मनोज कुमार झा की रचनाएँ

कुछ न कुछ गल जाता है इस जीवन का

खत किया पूरा
अपूर्ण टुकड़े के नीचे अपना नाम रखकर
अंत में लिख दिया
जहां-जहां काट-कूट उसे भी खत का
हिस्सा मानना
अनंत लकीरें, असंख्य काट-कूट और
अगनित अक्षर हैं बचे हुए जो
साथ-साथ हजार साल गुजारो तो जान
सकती हो
लिफाफे के ऊपर उसका नाम लिखा
सुंदर लिखना अपनी ताकत के उस पार
था
थोड़ा बेहतर लिख सकता था मगर अंगुलियां थीं रात के नाखूनों से आहत
उबाऊ है अपना पता लिखना
इसे लेकर क्या करूंगा जब लौटा ही देगी
और नहीं भी पहुंचे तो एक खत कम ही
सही
रोज कोई न कोई पत्र गल ही रहा इस
जीवन का.

सूखा

जीवन ऐसे उठा
जैसे उठता है झाग का पहाड़
पूरा समेटूँ तो भी एक पेड़ हरियाली का सामान नहीं
जिन वृक्षों ने भोर दिया, साँझ दिया, दुपहरी को ओट दिया
उसे भी नहीं दे सकूँ चार टहनी जल
तो बेहतर है मिट जाना
मगर मिटना भी हवाओं की सन्धियों के हवाले
मैं एक सरकार चुन नहीं पाता
तुम मृत्यु चुनने की बात करते हो !

बाँधना एक सुन्दर क्रिया थी

उठ के न जाए कहीं रात में माँ
मैं शर्ट के कोने को माँ के आँचल से बाध लेता था
और जब वह उठती
तो जगाते थपथपाते कहती कि मैं बन्धन खोल रही हूँ
कई बार तो मुझे याद भी नहीं रहता था, सुबह मैं
सोचता हूँ काँपता हूँ कि मझनींद में माँ बच्चे को उठा रही है
स्तुति करूँगा कि वह जानती थी भरोसे को खोलना
अभी सुबह के चार बजे दरभंगा स्टेशन पर भटकते सोचते संशय में हूँ
कि किसी गाड़ी पर बैठ हो जाऊँ अज्ञात
या इन्तज़ार करूँ उस प्यारी ट्रेन का जो मुझे सही जगह पहुँचा देगी ।

 

इस तरफ़ से जीना

यहाँ तो मात्र प्यास-प्यास पानी, भूख-भूख अन्‍न
और साँस-साँस भविष्य
वह भी तो जैसे-तैसे धरती पर घिस-घिसकर देह
देवताओं, हथेलियों पर दो थोड़ी जगह
खुजलानी हैं लालसाओं की पाँखें
शेष रखो भले पाँव से दबा बुरे दिनों के लिए
घर को क्यों धांग रहे इच्छाओं के अन्धे प्रेत
हमारी सन्दूक में तो मात्र सुई की नोक भर जीवन

सुना है आसमान ने खोल दिए हैं दरवाज़े
पूरा ब्रह्मांड जब हमारे लिए है
चाहें तो सुलगा लें किसी तारे से अपनी बीडी

इतनी दूर पहुँच पाने का सत्तू नहीं इधर
हमें तो बस थोड़ी और हवा चाहिए कि हिले यह क्षण
थोड़ी और छाँह कि बांध सकें इस क्षण के छोर।

 

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