राजकुमारी रश्मि की रचनाएँ

दुर्दिन में अब हरखू कैसे

दुर्दिन में अब हरखू कैसे,
घर का पेट भरे.

(१)
ऐसा सूखा पड़ा, धान की फसल
हुई बरबाद.
उपर वाले ने भी अब की, नहीं सुनी
फ़रियाद.
भूखे प्यासे रह कर घर के
दोनों बैल मरे.

(२)
गश्त लगाती पूरे घर में
अब भूखी छिपकलियाँ.
राह देखती हैं बच्चों की
सूनी-सूनी गलियाँ.
घुन भी लगने लगा, बीज में
घर में धरे-धरे.

(३)
जितनी रकम उठाई
उसका दूना ब्याज दिया.
दूध पिलाया बच्ची को
खुद पानी नहीं पिया.
साहूकार रोज धमकाये
मांगे नोट खरे.

रातरानी कहो या कहो चाँदनी

रातरानी कहो या कहो चाँदनी
शीश से पाँव तक गीत ही गीत हूँ.
बांसुरी की तरह ही पुकारो मुझे
एक पागल ह्रदय की विकल प्रीत हूँ.

वन्दना के स्वरों से सजा लो मुझे
मैं पिघलती हुई टूटती सांस हूँ.
युगों युगों से बसी है किसी नेह सी
मैं तुम्हारे नयन की वही प्यास हूँ.

तुम किसी तौर पर ही निभा लो मुझे
तो लगेगा तुम्हें जीत ही जीत हूँ.

एक आकुल प्रतीक्षा किसी फूल की
हाथ पकड़े पवन को बुलाती रही
शाख सूरज किरन चम्पई रंग से
एड़ियों पर महावर लगाती रही

प्राण जिसको सहेजे हुए आजतक
लोक व्यवहार की अनकही रीत हूँ.

दुःख इतना गहराया मन में(गीत)

दुःख इतना गहराया मन में
पलकों मेघ झरे.

(१)
गगन भेदती हूक
पालथी मारे बैठ गयी
पीड़ा पथरा कर अंतर के
तल में पैंठ गयी
उडते हुए पखेरू के हैं,
दोनों पर कतरे.

(२)
जाने कहाँ छिपी बैठी थी
कोई चिंगारी
अब तो इस की लपट हुई है
प्राणों पर भारी
फिर से होने लगे ह्रदय के
सूखे घाव हरे.

(३)
मन के सात समंदर सूखे
दरक गयी धरती
लहराती नदियों ने छोड़ी
कोसों तक परती
मानसरोवर वाला अब यह
हँस कहाँ उतरे ?

पत्र लिखा किसने गुमनाम

पत्र लिखा किसने गुमनाम,
छोड़ दिया हाशिया तमाम.

टेढ़े-मेढ़े अक्षर उलझी आकृतियाँ
जिनसे हैं गूँज रहीं अनगिन प्रतिध्वनियाँ
दूर एक कोने में लिखा है प्रणाम.

स्याही को काग़ज़ पर ऐसे है बिखराया
बादलों के घेरे से कूदता हिरन आया
गमले में अँकुराया नन्हा-सा पाम.

जैसे ही किरणों का बढ़ा एक पाँव
देहरी से पहले ही ठिठक गई छाँव
एक साथ मिलीं सुबह-दोपहरी-शाम.

सुधियों के दंश कभी हल्के कभी गहरे
अंग-अंग मुरकी ले पोर-पोर लहरे
भावनायें काँप रहीं होकर उद्दाम.

थका हुआ बालक दे कंकड़िया फेंक
ऐसे ही बिखर गये प्रश्न भी अनेक
धुँधलाई दृष्टि, जहाँ लगा था विराम.

बीड़ी फूँक फूँक(गीत)

बीड़ी फूँक फूँक
दिन अपने
काटे, राम भजन.

(१)
तीन माह से मिल वालों से
वेतन नहीं मिला
कितने घर ऐसे हैं, जिनमें
चूल्हा नहीं जला
आश्वासन की बूंदे कब तक
चाटे राम भजन.

