राघव शुक्ल की रचनाएँ

सरस्वती वंदना

स्वर पपीहे का, संगीत दे साम का,
सुर भरा कण्ठ कोयल का अनमोल दे।
मातु कर दे दया चहचहाने लगूँ,
थोड़ी मिसरी मेरे कण्ठ में घोल दे॥

मोहिनी मीन की, मोरपंखों के रँग,
सौम्यता शावकों की मुझे दान दे।
हंस की बुद्धिमत्ता, नजर बाज की,
सिंह की शक्ति, भ्रमरों का मधुगान दे।
कल्पना के कपोतों को आकाश दे,
बन्द पिंजरे हृदय के सभी खोल दे।
मातु कर दे दया चहचहाने लगूँ,
थोड़ी मिसरी मेरे कण्ठ में घोल दे॥

लिख सकूँ देश महिमा, धरागान मैं,
उस गगन की कहानी, जगत की व्यथा।
गीत खुशियों के, किस्से परीलोक के,
तितलियों और शुक सारिका कि कथा।
दर्श दे-दे मुझे स्वप्न में ही सही,
मेरे कानों में आकर के कुछ बोल दे।
मातु कर दे दया, चहचहाने लगूँ,
थोड़ी मिसरी मेरे कण्ठ में घोल दे॥

कौन है ऐसा चितेरा

कौन है जिसने परिन्दों को परों से है नवाजा
कौन है बसता हृदय में और कण-कण में विराजा
कौन वह जिसने क्षितिज पर है धरा नभ को मिलाया
कौन जिसने चन्द्रमा को है सुधा का घट पिलाया
कौन जिसने रंग फूलों तितलियों में है बिखेरा
कौन है ऐसा चितेरा

कौन सागर की तरंगों में उफनता ज्वार लाया
कौन जिसने सीप के भीतर कहीं मोती छुपाया
कौन है जिसने मनोहारी प्रकृति के चित्र खींचे
कौन जिसने साँझ होते ही दिवस के नैन मींचे
कौन है वह रात के जो बाद में लाया सवेरा
कौन है ऐसा चितेरा

कौन जिसने एक नन्हे बीज को पौधा बनाया
कौन जो बहते पवन के साथ काले मेघ लाया
कौन जिसने पर्वतों से धार नदिया कि निकाली
कौन है जिसने जगत की डोर हाथों में सम्हाली
कौन जिसने भर दिया है चाँद सूरज में उजेरा
कौन है ऐसा चितेरा

गुरु शुकदेव मिलेंगे तुमको

गुरु शुकदेव मिलेंगे तुमको यदि हो सको परीक्षित

मिले काल से आंख अगर सन्निहित शक्ति हो जाये
विघ्न और भयव्यापी जग से जब विरक्ति हो जाये
चक्रपाणि भी हो जायेंगे आकर स्वयं उपस्थित
गुरु शुकदेव मिलेंगे तुमको यदि हो सको परीक्षित

रहे हमारा चित्त भ्रमर की भांति चरण में सेवित
चरणों में विश्राम चरण में निश्छल नमन निवेदित
गुरु ही ज्ञानस्वरूप करेंगे विमल ज्ञान में दीक्षित
गुरु शुकदेव मिलेंगे तुमको यदि हो सको परीक्षित

जो गुरु के प्रति सदा समर्पित जिसके अहम धुले हैं
सारे द्वार ज्ञानगंगा के उसके लिए खुले हैं
सदा समर्पण से ही मिलते हैं प्रतिफल प्रिय इच्छित
गुरु शुकदेव मिलेंगे तुमको यदि हो सको परीक्षित

इन रिश्तों को समय चाहिए / राघव शुक्ल

 

 राघव शुक्ल »

इन रिश्तों को समय चाहिए

गांठ नहीं लगने देनी है
एक डोर से बंध जाना है
ये रिश्ते हैं कांच सरीखे
इन्हें आंच पर पिघलाना है
रिश्ते हैं गुलाब से नाजुक
इनको कांटों से बचाइये

ये रिश्ते गूंगे की गुड़ हैं
ये रिश्ते फूलों की पाती
ये खुशियों के गुलदस्ते हैं
अच्छे बुरे वक्त के साथी
रिश्तों को सहेज कर रखिए
यदि रूठें तो फिर मनाइये

