मनोज चौहान की रचनाएँ

बड़े दाँतों वाली मशीन

खड़ी है
उपेक्षित अवस्था में
वह बड़े दांतों वाली मशीन
कुछ ही दूरी पर
परियोजना स्थल से।

न जाने कब पड़ जाए
नजर उसपर
किसी कबाड़ी की
क्योंकि अब
समाप्त हो चुका है
निर्माण कार्य।

उसकी अपार क्षमताओं का
उपयोग कर
उसे भूल चुका है चालक
और शायद मालिक भी
वह दे चुकी है
अपना सौ प्रतिशत
या उससे भी
कई गुणा।

मगर अडिग है दृढ़ता से
आज भी
जंग लगे कल-पुर्जों ने
भले ही उसे
कर दिया हो निष्प्राण।

उसके घुमावदार हिस्से के नीचे
आश्रय पाते हैं आवारा जंतु
बारिश और भीषण गर्मी से
बचाव के लिए
कर रही है सार्थक
आज भी
अपने होने के अर्थ को।

समयचक्र ने कर दिया है
उसे गतिहीन बेशक
मगर प्रेरणापुंज है वह
हर उस व्यक्ति के लिए
जो कर चुका है
आत्मसमर्पण
परिस्थितियों से हारकर।

जननी है वह
नई अवधारणाओं की
झिंझोड जाती है
मस्तिष्क के तंतुओं को
अनायास ही
त्वरित वेग से
ताकि मंथन सदैव
जारी रहे।

ब्याही बेटी

बर्षों पहले
पास के गाँव में
ब्याही बेटी
रहती है फिक्रमंद आज भी
बूढी माँ के लिए
जबकि वह खुद भी
बन चुकी है अब
दादी और नानी।

अक्सर गुजरती
मायके के साथ लगती सड़क से
खिंची चली आती है
आँगन में बैठी
बूढी माँ के पास।

वह चुरा लेती है कुछ पल
माँ की सेवा के लिए
अपने भरे – पुरे परिवार की
जिम्मेदारियों के बीच भी।

पानी गर्म कर
नहलाती है माँ को
धोती है उसके कपड़े – लत्ते
संवारती है सलीके से
सिर पर उलझी हुई चांदी को
शायद वैसे ही
जैसे करती होगी माँ
जब वह छोटी थी।

बूढी माँ देखती रहती है
टुकुर – टुकुर
विस्मृत हुई स्मृतियाँ
बेटी के बचपन की
लगाती हैं छलांग अवचेतन से।

फेरती है हाथ प्यार से
बेटी के सिर पर
भावनाएं छलक पड़ती हैं
जीर्ण नेत्रों से
न चाहकर भी।

द्रवित हुई बेटी चाहती है दिखाना
मजबूत खुद को
बंधाती है ढाढस माँ को
उम्र की इस अवस्था में
अब बेटी

चिठ्ठियाँ

दूर सियाचिन के ग्लेशियरों से
जब भी आती थी
फौजी दोस्त की चिठ्ठियाँ
मीलों के फासलों के दरम्याँ भी
ख़त पढ़ते ही लगता था
आया हूँ उसी क्षण
उससे मिलकर।

शून्य से नीचे के तापमान में
शब्द कभी जम नहीं पाए
वो पाते रहे आकार
अहसास और भावनाओं के ताप से।

आज भी संजोये हुआ हूँ
वो पुरानी चिठ्ठियाँ
धुंधले पड़ गए है शब्द
नर्म पड़ चुके
और गले हुए कागज़
बचाए हुए हैं अपना वजूद
जैसे–तैसे।

दोस्त अब हो गया है
सेवा निवृत्त
पुनः मुस्तैद है
जीवन के एक और मोर्चे पर
परिवार से दूर बिताए वक्त की
भरपाई आवश्यक है।

मैंने भी लांघी हैं
घर की दहलीज
रोजी के जुगाड़ में
अब बोलबाला है इन्टरनेट
एवं सूचना क्रान्ति का।

व्हाट्स एप्प और फेसबुक की
आभासी दुनिया में
बेशक मित्रों की लंबी कतारें हैं।

नदारद है मगर
अपनापन और संवेदनाएं
आत्मीयता खो चुकी है अर्थ।

अब मैं भी
नहीं लिख पाता चिठ्ठियाँ
इन्तजार डाकिये का भी
नहीं रहता अब।

मगर चिठ्ठियों के
उस दौर की
टीस उठती है
आज भी जेहन में
जिसे लील गए हैं
विज्ञान के ये आधुनिक
मगर
संवेदनहीन दूत।

हो जाना चाहती है ‘माँ’!