(२)
‘काम बन्द’ की तख्ती टाँगे
रोज हुई हडतालें
उस पर बढती महंगाई ने
पतली कर दी दालें
चढ़े हुए कर्जे को
कैसे पाटे राम भजन.

(३)
लीडर की बातों मे आकर
मारी पैर कुल्हाड़ी
कई कई दिन, उसे कहीं भी
मिलती नहीं दिहाड़ी
दारू भी तो नहीं
कहाँ दुःख बाँटे राम भजन.

मौसम देने लगा सभी को(गीत)

मौसम देने लगा सभी को,
सर्दी का पैगाम.
लगी सिकुड़ने धीरे धीरे,
सुबह, दोपहरी, शाम.

(१)
हल्के हुए धूप के तेवर,
लहर शीत की दौड़ी.
हारा हुआ जुआरी जैसे,
फेंके अपनी कौड़ी.
सूरज भी अपने अश्वों की,
कसने लगा लगाम.

(२)
सिमटी बैठी हैं चौपालें,
चुप साधे चौबारे.
दूर दूर झीलों पर फैले,
बजरे खड़े किनारे.
जल में सीपी, शंख रेत में,
सब करते आराम.

(३)
सभी तरफ पसरा सन्नाटा,
बिछी धुंध की चादर.
आमंत्रण पाकर अलाव का,
जुड़ने लगे बिरादर.
लगे खोलने गांठे मन की
कर के दुआ सलाम.

पावस आते ही बूंदों ने

पावस आते ही बूंदों ने
फिर पायल छनकाई,
मत पूंछो फिर इस मौसम ने
क्या -क्या की चतुराई.

(१)
दादुर, मोर, पपीहा सब ने
अनुपम चाँद गढ़े,
चातक, शुक, मैना सबने ही
मीठे गीत पढ़े.

काली कोयल की कुहकन से,
महक उठी अमराई.

(२)
कजरारे बादल समूह में
भू पर उतर गये,
पूरी बसुधा के आँचल में
मोती बिखर गये.

मुरझाई नदियाँ उठ बैठी,
लेकर फिर अँगड़ाई.

(३)
मृदु किसलय, कोमल लतिकाएँ
तृण-तृण मुदित हुए,
धरती धानी चूनर ओढे
बजा रही बिछुए.

वन उपवन सब ने मिल जुलकर
बिरदावली सुनाई.

 

सूखे में भी बाँस वनों के

सूखे में भी बाँस वनों के,
चेहरे रहे हरे.

(१)
टाटा करती दूर हो गयी,
खेतों से हरियाली.
सिर पर हाथ धरे बैठे हैं,
घर में लोटा थाली.
चकला, बेलन और रसोई,
आंसू रहे भरे.

(२)
सूखा कुआँ बंधे कैदी सा,
गुमसुम पड़ा रहा.
सूरज हन्टर लेकर उसके,
सिर पर खड़ा रहा.
पपड़ाये होठों के सपने
मन में रहे धरे

(३)
डरे हुए पंछी सी आंखें,
नभ को ताक़ रही .
पकडे फूँस खिसकती मेढे,
बगलें झाँक रही.
चरवाहे चौपाए दोनों,
जपते हरे – हरे.

निगल रही है अब यह पीढ़ी

निगल रही है अब यह पीढ़ी,
खुशियाँ, सारा प्यार.

(१)
नागफनी जीभों पर रोपी
मन में उगे बबूल.
भाषा भाव विचार आचरण
सभी है प्रतिकूल.

इनके इतिहासों में होगा
केवल हाहाकार.

(२)
सपने इनके उड़ते रहते,
हरदम पर फैलाए.
उंच नीच की बात कभी भी,
इनकी समझ न आये.

रहते हैं प्रतिबद्ध सदा ही,
करने को प्रतिकार.

(३)
जाने कैसा दौर आज का
वस्त्र हो रहे झीने.
लाज और मर्यादा दोनों,
इस फैशन ने छीने.

चमक दमक में उलझ,
घरों को बना दिया बाज़ार.

 

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