राजेंद्र ‘मिलन’ की रचनाएँ

सूरज

सुबह-सुबह जब उगता सूरज,
लाल गेंद-सा लगता सूरज।
दोपहरी में थाली जैसा,
चमचम चमका करता सूरज।
लाल टमाटर-सा हो जाता,
शाम ढले जब ढलता सूरज।

बैलगाड़ी

धीमे-धीमे चलती, दो बैलों की गाड़ी,
आगे बढ़ती जाती खट-खट करती गाड़ी।
आगे बैठे चाचा, हाँक रहे हैं गाड़ी,
पीछे बैठा ननकू, देखे जंगल-झाड़ी।

बाबा जी

गलियों में घूमा करते हैं,
दाढ़ी वाले बाबा जी।
इकतारे पर गाते रहते,
जाने क्या-क्या बाबा जी।
माँ जब उनको आटा देती,
शंख बजाते बाबा जी।

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