मनीष मूंदड़ा की रचनाएँ

प्रेरणा

जीवन के इस प्रवाह में
प्रेरणा का अभाव-सा है
वैसे तो जीने के लिए निरंतर चल रही है साँसे
पर मानो इस जीवन में खुशियों का दुष्प्रवाह-सा है
झुलसा हुआ हैं अब ये मन
धुल धूसरित हुआ ये तन
किसी अपनत्व को ढूँढता लगातार
अब मानो, जैसे थक से चुके है मेरे सारे विचार
कभी विचारों का उद्वेलन था
प्रखरता का मुझमे संवेदन था
सपने थे, अपने थे
कई सारे मेरे अपने भी थे
अब लक्ष्य विहीन मसीहा-सा मैं
भीड़ में समाहित हुआ जा रहा हूँ
व्याकुल मन लिए,
पीड़ाओं का दंश लिए
अपने होने का वजूद खोता जा रहा हूँ
इन सबका अंत होगा
एक बार फिर से नया आरम्भ होगा
पर आरम्भ से पहले का अंत मुझे जीना होगा
अपने जीवन प्रवाह में एक

इंतजार

साँझ हुई हैं…
समुद्र का आँगन देखो सुनहरा-सा हो चला हैं।
दूर एक अकेली नाँव कौतूहल जगाती
चल रही है धीमी गति से
शायद अपने गंतव्य की ओर जाती
या फि र कहीं खो गई हैं
सब कुछ शांत-सा हैं
पखेरू अब घर को चले गए हैं
लहरें भी हल्की-सी आहट से बह रहीं है
जैसे सबको किसी का इंतजार हैं
ठीक वैसे ही जैसे, किनारे पर बैठा मेरा मन
एक अंतहीन इंतजार में है…

और प्रेरणा स्रोत को ढूँढना होगा।

मनोभाव

काले मेघ भरे हुए नन्ही बूँदों से
मेरे मनोभावों की तरह
उन बुँदों को छोड़ देने का संताप
वैसे ही जैसे कई बार छूट जाती हैं हसरतें
और बह जाते है एहसास और जज्बात के रेले
उस बरसात की तरह
उमड़ती घटायें क्यों लगती हैं
मुझे मेरे मन की तरह
विरह की वेदना लिए
जो कभी खामोश
कभी बाहर आने को बेताब
मचलते जज्बातों को लेकर
जिए जा रहा है…
यह मेरा मन
काले मेघों की तरह…

अधूरा चाँद

मेरे चाँद पर कभी दो पल ठहर के देखो
तुम्हारी ही ओर तकता रहता है
मेरे काँधे पर रुकता चलता
मुझसे तुम्हारी ही बातें करता रहता है
मुझसे तुम्हारे कभी होने
कभी न होने का सबब पूछता है
और मैं कुछ नहीं बोल पाता
सिर्फ उसमें तुम्हारी तस्वीर उकेरता रहता हूँ

(कुछ रिश्तों का गवाह सिर्फ़ चाँद ही तो होता है
तभी तो सबको पूरा कर
खुद अधूरा रहता है…)

 

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