ये हैं गर्म खुशी के आंसू
इनको पलकों बीच संजोना
ये रिश्ते हैं मोती मूंगा
मनका मनका साथ पिरोना
ये रिश्ते ईश्वर की मूरत
मन के मंदिर में सजाइये

जब जब थमने लगती सांसें
रिश्ते धड़कन बन जाते हैं
जब भी विपदाएं आती हैं
उनके आगे तन जाते हैं
रिश्ते मीठे प्रेम गीत हैं
समय-समय पर गुनगुनाइये

इन रिश्तों को समय चाहिए

इन रिश्तों को समय चाहिए

गांठ नहीं लगने देनी है
एक डोर से बंध जाना है
ये रिश्ते हैं कांच सरीखे
इन्हें आंच पर पिघलाना है
रिश्ते हैं गुलाब से नाजुक
इनको कांटों से बचाइये

ये रिश्ते गूंगे की गुड़ हैं
ये रिश्ते फूलों की पाती
ये खुशियों के गुलदस्ते हैं
अच्छे बुरे वक्त के साथी
रिश्तों को सहेज कर रखिए
यदि रूठें तो फिर मनाइये

ये हैं गर्म खुशी के आंसू
इनको पलकों बीच संजोना
ये रिश्ते हैं मोती मूंगा
मनका मनका साथ पिरोना
ये रिश्ते ईश्वर की मूरत
मन के मंदिर में सजाइये

जब जब थमने लगती सांसें
रिश्ते धड़कन बन जाते हैं
जब भी विपदाएं आती हैं
उनके आगे तन जाते हैं
रिश्ते मीठे प्रेम गीत हैं
समय-समय पर गुनगुनाइये

बापू चारो धाम चले हैं

चार सुतों को बिना बताए
बापू चारो धाम चले हैं

सबसे बड़ा पुत्र है बद्री
बैठा रहता दिन भर खाली
उसे न भाता मेहनत करना
बहुत तेज उसकी घरवाली
बड़ी बहू को लगता बापू
बिन मतलब ही पड़े गले हैं

मझला वाला पुत्र द्वारिका
करता है दिन भर मजदूरी
लेकिन शाम जहां आती है
उसका पीना बहुत जरूरी
उसकी नशे भरी नजरों में
बूढ़े बापू सदा खले हैं

पुत्र तीसरा जगन्नाथ है
वह पत्तों का बड़ा खिलाड़ी
चार जीतता बीस हारता
गई हाथ से खेती बाड़ी
उसे देखकर बापू सोचे
बंसी बिन औलाद भले हैं

सबसे छोटा रामेश्वर है
वह भी दिल्ली गया कमाने
कहां रहेगा क्या खाएगा
कैसा होगा ईश्वर जाने
अपनी बिखरी हुई गृहस्थी
देख पिता के नयन जले हैं

धरती से राखी बंधवाने चंदा आया है

आसमान से उझक उझक कर
अपना रूप निहारे
धवल चमकता चीर लपेटे
उतरा नदी किनारे
भाई ने जो दिया वचन था आज निभाया है
धरती से राखी बंधवाने चंदा आया है

धरती ने जब देखा भाई
आया है चौखट पर
बैठा राह निहार रहा है
नदिया के पनघट पर
हवा चली है धूल उड़ी है तिलक लगाया है

फिर स्वागत में खिली कुमुदनी
मुसकाई हर पाखी
नदिया ने भी नीलकमल की
शीश चढ़ा दी राखी
नीला मुकुट पहन चंदा का मन हरषाया है

दीपक बहता हुआ ठिठककर
लगा आरती करने
नदी किनारे मीठा महुआ
लगा अचानक झरने
धरती ने भाई का मुंह मीठा करवाया है

दीपक था वो और नियति में जलते रहना था

वही रात की दुल्हनिया का अनुपम गहना था
दीपक था वो और नियति में जलते रहना था

सैनिक था वो अँधियारे से लड़ने आया था
बाती की बन्दूक और चिंगारी लाया था
अँधियारे को धूल चटाई थी हथियारों से
और हवा को मल्लयुद्ध में सबक सिखाया था
विजय मुकुट फिर अपने माथे जिसने पहना था
दीपक था वो और नियति में जलते रहना था

रजनी भी खुश हुई विजेता प्रियतम को पाकर
दीपक ने भर लिया बाँह में किरणें फैलाकर
सूरज के हाथों में फिर जलती मशाल देकर
फैलाओ उजियार भोर में बोला समझाकर
और रात मैं फिर आऊँगा उसका कहना था
दीपक था वो और नियति में जलते रहना था

