मनीष मिश्र की रचनाएँ

 

डायरी के फटे पन्नों में

डायरी के फाड़ दिए गए पन्नों में भी
साँस ले रही होती हैं अधबनी कविताएँ
फड़फड़ाते हैं कई शब्द और उपमायें!
विस्मृत नहीं हो पाती सारी स्मृतियाँ
सूख नहीं पाते सारे जलाशय
शब्दों और प्रेम के बावजूद
बन नहीं पाती सारी कविताएँ!
डायरी के फटे पन्नों में
प्रतीक्षा करती है कविताएँ
संज्ञा की, प्रतीक की, विशेषण की नहीं
दख की उस ज़मीन की
जिस पर वो अक्सर पनपती हैं!

किताबें 

हमारे सूखे दरकते जीवनाकाश को
गीला करती हैं किताबें
वे संजोती हैं इतिहास की सूख गई बेल
सुंदर उपमायें और
अंतहीन सपनों के प्रायदीप!
वे चुनती बटोरती हैं
आदि मंत्रो के स्वर-विन्यास
और हरीतिमा में भीगी रागिनी!
एक ऐसे समय में
जब सूख चुकी है हस्तलिपियाँ
और संवेदनाएँ
रंगों-गंधों की सूक्ष्म विवेचनायें!
ऐसे हाँफते, काँपते समय में
किताबे हमें
फिर-फिर लौटाती हैं
जोड़ती-गाँठती हैं
बिसरा दिए गए अक्षरों से
लिपि से
भाषा से
एक अदभुत जीवन से!

सब कुछ नहीं होता समाप्त

सब कुछ थोड़े ही सूख जाता है
बच ही जाती है स्मृति की नन्ही बूंद
मिल ही जाता है प्रिय का लगभग खो गया पता
अलगनी में सूखते हुए कपड़ों पर बच ही जाती है
देह-गंध की नम आँच
पायँचे के घुटनों पर रेंग ही आती है मुलायमियत

सब कुछ थोड़े ही ख़त्म हो जाता है
मृत्यु के बाद भी बचे रहते है अस्थि फूल
सूखे जलाशय के तलछट में जीवित रहती है एक अकेली मछली
विशाल मरुस्थल की छाती पर सूरज के खिलाफ़
लहराता है खेजरी का पेड़

सब कुछ नहीं होता समाप्त
हमारे बाद भी बचा रहता है जीने का घमासान
भूख के बावजूद बच ही जाते है थाली में अन्न के टुकड़े
निकल ही आता है पुराने संदूक से जीर्ण होता प्रेम-पत्र
सबसे हारे क्षणों में मिल ही जाता है दोस्त ठिकाना

सब कुछ थोड़े ही मिट पाता है
उम्र के बावजूद भी बचे रहते है देह पर प्रेम-निशान
जीवन के सबसे मोहक क्षणों में भी चिपका रहता है बीत जाने का भय

सब कुछ नहीं होता समाप्त।

 

उम्र के चालीसवे वसंत में

उम्र के चालीसवें वसंत में-
गिरती है समय की धूप और धूल
फ़र-फ़र करती झरती हैं तरुण कामनाएँ
थोड़े और घने हो जाते है मौन के प्रायः दीप
फिर, फिर खोजता है मन सताए हुए क्षणों में सुख!

उम्र के चालीसवें वसंत में-
छातों और परिभाषाओं के बगैर भी गुज़रता है दिन
सपने और नींद के बावजूद बीतती है रात
नैराश्य के अन्तिम अरण्य के पार भी होता है सवेरा
जीवन के घने पड़ोस में भी दुबकी रहती है अनुपस्थिति!

उम्र के चालीसवें वसंत में-
स्थगित हो जाता है समय
खारिज हो जाती है उम्र
बीतना हो जाता है बेमानी!

तुम

मैं देखता हूँ तुम्हारे हाथ
चटख नीली नसों से भरे
और
उंगलियों में भरी हुई उड़ान
मैं सोचता हूँ
तुम्हारी अनाव्रत देह की सफ़ेद धूप
और उसकी गर्म आँच
मैं जीत्ताता हूँ तुमको
तुम्हारे व्याकरण और
नारीत्व की शर्तो के साथ
मैं हारता हूँ
एक पूरी उम्र
तुम्हारी एवज में!

 

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