरगूं करते
ये गुनाह
सन्नाटों के साथ
सुर मिलाते हैं
धूप – छांह के साथ घुल मिल
एक नया अलौकिक
सतरंगा वितान बांधते हैं
सारे तडक़े हुए यकीनों
सारी अनसुनी पुकारों को
झाड बुहार
पलकों पर उतरते हैं
ये गुनाह
एक मायालोक सजाते हैं
फिर क्यों कहलाते हैं ये
एक औरत के गुनाह?

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