राकेश तैनगुरिया की रचनाएँ

दिलक़श है शाम ए रौशन सब कुछ नया नया है

दिलक़श है शामेरौशन सब कुछ नया नया है
बस सभ्यता का सूरज पश्चिम में ढल गया है

चेहरों की बदगुमानी महलों के आइनों में
बढ़ती ही जा रही है आख़िर ये राज़ क्या है

क्यों धूल उड़ रही है अब भी मेरे ज़ेहन में
नफ़रत की आँधियों का मौसम गुजर गया है

अब प्रेम बासना सब एक दीखते हैं
ऐ रौशनी बता दे आख़िर ये राज़ क्या है

चेहरों से सज रहीं हैं बाजार की दुकाने
‘राकेश’ देखो मंज़र कितना नया नया है

वो पेड़ जो टूटा है आँगन में वफाओं का

वो पेड़ जो टूटा है आँगन में वफाओं का
कुछ दोष हमारा है कुछ दोष हवाओं का

ये दौरे तरक्की भी क्या दौरे तरक्की है
या सिलसिला है केवल बेहूदी प्रथाओं का

बेटों को दुआएँ दे पहुँचाती हैं सरहद पर
रुतबा है बहुत ऊँचा इस देश में माँओं का

वो शख्स मरा था कल जो रेल की पटरी पर
मुट्ठी में मिला उसकी इक पर्चा दवाओं का

प्यासा मैं मर जाऊँ मंजूर मुझे लेकिन
अब बोझ नहीं उठता जलधर की अदाओं का

अगर रिश्ता ए दिल निभाना नहीं था

अगर रिश्ता ए दिल निभाना नहीं था
तुम्हें मुझको अपना बनाना नहीं था

बड़ी कद्र थी तब खुलूसो वफा की
अभी जैसा पहले ज़माना नहीं था

किसी रोज ऐसा तो होना था यारो
गागर में सागर समाना नहीं था

इतना दिया देने वाले ने मुझको
जितना मिरा पैमाना नहीं था

मेरी बात तुमको बुरी तो लगेगी
तुम्हें हुस्ने चन्दा चुराना नहीं था

मेरा नाम ‘राकेश’ यूँही नहीं है
उजालों का कब मैं ख़जाना नहीं था

 

करें क्या इधर जाँ के लाले पड़े हैं

करें क्या इधर जाँ के लाले पड़े हैं
उधर भी जुबाँ पे तो ताले पड़े हैं

न जाने कहाँ है वो अब बरखा रानी
यहाँ सूखी नदियाँ नाले पड़े हैं

ये हिन्दोस्ताँ है मुहब्बत की धरती
यहाँ इश्क वाले निराले पड़े हैं

हमें याद है वो चेतक की गाथा
राणा के अब भी वो भाले पड़े हैं

‘राकेश’ हमने ये दुनिया में देखा

बड़े से बड़े दिल के काले पड़े हैं

सुबह तमाशा शाम तमाशा

सुबह तमाशा शाम तमाशा
ये जग आठों याम तमाशा

तुम जीवन को कुछ भी कह लो
सबका है अंजाम तमाशा

गीत कहाँ हैं अब वंशी में
गूँज रहा गुमनाम तमाशा

गरल पिया हँस हँस कर हमने
हो न जाय बदनाम तमाशा

हम सबके सब बाजीगर हैं
सिर्फ हमारा काम तमाशा

ऐ ‘राकेश’ चलो अब तुम भी
करके ये नीलाम तमाशा

 

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