मनोज झा की रचनाएँ

सरस्वती वंदना

जय सरस्वती जय शारदे,
माँ भगवती, मुझे उबार दे ।
है घन घमण्ड से घिरा ज्ञान,
माँ, कर दे मेरा परित्राण ।

कहते तुमको जगतीख्याता,
तू रख ले मेरा स्वाभिमान ।

हे बुधमाता ! मुझे प्यार दे,
माँ भगवती, मुझे उबार दे ॥ जय…॥

जीवन में हैं कुण्ठित विचार,
जीने के नहीँ हैँ तत्व सार ।

हे वरदायिनी तू एक बार
बन जा मेरा जीवन आधार ।
जीवन में नई बहार दे,
हे भारती, मुझको तार दे॥ जय…॥

हे भुवनेश्वरी ! हे चन्द्रकान्ति !
हे वागेश्वरी ! भर दे तू शान्ति ।

मैं एक पग भी चल नहीं सकता,
बिन तेरे हे कुमुदीप्रोक्ता !

हंसवाहिनी ! मुझे सुधार दे,
ब्रह्मचारिणी ! मुझे सँवार दे ॥ जय …॥

 

भगवती वंदना

जग जननी माँ, भाव की भूखी
मेरे भाव का पान करो ।
दर्शन दो सन्ताप हरो, माँ !
अटल भक्ति का दान करो ।
जग जननी माँ…॥

भोग-वस्तु मैं दे नहीं पाता,
कारण की पहचान करो ।
बड़े भक्त जय-यश पाते हैं —
मुझ छोटे का भी ध्यान धरो ॥
जग जननी माँ …॥

कितनी बार मैं माँ कहता हूँ
बेटा तुम एक बार कहो,
जीवन सफल बना दे, हे मैया !
स्वर मेरा स्वीकार करो ॥
जग जननी माँ …॥

 

होम्यो कविता: डल्कामारा

सर्दी लगी या रुका पसीना,
देह फूलकर हो गया दूना।
दिन में गर्मी रात में जाडा,
डल्कामारा डल्कामारा॥

खाली पैर चले जो जाव,
दुधिया हुआ या रुका पेशाब।
याद करो बरसाती नारा,
डल्कामारा डल्कामारा॥

गर्दन ऊपर उपभेद का बनना,
पीली भूरी पपडी जमना।
खुजलाने की खूब लगन हो,
फिर तो इसके बाद जलन हो।
गरम सेंक से बढता पारा,
डल्कामारा डल्कामारा॥

बेराइटा कार्ब औ नेट्रम सल्फ
करते इसको काफी हेल्प।
टारपीड कफी और कंठमाला ।
देखो दे दो डल्कामारा॥

के-सी, कै म्फर, इपीकाक,
इसके असर को करता साफ।
सर्दी खांसी बुखार झाडा,
याद करो तब डल्कामारा॥
होम्यो कविता: एण्टिम टार्ट
नाड़ी शिशु छूने नहीं देता,
घड़घड़ करता है छाती।
बलगम निकालने में दिक्कत हो,
होता जब ढीली खाँसी॥
मिचली और ओकाई के सँग औंघाई रहता है।
बच्चा हरदम गोद में चढकर टहलाने कहता है॥
नाड़ी तेज पसीना ठंडा, घटता जाए देह का ताप।
कमजोरी और श्वास कष्ट हो ।
याद करें तब एण्टिम टार्ट॥

होम्यो कविता: नक्स वोमिका

भोजन, सुबह या धूम्रपान से मिचली और वमन हो।
बार-बार होता पेशाब और उसके साथ जलन हो॥

बार-बार जाता पाख़ाना पर वह चैन नहीं पाता।
कमर पीठ के दर्द के कारण करवट बदल नहीं पाता॥

वह ज्वर की तीनों स्थिति में चादर ओढ़े रहता है।
छींक और पतली सर्दी सँग नाक बन्द भी कहता है॥

भोजन या ठण्डे पानी से दाँत दर्द बढ़ जाता है।
सड़ी गन्ध तीते पानी से मुँह हरदम भर आता है॥

अधिक दिनों तक एम-सी हो जल्दी-जल्दी ज़्यादा ज़्यादा।
दाग पकड़ता है साड़ी में बदबूदार प्रदर सादा॥

रक्त पित्त की हो प्रधानता, चिड़चिड़ा आलसी और क्रोधी।
खाँसी से हो पेड़ु दर्द तो नक्स माँगता है रोगी॥

 

 

होम्यो कविता: कोनियम

किसी से मिलना नहीं चाहता और अकेले लगता है डर।
करवट बदले सिर हिलाए आ जाए उसको चक्कर॥

नारी देख वीर्य गिर जाए, प्रेम रोग हो जाए अगर।
संगम की हो अदम्य इच्छा साथ में हो ध्वजभंग मगर॥

नीचे से बढता है लकवा सुन्न करे चलकर ऊपर।
पेशाब मेंतकलीफ अगर हो याद करो कोनियम डाक्टर॥

ऋतुस्राव के दस दिन बाद हो जाए यदि श्वेत प्रदर।
देर से होता ऋतुस्राव और हो दाँयीं स्तन पत्थर॥

सूई चुभन कड़े सूजन में वजह चोट की रहे अगर।
जरायु का हो दोष यदि तो याद करो कोनियम डाक्टर॥

कुमारी का हो रक्त प्रदर या जरायु / स्तन का कैंसर।
कामेच्छा के दमन से रोग हो याद करो कोनियम डाक्टर॥

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