गीत शिव की साधना के हैं शिवालय

गीत शिव की साधना के हैं शिवालय
श्रांत मन के हेतु हैं विश्राम आलय

गीत हैं चौपाइयाँ संवेदना की
गीत हैं ये पाण्डुलिपियां चेतना की
गीत अधरों पर कहीं बिखरी खुशी हैं
गीत ये उपवास की एकादशी हैं
गीत हैं ये प्राण पल्लव उर विटप के
गीत अभिजित मन्त्र हैं प्रभु नामजप के
गीत शाश्वत सत्य का जैसे उजाला
गीत हैं दिनकर महादेवी निराला
गीत अभिनव अनुभवों के पुस्तकालय
श्रांत मन के हेतु हैं विश्राम आलय

गीत हैं उत्सव मनीषी अस्मिता के
गीत हैं उत्कर्ष रचनाधर्मिता के
गीत अरुणिम भोर हैं शुचिता सरोवर
गीत हैं शुभ लाभ मोहक अति मनोहर
गीत हैं घुँघरू, वधू के पावनी पग
गीत हैं रज तीर्थ की,हैं गीत अग जग
गीत मंदिर प्रेम के, गुरुग्राम सुन्दर
गीत राघव का बने हैं पीत अम्बर
गीत गौरव और गरिमा के हिमालय
श्रांत मन के हेतु हैं विश्राम आलय

हर अक्षर कुछ तो कहता है 

हर अक्षर कुछ तो कहता है

कर्मठ जीवन ही अपनाओ
खतरों से तुम हाथ मिलाओ
गहन दृष्टि चिंतन हो प्रभु का
घर को मंदिर एक बनाओ
अङ्कन करता निज हस्ताक्षर
ङ भी कब खाली रहता है
हर अक्षर कुछ तो कहता है

चन्दन रहे चरित्र हमारा
छत्र रहे गुरु बनें सहारा
जगमग दीपक जलें नेह के
झरे प्रेम की निर्झर धारा
कञ्चन बनता है अक्षर जब
ञ् से अनुरंजित रहता है
हर अक्षर कुछ तो कहता है

टकराओ यदि मुश्किल आए
ठहर नहीं बढ़ बिन घबराए
डर के आगे जीत मिलेगी
ढाल अडिग पौरुष बन जाए
ण अखण्ड है महिमामण्डित
यह तो अविभाजित रहता है
हर अक्षर कुछ तो कहता है

तन से हो सेवा जन जन की
थकना सदा हार है मन की
दर्पण सा जीवन हो मुखरित
धर्मशील गति हो जीवन की
नत मत होना,नमन करो तुम
नमन सदा निश्छल रहता है
हर अक्षर कुछ तो कहता है

पत्थर तुम तोड़ो हर भ्रम का
फल शुभ मिलता अटल नियम का
बच्चे जैसा तन हो मन हो
भस्म करो तुम दर्प अहम का
म पावन मणि रामनाम की
म ही ओम अहद रहता है
हर अक्षर कुछ तो कहता है

यक्ष प्रश्न का समाधान तुम
रथ पर हो अर्जुन समान तुम
लक्ष्य साधना ही अब होगा
वश में कर लो मन वितान तुम
शरशैय्या से इस जीवन में
ष मूर्धन्य बना रहता है
हर अक्षर कुछ तो कहता है

सत्य आचरण हो उर संचित
हर क्षण प्रभु को रहे समर्पित
क्षय हों पाप सुखद हो जीवन
त्रय तापों से मुक्ति सुनिश्चित
ज्ञान प्रदान करे हर अक्षर
फिर तू भी क्यों चुप रहता है
हर अक्षर कुछ तो कहता है

हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो

मार्ग के अवरोध से तुम क्यों दुखित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

सोंचते हो मार्ग में चलते हुए क्या
देखते हो सूर्य को ढलते हुए क्या
क्यों निराशा की निशा से तुम ग्रसित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

खंडहरों के शेष कुछ अवशेष जगते
वृक्ष सूखे मौन से नरवेश लगते
व्यर्थ ही संदेह से होते भ्रमित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

क्यों पुनः निस्तब्धता को गेह करते
तुम तो अपने लक्ष्य से हो स्नेह करते
मेघ तुम आह्लाद के बहते सरित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

