राजकुमार ‘रंजन’की रचनाएँ

संघर्षों में जो जीते हैं

संघर्षों में जो जीते हैं
उनका मूल्य अधिक होता है
घर में बैठ चुहलबाजी से
जीवन नहीं जिया करता है

कठिन परिश्रम करने वाले
नहीं देखते मुड़ कर पीछे
भाग्य भरोसे रहने वाले
निशि-दिन रहते आँखें मीचे

लिखते स्वयं भाग्य की रेखा
कर्म-कुदाल चलाने वाले
कर्महीन शोसेबाजी से
जीवन नहीं जिया करता है

कठिन दौर से जो लड़ते हैं
विपदाओं से कभी न हारे
उनकी धैर्य परीक्षा लेता
रहे टाँकता भाग्य सितारे

श्रम-सीकर के गंगा जल से
देही पुण्य भूमि हो जाती
किन्तु समय की बर्वादी से
जीवन नहीं जिया करता है

जो अपनों को आहत करते
वे हारे हैं स्वयं लड़ाई
जिसमें अंह भाव जिन्दा है
उसने शून्य सफलता पाई

जो होता सक्रिय समाज में
वह जन सर्वमान्य कहलाता
केवल कोरी गुटबाजी से
जीवन नहीं जिया करता है

अब भी समय शेष है प्यारे!
लिख ले अपनी राम कहानी
कोई ठहरा नहीं जगत में
यह दुनिया है आनी जानी

विषवाणों की नहीं कामना
अमृतत्व का कुंड बसा ले
क्रोध,कर्कशा,नाराज़ी से
जीवन नहीं जिया करता है

खुलने दो वातायन

डोल रहे प्रश्नों को तार तार होने दो
खुलने दो वातायन दृष्टि पार होने दो

मूर्तमंत चेहरों पर स्वप्न-ध्वंस आ बैठा
जाग्रत संवादों को सुप्तवंश खा बैठा
प्राकृत संस्कारों का धुँआ धुँआ हो जाना
सबके आधिकारों पर कंशवंश छा बैठा
फिर से षडयत्रों को जारजार रोने दो

यह अबूझ अंतर है तेरे में मेरे में
होता संवाद नहीं साँझ औ सबेरे में
चेहरों के पीछे भी चेहरों का आना है
आकृति है परछाई अनुकृतियाँ घेरे में
विजयी अभियानों की अब न हार होने दो

मंगल मंसूबो को मत अपूर्ण होने दो
षड़यन्त्री कालखंड चूर्ण चूर्ण होने दो
नव विकास के र्पाहए होकर समवेत चलें
आहुतिक्रम बंद न हो यज्ञ पूर्ण हेाने दो
आत्मानंद जीवन में फिर अपार होने दो
खुलने दो वातायन दृष्टि पार होने दो

रुहानी रिश्ते /

अपने ही अपनों से रूठने लगे
रूहानी रिश्ते अब टूटने लगे

अब न रहे वंशी वट कुंजों की छाँव नहीं
अब न रहे पनघट तट गोकुल से गाँव नहीं
अब न रहे वृन्दा -वन गोधूली शाम नहीं
खो गया करीला वन महुआ औ आम नहीं
देशी पारिधान सभी छूटने लगे

व्यस्त है नई पीढ़ी मोबाइल पाने में
सब नसीहतें छूटीं इस नए ज़माने में
एम बी ए,इंजीनियर,डाक्टर का मस्तक है
संवेदनहीन हुये चेहरों की दस्तक है
बात के बतासे अब फूटने लगे

अपना परिवार कहाँ अपनों से प्यार कहाँ ?
जो नसीहतें देता जीवन का सार कहाँ ?
निर्णय अनचाहे हैं पेट भर अघाए हैं
हो जाते चारधाम क्षण बहुत गँवाए हैं
अपने ही अपनों को लूटने लगे

दर्द बहुत ताजा हैं वक्त का तक़ाजा है
आह जो अभी निकली वह न बजा बाजा है
उर में जो घाव लगे उनको जतलाना मत
दर्द भरे गीतों को मंचों से गाना मत
कड़वी सच्चाई हम घूँटने लगे

भोर की आहट है /

चि’ड़़ियों की चींचीं चूँचू चिल्लाहट है
जग जIएँ अब चलो भोर की आहट है

नभ के माथे सूरज की रेखाएँ हैं
सुमनों की स्वागत को उठीं भुजाएं हैं
मलय पवन भी अभिनन्दन को आतुर है
दिनकर से सारे जग को आशाएँ हैं
ठिठुरा जीवन उसमें भी गरमाहट है

जब भी आता भोर नई जागृति लाता
आम्रवनों का बौर नई संस्कृति लाता
जंगल की नीरवता भी अब टूटी है
वनराजों का घोर नई झंकृति लाता
दिशा दिशा की अब टूटी सन्नाहट है

सड़कों पर भी चहल पहल की बारी है
घर-आँगन में गूंज उठी किलकारी है
योगक्षेम भी पूछ रहे बूढ़े बाबा
पहलवान चच्चा ने मूँछ सँवारी है
गाँव गाँव में नगर डगर सरसाहट है

रमुआ! धनुआ! उठो उठो अब भोर हुआ
सूरज निकला जगो जगो! का शोर हुआ
गाय रँभाती जाती अपने खूँटे पर
चारा चरने को आतुर हर ढोर हुआ
प्रकृति नटी में यह कैसी अकुलाहट है

अभी अभी तो सरस हुई सरसों पीली
अभी अभी श्वेताभ हुई तितली नीली
ओसों की बूँदों में स्वर्णिम आभा है
जाग उठी सुमनावलियाँ ढ़ीली ढीली
दिक्-दिगंत में घुली घुली फगुनाहट है

साँस -उसाँसे अभी हुई ताजा ताजा
रगों रगों में अभी लगा बजने बाजा
अभी अभी आया पूरब से स्वर्णिम रथ
बैठा जिस पर सप्तरंग भास्कर राजा
जग में फैली उजियाली झन्नाहट है
जग जाएँ अब चलो भोर की आहट है

मृदु लय लाओ

अपने स्वर में मृदु लय लाओ

सबसे सहज मौन रहना है
रोज रोज भी क्या कहना है
जिस पर हो प्रतिवाद नित्य ही
उसको सुन कर भी सहना है
भाईचारा नष्ट करें उन शब्दों को बिसराओ

अब तो मन की गाँठे खोलो
कुंठाओं से विस्मृत हो लो
कब होगा परिवर्तन प्यारे!
बोलो प्यारे! कुछ तो बोलो!
अंधकार की बस्ती में कुछ तो प्रकाश बिखराओ

दर्द तुम्हारा भी मेरा हो
नहीं सिर्फ अपना घेरा हो
जो इतिहास टीस देता हो
उसका हे मन !मत चेरा हो
तुम समवेत स्वरों में मिल कर गीत प्रेम के गाओ
कही अगर कर्कशता है तो उसको दूर भगाओ

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