पोखर

बजूद
खोते जा रहे हैं पोखर
बुजुर्गों की
दूरदर्शी सोच के परिचायक
जिनका होना
प्रतीक था
खुशहाली और समृद्धि का।

गाँव के बीचोंबीच
होते थे स्थित
ताकि होता रहे रिसाव
धरती के भीतर से
और बनी रहे नमी
कृषि योग्य भूमि की।

खिले हुए कमल
और उनके गोलाकार पत्तों से
ढकी उपरी सतह
मछली, मेंढक और
बगुलों की शरणस्थली।

संध्याकाल के समय
इनके इर्द – गिर्द
गप-शप करते
बड़े – बुजुर्ग
और क्रीड़ा करते
बच्चों की टोलियाँ
गाँव की व्यस्तत्तम जगह।

समर्थ थे ये
पशुओं के लिए पेयजल
और कपड़े धोने आदि
अनेक क्रियाओं के लिए
या फिर गाँव में आगजनी जैसी
भीषण घटनाओं का सामना
करने को तत्पर
करते थे प्रतिपूर्ति
बालपन के लिए
स्विमिंग पूल की।

आज वक्त ने बदली है करवट
अधिकतर पोखरों का भराव कर
तैयार कर दिए गए हैं
सामुदायिक भवन
या फिर पंचायत घर
ईका – दुक्का कुछ जगह
संघर्ष करते
अपने बजूद के लिए
शिकार हैं अतिक्रमण का।

गाँव अब हो गए हैं विकसित
शामिल हो गए हैं
शहरीकरण की होड़ में।

विकास और सुविधाओं की
बलिवेदी पर कुर्बान
धरती के गर्भ में समा चुके
पोखरों की चीत्कार
अब नहीं सुनना चाहते
बहरे हो चुके गाँव!

 

विषैले खूख

तथाकथित कुछ नेता
उभरने लगे हैं आज
जैसे उग आते हैं
बरसाती मौसम में
घातक विषैले खूख1
स्वतः ही।

टिकट की चाह में
कर रहे हैं अभिनय
दिन – प्रतिदिन
समाज सेवा, भाईचारे
और इंसानियत की आड़ में।

बटोरना चाहते हैं
लोकप्रियता
मात्र सस्ते हथकंडों से
गरीब बच्चों को पात्र बनाकर
भेंट कर कुछ कपडे
खींचे जाते हैं फोटो
और अगले दिन
बन जाते है सुर्खियाँ
समाचार पत्रों की।

महापुरषों की जयन्तियों पर
माल्यार्पण करते हुए
अथवा किसी समारोह के
मुख्य अतिथि बनाये जाने पर
समझते हैं
सौभाग्यशाली खुद को
ध्येय मात्र एक ही
ध्यानाकर्षण और समर्थन
उपस्थित जनसमूह का।

समाजसेवक का मुखौटा ओढ़े
छल रहे हैं
अपने ही लोगों को
दे रहे है दगा
सामाजिक जागरण और
सद्भावना रैलियों के नाम पर।

भूल चुके है फर्क
नैतिक और अनैतिक के मध्य
अमादा हैं छीनने को हक़
यथार्थ में ही शोषितों का।

गुमराह, भ्रमित और कुंठाग्रस्त
एक भाड़े की भीड़
करती है उनका अनुसरण
समर्थन प्राप्त है उन्हें
कुटिल बुधिजीवी वर्ग का भी
घोल रहे हैं जहर
समाज की नशों में।

बैकलॉग का लॉलीपॉप देकर
मोहपाश में बांधते
बेरोजगार युवाओं को
दिखा रहे हैं राह
स्वाभिमानहीन और पंगु
बन जाने की।

उम्मीद है कि जागेगा युवा
एक दिन
छोड़ कर संकीर्णताएं
टिकाएगा पावं मजबूती से
सत्य की उर्वरा भूमि पर
और रौंद डालेगा
ये विषैले ‘खूख’।

खूख= कुकुरमुत्ता या कवक, जो बरसात के दिनों में नर्म भूमि पर उगता है। हिमाचल प्रदेश के मंडी जिला की स्थानीय बोली में इसे ‘खूख’ कहा जाता है।

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