राजेन्द्र स्वर्णकार की रचनाएँ

मर गए उन पर तो जीना आ गया

जामे – मय आँखों से पीना आ गया
मर गए उन पर तो जीना आ गया

हाथ का पत्थर किनारे रख दिया
तब से जीने का क़रीना आ गया

गर्म मौसम की हवा जब झेल ली
तब से सावन का महीना आ गया

पाँव माँ के छू लिए हो सरनिगूं
हाथ में गोया दफ़ीना आ गया

नाम उसका जब तलातुम में लिया
मेरी जानिब हर सफ़ीना आ गया

मेरे इंसां की बुलंदी देख कर
कुछ पहाड़ों को पसीना आ गया

ज़हब -से अ

इंतज़ार है

लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !
पूरनमासी , तुम्हें सलाम !
रात उजासी , तुम्हें सलाम !!

लाखों सदियां गुज़रीं ; ये आंखें मिलने को तरस गईं  !
कितने तूफ़ां आए ! कितनी घोर घटाएं बरस गईं  !!
लिए मिलन की प्यास – आस ,
करती यह प्यासी तुम्हें सलाम !
पूरनमासी , तुम्हें सलाम !!

बहन तुम्हारी मैं ; फ़िर भी क्यों भेद किया उस दाता ने ?
भला तुम्हारा , बुरा धराया मेरा नाम विमाता ने !!
पीड़ अभागी मेरे मन की ,
लिखे उदासी, तुम्हें सलाम !
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!

सौ सौ बार जुआ खेला, हर दांव में लेकिन हार मिली !
प्यार के बदले नफ़रत, श्रद्धा के बदले तक़रार मिली !!
लील रहा अस्तित्व …शोर, हा !
मौन का यह दु:खमय परिणाम ?
पूरनमासी, तुम्हें सलाम !!

आदम की संतान करे शैतानी ; और मुझ पर इल्ज़ाम ?
ले कर मेरी आड़, ज़माना पाप करे और मैं बदनाम  ?!
मैल पराये पापों का ;
हो देह क्यों मेरी स्याह तमाम ?
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!

बहन ! उजाले में , सच है सब लगे सुहाना और सुंदर !
पर… जब मेरा साथ मिले ; सब झांक सकें घट के अंदर !!
बुरी कहां मैं इतनी ,
जितने लगते हैं मुझ पर इल्ज़ाम ?
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!

कभी ज़माना बदलेगा ; इंसाफ़ मिलेगा तब शायद !
चिर – पीड़ित अपमानित मन को प्यार मिलेगा तब शायद !!
सच और झूठ में फ़र्क़ समझने वाले लेंगे जन्म कभी !
तेरा मेरा , काला गोरा ; मिट जाएंगे भेद सभी !!
इंतज़ार है… कब तुमसे मैं ,
कब मिलती है भोर से शाम ?!
लिक्खा है ख़त आज अमावस ने पूरनमासी के नाम !!

श्आर हैं राजेन्द्र के
लफ़्ज़-लफ़्ज़ में इक नगीना आ गया

दरिया से न समंदर छीन

दरिया से न समंदर छीन
मुझसे मत मेरा घर छीन

क्यों उड़ने की दावत दी
ले तो लिये पहले पर छीन

मंज़िल मैं ख़ुद पा लूंगा
राह न मेरी रहबर छीन

मिल लूंगा उससे , लेकिन
पहले उससे पत्त्थर छीन

देख ! हक़ीक़त बोलेगी
हाथों से मत संगजर छीन

लूट मुझे ; मुझसे मेरा
जैसा है न सुख़नवर छीन

बोल लुटेरे ! ताक़त है ?
मुझसे मेरा मुक़द्दर छीन

मालिक ! नज़र नज़र से अब
ख़ौफ़ भरे सब मंज़र छीन

राजेन्द्र हौवा तो नहीं
लोगों के मन से डर छीन

कहाँ लिख दूँ ,यहाँ लिख दूँ , जहाँ कह दो , वहाँ लिख दूँ

कहाँ लिख दूँ , यहाँ लिख दूँ , जहाँ कह दो , वहाँ लिख दूँ
ख़ुदा लिख दूँ तुम्हें मैं , मालिक -ए- दोनों जहाँ लिख दूँ

इजाज़त हो अगर , तुमको मैं अपना मेहरबां लिख दूँ
तुम्हारा हो रहूं , ख़ुद को तुम्हारा राज़दां लिख दूँ

तबस्सुम को तुम्हारी , मुस्कुराती कह्कशां लिख दूँ
तुम्हारे जिस्म को ख़ुश्बू लुटाता गुलसितां लिख दूँ

अदब से सल्तनत -ए- हुस्न की मलिका तुम्हें लिख दूँ
वफ़ा से ख़ुद को मैं ख़ादिम तुम्हारा पासबां लिख दूँ

तुम्हीं नज़रों में , ख़्वाबों में , ख़यालों में, तसव्वुर में,
मेरे अश्आर , जज़्बों में , तुम्हें रूहे – रवां लिख दूँ

गुलाबों – से मुअत्तर हों, हो जिनकी आब गौहर – सी
कहां से लफ़्ज़ वो लाऊं … तुम्हारी दास्तां लिख दूँ

सुकूं भी मिल रहा लिख कर, परेशानी भी है क़ायम
इशारों में, बज़ाहिर क्या, निहां क्या, क्या अयां लिख दूँ