आँधियों का शोर कुछ बतला रहा है
तू नहीं कोई कमल कुम्हला रहा है
तुम नहीं हिमपिण्ड जो प्रतिक्षण गलित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

चित्त की शंका अभी है व्यर्थ सारी
है अपरिमित शक्ति चिन्हित जो तुम्हारी
बीज निष्ठा का हृदय में अंकुरित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

लक्ष्य से क्यों दूर होते जा रहे हो
क्यों भटक कर व्यर्थ गोते खा रहे हो
तुम स्वयं ही स्वयं के द्वारा विजित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

मार्ग में बढ़ना सदा है काज तेरा
राह में जो रुक गया होगा अँधेरा
तुम स्वयं विश्वास दीपक से ज्वलित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

देख तेरे पास साहस का पिटारा
धीरता ही वीरता का है इशारा
तुम सदा उस ईश के द्वारा रचित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

ये निशा का आगमन व्यवहारगत है
भास्कर का फिर उदय भी शाश्वत है
फिर विजय भी स्वर्ण अक्षर में लिखित हो
हे पथिक तुम क्यों व्यथित हो क्यों व्यथित हो

नाव बढ़ रही थी सोच रहे थे

नाव बढ़ रही सोच रहे थे
उतरेंगे किस पार किनारे
दो भागों में नदी बँट गई
और हो गए चार किनारे

संयम रखकर ध्यान लगाया
और दूर तक दृष्टि जमाई
उसी दिशा में नाव मोड़ दी
जिधर रोशनी पड़ी दिखाई
पर नदिया बँटती ही जाती
दिखे नए हर बार किनारे

सोचा यही नियति की इच्छा
हम पतवार नहीं छोड़ेंगे
अगर किनारे साथ ना देंगे
हम भी नाव नहीं मोड़ेंगे
अब धारा से प्यार हो गया
नहीं हमें स्वीकार किनारे

हुई अंत में विजय हमारी
गए युद्ध में हार किनारे
हवा ले गयी साथ,मिले फिर
स्वागत में तैयार किनारे
आँखें चमकी दिखी सामने
मूंगे की दीवार किनारे

जी ले अपना आज बावरे

जी ले अपना आज बावरे,तू कल की मत सोच।

तू साहस के पंख लगा अपनी हिम्मत को तोल
बिना बात के पीट न अपनी कमजोरी के ढोल
देख न अपने पग के छाले,तन पर पड़ी खरोंच

प्रभु ने ही खींची हाथों में सुख की दुख की रेखा
निज कर्मों से लिखा मनुज ने स्वयं भाग्य का लेखा
उस साईं से मांग सभी कुछ तनिक न कर संकोच

वो सबका पालनहारा है वो खाने को देगा
तू जब प्यासा होगा वो बादल बनकर बरसेगा
दाना लेकर चिड़िया आई,बच्चे खोले चोंच

गुमनाम बंजारे

नैन में हैं अश्रु गीले
राह में काँटे नुकीले
पांव में हैं जख़्म गहरे
छांव पाकर भी न ठहरे
लादकर काँधे पे अपने दर्द दुख सारे

चल पड़े अपनी डगर गुमनाम बंजारे।

दोष सारे सिर चढ़ाकर
भार चिन्ता का उठाकर
ओढ़कर अवसाद तन पर
वेदना के वसन मन पर
देह है जर्जर भटकते हैं थके हारे
चल पड़े अपनी डगर गुमनाम बंजारे।

होंठ पर ताले लगाकर
दाँत में उंगली दबाकर
पत्थरों से चोट खाये
घाव पर माटी लगाये
पार करके संकटों के सिंधु सब खारे
चल पड़े अपनी डगर गुमनाम बंजारे।

पीर को उर में सम्हाले
विघ्न के उपवीत डाले
लेपकर दुर्भाग्य चन्दन
चूमकर हर एक बन्धन
देखते हैं आसमां के टूटते तारे
चल पड़े अपनी डगर गुमनाम बंजारे।

मैं भी चटका टूटा बिखरा थोड़ा थोड़ा

मैं भी चटका टूटा बिखरा थोड़ा थोड़ा।
जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

किर्च किर्च चुभ गयी कलेजे भीतर जाकर
आँसू एक न आया जख़्म अनोखा पाकर
धीरे धीरे दर्द बना नासूरी फोड़ा
जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

