राणा प्रताप सिंह की रचनाएँ

नया कोई गीत लें

नया कोई गीत ले
जंग चलो जीत ले

घटती है नम्रता
बढ़ती उद्विग्नता
चुकती शालीनता
मीठा पाया है बहुत
आज चलो तीत ले

कथनी को तोल दे
दूजों को मोल दें
वातायन खोल दे
भीड़ भरी दुनियां में
खोज नया मीत लें

दृश्य ये विहंगम है
कष्टों का संगम है
जग सारा जंगम है
बासंती झोंके तज
आज शिशिर शीत लें

अनगढ़ मन

अनगढ़ मन सपनों की दुनिया
रोज सजाता है
ढोल मंजीरे झांझ पखावज
साज बजाता है

मिलता जब कोई प्यारा सा
अंधियारे में उजियारा सा
उस प्यारे संग पंख पसारे
असमान में हो भिनसारे
उड़ता जाता है

उलझा संबंधों का धागा
रिश्तों पर बैठा हो कागा
संवादों की डोर थामकर
ताना बाना खींच तानकर
सब सुलझाता है

कभी चपल चपला सा चहके
कभी अलस की साँझ में दहके
बह जाता जीवन धारा में
जैसे मांझी नाव नदी में
खेता जाता है

आई है वर्षा ऋतु

आयी है वर्षा ऋतु ये बड़ी सुहानी है
मन-आँगन भर आया स्मृतियों का पानी है

कीचड से सने हाँथ
दादुर की थी जमात
टर टर टर टिप टिप टिप
आवाज़े दिवा रात
पूँछ को हिलाता जो
स्वयं को बचाता वो
भीग रहा शेरू भी
बारिश में मेरे साथ
छप्पर से झरने सा बहता जो पानी है
हाँथ में छड़ी थामे धमकाती नानी है

आँगन में भीग रहा
आम का ताज़ा अचार
बांध रहे चाचा जी
घर की टूटी दिवार
हमको भी दे दो छत
भीग रहे कव से हम
गौशाला में गउवें
करती रहती पुकार
खलिहानों में जब जब भर आता पानी है
दीख रही बाबा की चिंतित पेशानी है

अंचरे में भीग चली
प्रियतम की पाती है
तेल नहीं दिये में
सिर्फ बची बाती है
ऐसे में पुरवाई
मदमाती है आयी
बुझती बाती में जो
लौ सुलगा जाती है
पिछले मौसम की ही बरखा अनजानी है
ना जाने फिर से क्यूँ बरसा ये पानी है

रीत रही है प्रतिपल

रीत रही हैं प्रतिपल अपनी गंगा माई
उनको भी ज्ञान हुआ, मानवता बौराई

शासित और शासक में
आज बड़ी अनबन है
चीर हरण हो रहा
कान्हा तो मधुबन है
नई कोंपलें नम हैं
किन्तु जड़ें बेदम हैं
स्वार्थ के तराजू का
हुआ संतुलन कम है
आज के विचारों में बची नहीं गहराई

मेरुदंड में भीषण
मची हुई कंपन है
शिरा और धमनी में
बेअदबी उलझन है
शगल ये पुराना है
इसे बदल जाना है
नव चेतन के पट की
सांकल खुलवाना है
बाते ठुकरानी है अब तक जो मनवाई

समाचार है

समाचार है
अच्छा मौसम आने वाला है
समाचार है
फिर से होने लगा उजाला है

धुप चटकती, इतराती है
छाँव थकी है, सुस्ताती है
तारकोल की महक उडी है
फुलमतिया भी वहीँ खड़ी है
सड़क किनारे
साडी वाला पलना डाला है

दौड़े खूब कचूमर निकला
दफ्तर दफ्तर भागे अगला
चाय पकौड़े दाना, पानी,
टेबल, कुर्सी सब मनमानी
खड़ा द्वार पर
जैसे कोई फेरी वाला है

फिर से छीने गए निवाले
सब के सब थे तकने वाले
आस उगी है ये बेहतर है
शायद उसका मन पत्थर है
या फिर वह
बाहर से गोरा भीतर काला है

घन घन मेघ बजे

सूरज से करके बरजोरी
घन-घन मेघ बजे

छोड़ किनारे द्वारे-द्वारे
नदिया आज फिरे
दिन अलसाए मन पनियाए
हैं बिखरे-बिखरे
हरियाली का घुँघटा काढ़े
वसुधा खूब लजे

ऊसर मन में प्रेम के अंकुर
अभी-अभी फूटे
आसमान में उड़े है पंछी
पिंजरे है टूटे
कूची में उस चित्रकार के
कितने रंग सजे

टूटी मेड़ भरा है पानी
कोई बंद लगे
घुटनों भर की धोती में
जैसे पैबंद लगे
देख कृषक काया बरबस ही
श्रद्धा भाव उप

जनमानस जिस कमल पुष्प को

जनमानस जिस कमल पुष्प को
देवालय में चढ़ा रहा है
अपने जीवन से कितने ही
पाठ हमें वह पढ़ा रहा है

आज़ादी के प्रथम समर का
वीरों ने था बिगुल बजाया
सोयी जनता जाग पड़ी और
क्रांति का इक परचम लहराया
एक समय ऐसा आया जब
क्रांति शिखर को चूम रही थी
प्रतीक बन तब उसी क्रांति का
कमल, चपाती घूम रही थी
वही कमल बन राष्ट्र पुष्प अब
देश की शोभा बढ़ा रहा है

विपदाएं कितनी भी आएँ
शेष ना आशाएं राह जाएँ
क्षुधा, गरीबी, और लाचारी
कितने भी रोड़े अटकाएँ
कठिन परिश्रम, सम्यक चिंतन
आओ सम्बल इन्हें बनायएँ
हम अपनी मुठ्ठी ना भीचें
सीख सकें तो कमल से सीखें
जो ऋतुओं की मार झेलकर
कीचड में भी खड़ा रहा है

जे

 

तारों के अम्बर में चाँद के समान

तारों के अम्बर में चाँद के समान
कमल भी कुमुदिनी को बाँट रहा ज्ञान

कमल पुष्प कर में ले
मुख में हरि जाप किये
मंदिर की सीढ़ी पर
मद्धिम पद चाप लिए
नन्हे डग भरती है तोतली जबान
हाँथ से फिसल जाता सारा सामान
जीवन दर्शन से जो बिल्कुल अज्ञान
कमल पुष्प देता कोमलता का ज्ञान

झींगुर की एक सभा
पावस की रुन झुन झुन
उस पर मादक मयूर
पेयों पेयों की धुन
वर्षा के मौसम का मधुर मधुर गान
झाँक रहा खिड़की से खुला आसमान
दुनिया के नियमों का जिन्हें नहीं ध्यान
कमल पुष्प देता सुंदरता वरदान

तुलसी के बिरवे ने तेरी

तुलसी के बिरवे ने तेरी
याद दिलाई है
सर्दी नहीं लगी थी फिर भी
खांसी आई है

खड़े खड़े सब देख रहा है
मन भौंचक्के
अक्स ज़ेहन से चुरा ले गए
ख़्वाब उचक्के
शोर मचाती भाग रही
कोरी तनहाई है

बंद हुआ कमरे में दिन
सिटकिनी लगा के
आदत से मज़बूर छुप गई
रात लजा के
चन्दा सूरज ने इनको
आवाज़ लगाईं है

घर का कोना कोना अब तक
बिखरा बिखरा है
गलियों में भी एक अदद
सन्नाटा पसरा है
लगता अभी अभी लौटा
कोई दंगाई है

 

Share