राजुला शाह की रचनाएँ

विस्मृति

बूँद की बड़ी-सी परछाईं
उस छाया में चिपके तिनके आर-पार
लड़खड़ाता भूरा दरवाजा
रुक गया सिरे पर
भूरे तने वाले
बरसते छाते से
कुछ लोग
तन गये
यहाँ वहाँ
लड़खड़ाते
उस दरवाजे के आसपास
बूँद पर फिसले
सँभले छाया पर
और टिक गये
मन ही मन………

संसार के सिरे पर

दिनों से मन में अनकही बातों का सुख था,
उलझन शब्दों के साथ थी
शब्द झूठे हों न हों, झूठे लगते

रेखाएँ, रंग, घिस्से और धब्बे भी कहते-पर वे जो कहते
तय अर्थों में बँधा न होता
हाँ को ना भी समझ सकते
और स्वप्न में दु:स्वप्न का आभास हो सकता
चूँकि वो ‘कुछ’ न होता जब तक आप उसे मान न लेते,
ढूँढ़ न लेते उसमें कुछ
दरवाजा खिड़की समझ कर खोल देते और हवा की जगह
हाथी चला आता

अनुभूति ये पकड़ से बाहर है,
नाम देने के लिए ही सही-एक अजीब अधूरापन
जब रंगों के बीच बैठो, तो एक बेचैनी, जो लगता है
बाहर निकलेगी,
पर या तो निकलती नहीं,
या निकल कर भी सुलझती नहीं, यूँ
अमूर्त भाव जो अमूर्त रूप ही लेता है
कभी छूता है, सुनाई देता है, कभी कुछ दीख भी पड़ता है
और
कभी पलट कर देखो तो छूट भी जाता है
ढूँढ़ा नहीं जाता उसे, वो मिल जाता है
कभी रंगीन पानी से भरे कटोरे में हिलते तिनकों की छाया में,
कभी किसी उजास रात में
अर्थ और तर्क से नहीं मिलता
वैसे भी नहीं मिलता
जो छूटता है उसे छूट जाने दो
ढीला छोड़ो
भूलो भी
कुछ याद पड़ता है,
धुँधला होता-सा..पकड़ो…
यह तो पहले भी कभी घट चुका है
ठीक इसी तरह,
पहले भी कहीं
यहीं
नहीं, यह जो धुएँ के धागे-सा उड़ रहा है उसे पकड़ना मुश्किल है,
उसे तैरने दो

बनारस कब का पीछे छोड़ दिया
बनारस लेकिन पीछा नहीं छोड़ता…
रेल के सीखचों के पार भी बनारस ही दिखता आया
साथ चल रहा है तभी से…
नीला अँधेरा, रात की नदी में दिये-सा बनारस
मन्दिरों की गूँज निकट से, दूर से
बनारस में डूबे, अपने में डूबे लोग
जीवन से भरे और उससे खाली-एक साथ ही
शायद बनारस में वही लोग हैं जो सदियाँ हुई इस संसार में आये थे
जीवन से जुड़े, पीपल पात से-अब टूटा, तब टूटा,
पर जुड़ा रहता
संसार से अनुरक्ति न सही, विरक्ति भी क्योंकर हो ?
संसार से वैराग्य भी संसार में ही न हो !
भले ही संसार के सिरे पर
संसार के इस फैले झमेले के सिरे पर-बनारस
गंगा के किनारे किनारे, बिना बीच के, ओर-छोर वाला एक शहर
जिससे सबके पास नदी है,
गति है
बनारस के लिए गंगा की गति काफी है
पैदल और रिक्शे को भी कहीं जाने की हड़बड़ी नहीं
प्रवाह तो है जीवन में-भगदड़ नहीं।
चारों तरफ इतना जीवन…इतना विराट रूप जीवन
कि ‘कहीं नहीं है मरना’

उन्होंने अवधूत को विष के लिए याद किया।
वे चले आये
नीलकण्ठ जो कहलाना था
किसी को ना न कर पाते
हरएक के लिए खुले, मुक्त-हस्त दाता, थोड़े में रीझते-आशुतोष
उनका शहर इससे अलग फिर क्या होगा !
जितना गहरा, उतना ही पारदर्शी।
सरल-सा गूढ़….कुछ नीला अँधेरा।

दीवाली की रात में दिये-सा बनारस।
गाढ़े रंगों में यहाँ वहाँ से झाँकता रोशन पीला,
पलक झपकते बनारस।
कहीं भी आते जाते, डूबते उतराते,
झपक में बनारस दिख कर बिला जाता।
छूट गया है पीछे ओनों कोनों में कुछ।
जैसे आत्मीय कोई, जिससे दिनों दिन मिलना न हो,
पर इत्मीनान कि बदल कर भी आखिर कितना बदलेगा
आँवले का स्वाद !
विश्वास दिलाता शहर कि वह अपनी अद्भुत गति में
स्थिर बहता रहेगा, रहता रहेगा
वैसा ही मिलेगा, जब भी लौटना हो,
‘भले ही बरस-दिन अनगिन युगों के बाद’

इतने गहरे धँसा बनारस
कि सामने उभरते हर बिम्ब में झाँक जाता।
रेल की खिड़की के पार,
कटोरे के गहरे गोल में,
समुद्र वाले शहर की रात में,
बन्द दरवाजे के इस तरफ छतरियों के नीचे कहीं,
बूँद की छाया में,
सदियों से चिपके उस भूरे गीले पत्ते में,
सुख में, दु:ख में, और उसके आर-पार बिंधे जीवन में।
किसी भी ठाँव में, भाव में,
बनारस के रंग, चहुँ ओर…
नीला अँधेरा, रात की नदी और दिये-सा बनारस।

रंग, रेखाएँ और घिस्से उसे जान-बूझ कर नहीं खींचते,
तिर आता है अपने आप सतह पर-टुकड़ों में बनारस।
बूँद की विशाल छाया में हिलते तिनके
या सदियों से भीगा भूरा पत्ता ?