बिखरे दर्पण को समेट कर फेंका जैसे
कहाँ गया मैं किधर गया मैं खोजूँ कैसे
ढूँढ रहा था पानी पर मैं उसे निगोड़ा
जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

इस तलाश में हाथ लगी केवल तन्हाई
मिली मुझे माशूका वो मेरी परछाई
दोनों थे तनहा दोनों ने नाता जोड़ा
जब मैंने अपने हाथों से दर्पण तोड़ा।

फिर खुद से संवाद हुआ है

बहुत दिनों के बाद हुआ है
फिर खुद से संवाद हुआ है
फिर से ज्ञात हुआ यह जीवन
प्रभु से मिला प्रसाद हुआ है

मानस के पावन पुष्कर में
भक्ति भाव के कमल खिले हैं
फिर मीरा है हुई दिवानी
सूरा को घनश्याम मिले हैं
ध्रुव ने की है कहीं तपस्या
मन मेरा प्रहलाद हुआ है
फिर खुद से संवाद हुआ है….

कहीं कबीरा ने फिर गायी
जीवन दर्शन की शुभ साखी
घाट घाट पर किया आचमन
रहा न कोई पनघट बाकी
अब जीवन है शान्ति निकेतन
भीतर अनहद नाद हुआ है
फिर खुद से संवाद हुआ है…..

हर कोलाहल शान्त किया है
झंझावातों से टकराया
मोहभंग होने पर फिर से
अर्जुन ने गाण्डीव उठाया
गीता ज्ञान दिया कान्हा ने
मेरा दूर विषाद हुआ है
फिर खुद से संवाद हुआ है

खोज रहे थे हम सारी खुशियां जग में

खोज रहे थे हम सारी खुशियां जग में
लेकिन असली मस्ती थी मन के भीतर
सारी उम्र गुजारी खोज नहीं पाए
इस दुनिया के मानचित्र में अपना घर

ग्लोब सरीखी इस दुनिया में भटके हम
गोल घूमकर कितने चक्कर खाए थे
कितने रस्ते नापे कहीं नहीं पहुंचे
जहां खड़े थे वही लौटकर आए थे
पर्वत जंगल मैदानों में घूम लिए
मिला न हमको अपने मन का गांव शहर

जब-जब रहे सफर में आशावादी थे
बांध रहे थे हम मंजिल के मंसूबे
नदी चुनी जो भी हमने उसको खेकर
सदा अंत में सागर में जाकर डूबे
सभी दिशाओं में जल ही जल था लेकिन
प्यासा कंठ रहा ये सूखे रहे अधर

सपनों का आकाश चूमने की खातिर
उम्मीदों के हमने पंख लगाए थे
भरी उड़ाने जब मन के संपाती ने
सूरज ने तब उसके पंख जलाए थे
उड़ते उड़ते मानो मन की चिड़िया ने
काट लिए अपने हाथों से अपने पर

कवि जब भी कविता लिखता है

कवि जब भी कविता लिखता है
शरणागत हो जाता है

शब्द चयन करता है मानो
मानस का परायण करता
भरता भाव हृदय के मानो
शालिग्राम पर तुलसी धरता
अक्षर अक्षर लिखता मानो
माला जपता राम नाम की
पंक्ति पंक्ति पर कर लेता है
मानो यात्रा चार धाम की
किसी क्रौंच के शर लगने पर
वो आहत हो जाता है

जब कविता में पीर उपजती
तब तब वेणु बजा लेता है
कहीं प्रेम को पाकर अपने
उर का कक्ष सजा लेता है
जब उत्साह चरम पर होता
तब तब शंख उठा लेता है
और भक्ति में व्याकुल होकर
वो माधव को पा लेता है
पुनः साध्य को पाने के हित
अध्ययनरत हो जाता है

धाराप्रवाह मेरी गति है बड़ी सुहानी

धाराप्रवाह मेरी, गति है बड़ी सुहानी
आओ जरा सुनाऊँ, अपनी तुम्हें कहानी।

हूं नाज से पली मैं, उर्दू हमारा गहना
कन्नड़ तमिल मराठी, सारी हैं मे’री बहना
ब्रह्मा मेरे पिता हैं, माता है देववाणी
आओ जरा सुनाऊँ, अपनी तुम्हें कहानी।।