यूं मैंने लिख दिया है दिल तुम्हारे नाम पहले ही
कहो तो धड़कनें भी… और सांसें , और जां लिख दूँ

मिटा डालूं लुग़त से लफ़्ज़ , जो इंकार जैसे हैं
तुम्हारे हुक़्म की ता’मील में , मैं हाँ ही हाँ लिख दूँ

मैं क़ातिल ख़ुद ही हूं अपना, तुम्हारा पाक है दामन
ये दम निकले, मैं उससे पेशतर अपना बयां लिख दूँ

दुआओं से तुम्हें राजेन्द्र ज़्यादा दे नहीं सकता
यूं कहने को तुम्हारे नाम मैं सारा जहाँ लिख दूँ

किसे पाना मुनासिब है , किसे बेहतर गंवाना है

किसे पाना मुनासिब है , किसे बेहतर गंवाना है
इधर महबूब है ऐ दिल , इधर सारा ज़माना है

जली है शम्मा-ए-उल्फ़त , रोशनी ख़ुद मुस्कुराएगी
सभी तारीक़ियों को शर्तिया जाना ही जाना है

मुझे उसने क़बूला , मैं उसे तस्लीम करता हूं
ये क़ाज़ी कौन होता है, किसे कुछ क्या बताना है

यहां मत ढूंढना मुझको, यहां अब मैं नहीं रहता
यहां रहता मेरा दिलबर, ये दिल उसका ठिकाना है

ज़हर पीना पड़ेगा आप गर सुकरात बनते हो
अगर ईसा बनोगे ख़ुद सलीब अपनी उठाना है

गिले-शिकवों से रंज़िश-बैर से मत यार, भर इसको
ये दिल है या कोई ख़ुर्जी है , कोई बारदाना है

नहीं अपना कोई भी या पराया भी नहीं कोई
चलो राजेन्द्र छोड़ो क्या किसी को आज़माना है

नहीं बिके जो क़लम

नहीं करेगी क्षमा , क़लम की सौ – सौ पुश्तें भी उनको !
कुत्सितजन के चरण धोक कर नाम ज़ियारत देते जो !
वृहद् विशद् दायित्व ; क़लम! मत भय कर, मत कर तू विश्राम,
चलती चल अविराम, स्वयं के रक्त में अपनी देह डुबो !

यहां अनधिकृत अधिकारी बन’ हड़पें पर – अधिकारों को !
महिमामंडित किया जा रहा , मंच – मंच मक्कारों को !
पड़े हुए हैं यहां उपेक्षित, भव्य – दिव्य मंदिर – प्रांगण ;
अर्घ्य – तिलक – सम्मान अंध दुर्गंध भरे गलियारों को !

छ द् मी – छली सियाही का भी अर्थ उजाला कहते हैं !
गुंथे संपोलों नाग बिच्छुओं को मणि माला कहते हैं !
घोर स्वार्थवश महापाप करते कब हिचके निर्लज ये ?
गुजरे – गये अधम ; गंगा को गंदा नाला कहते हैं !

लार टपकते जम बैठे ये , हर चौके हर थाली पर !
नहीं जड़ों में मिलते ये , पर मिलते डाली – डाली पर !
पावन स्वेद की दो बूंदें भी नहीं इन्होंने अर्पित की ;
हक़ जतलाते मिलते ये , सामंत बने हरियाली पर !

ढीठ स्वघोषित शिखरपुरुष ; गलियों – बाज़ारों गुर्राते !
मटमैले मैले मन वाले , दर्पण को भी झुठलाते !
क्षुधा – एषणा – लिप्सा – पीड़ित ; दनुज मनुज से बन बैठे ,
लज्जा होती तनिक  ; डूब’ चुल्लू पानी में मर जाते !

आत्म – प्रशंसक दंभी रहते ताड़ वृक्ष ज्यों तने तने !
घृणित घिनौनों पतितों के मन – मस्तक विष्टा – कीच सने !
सड़ांध – सागर इनके भीतर का देखो , घिन हो जाए,
जग को भरमाते फिरते ये भ्रष्ट – अशिष्ट ; विशिष्ट बने !

ठोस स्वर्ण प्रतिमाएं पस्त – पराजित खोखल पुतलों से !
गुणी गहन गंभीर , प्रताड़ित होते पग – पग छिछलों से !
श्रेष्ठ सृजन कुम्हला’ – मुर्झाए पूर्वाग्रह – झंझाओं में ,
हंस पिट रहे यत्र तत्र , अधिनायकवादी बगुलों से !

लामबंद लंपट लुच्चे ठग कपटी कुटिल कमीने घाघ !
जुगलबंदियां नागों – कागों की ; गूंजित वीभत्सी राग !
झूम रहे हैं गिद्ध – भेड़िये , गलबहियां डाले – डाले ,
बजे दुंदुभी दुराग्रहों की ; चाटुकार मिल’ खेलें फाग !

नहीं बिके जो क़लम ; दोमुंहों – दुष्टों को धिक्कारेगी !
सदा सनातन शिवम् सुंदरम् सत्यम् वह उच्चारेगी !
जीवित निर्भय सत्य ; … जान कर युग होगा आश्वस्त् – प्रसन्न,
एक पांत प्रतिक्रिया में विष भी उगलेगी – फुत्कारेगी  !
क़लम न लेकिन कभी – किसी से कहीं हार स्वीकारेगी !!!

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