बनारस से पहले भी था जीवन,
बनारस के बाद भी,
बस बनारस साथ है।
स्थिर अचल की याद साथ है,
सुख है गति में।

इस जनम में

अचरज हो तुम
एक दु:स्वप्न से जग
कमरे में
अलस्सुबह
परदे उड़ाते आती
हवा-सा अचरज।
इसके आगे मगर
मुझे कुछ याद नहीं

जगता हूँ तो स्वप्न भुला जाता है
सोता हूँ तो यह संसार
जाने कहाँ बिला जाता है
कभी यही भूल जाता हूँ
कि जागा हूँ या सो रहा

फिर भी
इस जनम में
तुमसे ही
बाकी सब
अपनी जगह पर है
इसलिए
मैं कहीं भी रहूँ
तुम यहीं रहना
मैं कुछ भी कहूँ
तुम यही कहना
मैं हूँ
मैं रहूँगी।

एक बार

बह जाने देना
उड़ जाने देना
अपने आप को
एक बार
तुम भी।

गुब्बारे-सा
हवा के बुलबुले-सा
हल्का होगा तुम्हारा मन
और कहीं भी जा सकेगा
बिला रोक-टोक
फिर-
प्रेम से इन्तज़ार में
इन्तज़ार से
मौन में
मौन से
निपट शून्य में
और तुम्हें लगेगा,
सबसे ताकतवर हो तुम
ऊपर और ऊपर
और ऊपर
उठते हुए….

अथक

अपने को बिना सुने
ना जाने कब से
बोल रही थी
मैं
जब देखा
तुम चुप हो।
जाने कब से
मैं बोल रही थी
और तुम चुप थे।
उस क्षण
तमाम शब्द
चुक कर
खिड़की के बाहर
कच्ची सड़क पर
बजरी से बिछ गये

बाहर
रोड रोलर के शोर में,
भीतर
तुम्हारा अनकहा
गड़गड़ाने लगा।

यह मैं

किसकी खोज
जो मिलता नहीं
कौन है जो
दिखता नहीं
कैसी आशा
कि घेरे बार-बार
ऐसी
निराशा
क्यों ये बेचैनी
कि है किस चैन की तलाश ?
कहाँ वह प्रकाश
जिसका अभाव
यह अँधेरा
किससे करो शिकवा जब
नहीं कोई दूसरा
सिवा इकलौते
इस मैं के
…..और
यह मैं कौन ?

यात्रा

बोझिल
निंदियाती बस में
दीखा
उसे
अपना घर।

पास बैठी स्त्री
की उनींदी आँख
में
पलक झपकता
प्यार
और एक
नन्हीं आँख
में तिरती आती
नींद !

इस शहर में

एक गलत समय
और कितना गलत होगा अब
कोई सवाल सही नहीं इस समय
अपेक्षाएँ सभी गलत
दोस्त से दोस्ती की,
अपनों से प्रेम की,
सपने भी सब गलत
समय यह शिकायत के लिए
सिरे से गलत।
किसकी शिकायत किससे;
एक अप्रिय सच,
एक अवांछित चुप्पी,
गलत होगा बोलना
कुछ भी इस शहर में
जहाँ बातें होती हों इशारों में
आवाज काफी होगी तुम्हारी ताली की
एक हाथ से न बजती हो तो
दो हाथों से बजा सकते हो
बेशक वह अब भी सुनी जाती है
इस शहर में-
जहाँ बहुत अमन है
बहुत चैन है।

प्रेम उड़ 

तुम
रात भर बोलते रहे
उसके बारे में
-प्रेम के।
कमरे में
बाकी सब सो गये थे।
मुझे राजदार बना
न जाने क्यों
अँधेरे में
तुम बोलते रहे
लगातार।
कभी-कभी
गड़बड़ा गयी मैं
हम दोनों में कौन बोला
बात तुम्हारी थी
तुम जो घनघोर प्रेम में थे
यूँ कहीं
सबकी थी
मेरी भी।
तुमने पूछा
प्रेम ने क्यों
आखिरी बूँद भी
निचोड़ ली थी
तुमसे
जैसे प्रेम
धोबी हो
रगड़ता
मसलता
पछीटता
और अन्तर
तार पर फड़फड़ाता
क्यों छूट गया था
आँगन में…
मेरी नींद-भर
फड़फडा़ता रहा फिर
रात के आँगन में।

सुबह
खिड़की के पार
रात को दोहराती-
कपड़े समेटती भाभी।

निंदियाती मेरी तर्जनी में
फुसफुसाता
एक पुराना स्वर-
चिड़िया उड़
हाथी उड़
चींटी उड़
कपड़ा उड़
प्रेम उड़…

तभी से

झाड़ के रंग से अलग
कब झरे ये
छत में बिखरे
रंग
भूल पिछला रूप
भूरे को चुना
साथ इनके
हवा के पर
रंग गये
फिर
हवा भूरी हो
फिरे है
तभी से।

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