ब्रज में कहीं अवध में, बचपन है मे’रा बीता
काशी में गंगातट पर, जाकर हुई पुनीता
बंगाल में बनी हूँ, कवियों की मैं निशानी
आओ जरा सुनाऊँ, अपनी तुम्हें कहानी।।

तुलसी कबीर सूरा, दादू रसिक बिहारी
ग़ालिब औ मीर मोमिन, मेरे बने पुजारी
कान्हा के गीत गाकर, मीरा हुई दिवानी
आओ जरा सुनाऊँ,अपनी तुम्हें कहानी।

कवियों की लेखकों की, मैं ही कहाऊं माता
साहित्य प्रेमियों से, मेरा अटूट नाता
इन पर कृपा बिखेरो, हे मातु वीणापाणी।
आओ जरा सुनाऊँ,अपनी तुम्हें कहानी।।

अंग्रेजियत का अब है, हर ओर बोलबाला
बेटों ने आज मेरे, घर से मुझे निकाला
यूँ ही भटक रही हूँ, आँखों में भर के पानी
आओ जरा सुनाऊँ,अपनी तुम्हें कहानी।।

मैं राम की हूँ सरजू, कृष्णा की हूँ कालिन्दी
भारत के भाल पर मैं, बनकर सजी हूँ बिंदी
है नाम मे’रा हिन्दी, है हिन्द राजधानी
आओ जरा सुनाऊँ,अपनी तुम्हें कहानी।।

ये भारत की है वसुंधरा

ऋषि मुनियों की है तपस्थली, जिस माटी में बलिदान भरा।
ये भारत की है वसुंधरा, ये भारत की है वसुंधरा।
सर पर है केसरिया चूनर, जिसके आँचल का रंग हरा।
ये भारत की है वसुंधरा, ये भारत की है वसुंधरा।
जन गण मन जिसका राष्ट्रगान, ध्वज जिसका अमर तिरंगा है।
हैं अचल खड़े वटवृक्ष जहाँ, नदियों की रानी गंगा है।
जल थल नभ की हैं सेनाएँ, जिनसे है दुश्मन डरा डरा।
ये भारत की है वसुंधरा…
वन उपवन करते नृत्य मोर, हैं बाघ जहाँ विचरण करते।
पोखर में खिलते कमल जहाँ, तरु हैं रसाल अर्पण करते।
हिंदी भाषा कि छवि न्यारी, अक्षर-अक्षर पीयूष झरा।
ये भारत की है वसुंधरा…
दो अक्टूबर पंद्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी आई है।
जी भर के खाओ’ जलेबी सब, ये तो राष्ट्रीय मिठाई है।
पंचांग हमारा शक संवत, वह राष्ट्रपत्र है श्वेत खरा।
ये भारत की है वसुंधरा…
स्तम्भ अशोक सिंहों वाला, हम सत्यमेव जयते कहते।
हैं धर्म हमारे भले अलग, मन से हम भारतीय रहते।
है अजर अमर भारत गाथा, है देव तुल्य जो वीर मरा।
ये भारत की है वसुंधरा…
रुपया जिसकी अनुपम मुद्रा, तो खेल हमारा हॉकी है।
वन्देमातरम राष्ट्रगीत, सेवा में तत्पर खाकी है।
भारत माता कि जय वाला, मिलकर बोलो उद्घोष जरा।
ये भारत की है वसुंधरा…

नैन तुम्हारे विनय पत्रिका

नैन तुम्हारे विनय पत्रिका

इनकी चितवन इंद्रधनुष सी
जैसे धूप छिपी बादल में
जब पलकें झुकतीं लगता है
फूल गिराज़ हो गंगाजल में
इन नैनों के दर्शन पाने
राघव पहुंचे पुष्प वाटिका

इन नैनों के लिए प्रेमवश
कान्हा भटके गली गली को
जब जब इनमें काजल आंजा
कान्हा भूल गए मुरली को
इन नैनों के लिए सजी है
वृंदावन की कुंज वीथिका

इन नैनों पर कालिदास ने
शाकुंतल के श्लोक कहे थे
फिर कुमारसंभव रच डाला
भीतर भीतर बहक रहे थे
और अंत में पावन होकर
रघुवंशम की लिखी भूमिका

ये नैना वृषभानु लली के
ये नैना हैं शकुंतला के
ये नैना उर्मिला सती के
ये नैना हैं यशोधरा के
इन नैनों में एक विरहणी
जिसके सपने हुए मृत्तिका

 

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