मलिकज़ादा 'मंजूर'

मलिकज़ादा ‘मंजूर’की रचनाएँ

अब ख़ून को मय क़ल्ब को पैमाना कहा जाए

अब ख़ून को मय क़ल्ब को पैमाना कहा जाए
इस दौर में मक़तल को भी मय-ख़ाना कहा जाए

जो बात कही जाए वो तेवर से कही जाए
जो शेर कहा जाए हरीफ़ाना कहा जाए

हर होंट को मुरझाया हुआ फूल समझीए
हर आँख को छलका हुआ पैमाना कहा जाए

सुनसान हुए जाते हैं ख़्वाबों के जज़ीरे
ख़्वाबों के जज़ीरों को भी वीराना कहा जाए

वाइज़ ने जो फ़रमाया था मेहराब-ए-हरम में
रिन्दों से वो क्यूँ साक़ी-ए-मय-ख़ाना कहा जाए

तपते हुए सहरा में भी कुछ फूल खिलाएँ
कब तक लब ओ रूख़सार का अफ़साना कहा जाए

हम सुब्ह-ए-बहाराँ की तमाज़त से जले हैं
हम से गुल ओ शबनम का न अफ़साना कहा जाए

दीवाना हर इक हाल में दीवाना रहेगा
फ़रज़ाना कहा जाए के दीवाना कहा जाए

मख़दूम से हम को भी निस्बत वहीं ‘मंजूर’
रिन्दों में जिसे निस्बत-ए-पैमाना कहा जाए

दिल का हर क़तरा-ए-ख़ूँ रंग-ए-हिना से माँगो

दिल का हर क़तरा-ए-ख़ूँ रंग-ए-हिना से माँगो
ख़ूँ-बहा दोस्तें क़ातिल की अदा से माँगो

मत बनाओ यद-ए-बैज़ा को गदा का कश्‍कोल
वक़्त फ़िरऔन हो जब ज़र्ब-ए-असा से माँगो

जब बरसने से बढ़े तिश्‍ना-लबी का एहसास
यूरिश-ए-बर्क़ ही सावन की घटा से माँगों

कब तलक शाख़-ए-वफ़ा लाएगजी ज़ख़्मों के गुलाब
कोई तासीर नई आब ओ हवा से माँगो

मोम की तरह पिघल जाएगा शब का फ़ौलाद
दस्त-ए-दाऊद की तौफ़ीक़ ख़ुदा से माँगो

कुछ ग़म-ए-जानाँ कुछ ग़म-ए-दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम

कुछ ग़म-ए-जानाँ कुछ ग़म-ए-दौराँ दोनों मेरी ज़ात के नाम
एक ग़ज़ल मंसूब है उस से एक ग़ज़ल हालात के नाम

मौज-ए-बला दीवार-ए-शहर पे अब तक जो कुछ लिखती रही
मेरी किताब-ए-ज़ीस्त को पढ़िए दर्ज हैं सब सदमात के नाम

गिरते ख़ेमे जलती तनाबें आग का दरिया ख़ून की नहर
ऐसे मुनज़्ज़म मंसूबों को दूँ कैसे आफ़ात के नाम

उस की गली से मक़तल-ए-जाँ तक मस्जिद से मय-ख़ाने तक
उलझन प्यास ख़लिश तन्हाई कर्ब-ज़दा लम्हात के नाम

सहरा ज़िंदाँ तौक़ सलासिल आतिश ज़हर और दार ओ रसन
क्या क्या हम ने दे रखे हैं आप के एहसानात के नाम

रौशन चेहरा भीगी ज़ुल्फ़ें दूँ किस को किस पर तरजीह
एक क़सीदा धूप का लिक्खूँ एक ग़ज़ल बरसात के नाम

जिन के लिए मर मर के जिए हम क्या पाया उन से ‘मंजूर’
कुछ रूसवाई कुछ बद-नामी हम को मिली सौगात के नाम

मामूल पर साहिल रहता है फ़ितरत पे समंदर होता है

मामूल पर साहिल रहता है फ़ितरत पे समंदर होता है
तूफ़ाँ जो डुबो दे कश्‍ती को कश्‍ती ही के अंदर होता है

जो फ़स्ल-ए-ख़िजाँ में काँटों पर रक़्साँ व ग़ज़ल-ख़्वाँ गुज़रे थे
वो मौसम-ए-गुल में भूल गए फूलों में भी ख़ंजर होता है

हर शाम चराग़ाँ होता है अश्‍कों से हमारी पलकों पर
हर सुब्ह हमारी बस्ती में जलता हुआ मंज़र होता है

अब देख के अपनी सूरत को इक चोट सी दिल पर लगती है
गुज़रे हुए लम्हे कहते हैं आईना भी पत्थर होता है

इस शहर-ए-सितम में पहले तो ‘मंजूर’ बहुत से क़ातिल थे
अब क़ातिल ख़ुद ही मसीहा है ये ज़िक्र बराबर होता है

 

‘मंज़ूर’ लहू की बूँद कोई अब तक न मेरी बेकार गिरी

‘मंज़ूर’ लहू की बूँद कोई अब तक न मेरी बेकार गिरी
या रंग-ए-हिना बन कर चमकी या पेश-ए-सलीब-ओ-दार गिर

औरों पे न जाने क्या गुज़री इस तेग़ ओ तबर के मौसम में
हम सर तो बचा लाए लेकिन दस्तार सर-ए-बाज़ार गिरी

जो तीर अँधेरे से थे चले वो सरहद-ए-जाँ को छू न सके
चलता था मैं जिस के साए में गर्दन पे वही तलवार गिरी

क्या जानिये कैसी थी वो हवा चौंका न शजर पत्ता न हिला
बैठा था मैं जिस के साए में ‘मंज़ूर’ वही दीवार गिरी

मेरा ही पुर-सुकूँ चेहरा बहुत था

मेरा ही पुर-सुकूँ चेहरा बहुत था
मैं अपने आप में बिखरा बहुत था

बहुत थी तिश्‍नगी दरिया बहुत था
सराबों से ढका सहरा बहुत था

सलामत था वहाँ भी मेरा दामाँ
बहारों का जहाँ चर्चा बहुत था

उन्हें ठहरे समंदर ने डुबोया
जिन्हें तूफाँ का अंदाज़ा बहुत था

उड़ाता ख़ाक क्या मैं दस्त ओर दर की
मेरे अंदर मेरा सहरा बहुत था

ज़मीं क़दमों तले नीची बहुत थी
सरों पर आसमाँ ऊँचा बहुत था

 

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