राधेश्याम ‘प्रवासी’ की रचनाएँ

मंगलमय हो!

मंगलमय हो संस्कृति-पथ पर अगला चरण तुम्हारा!

मंज़िल से पहले नाविक पतवार न रूकने पाये,
भँवरों में पड़ करके मय का ज्वार न उठने पाये,
मार्ग करेगा अखिल विश्व निश्चय अनुसरण तुम्हारा!

मज्जू भारती की गौरव – गुण- गरिमा जग में दमके,
रजत रश्मि बरसायें रातें, स्वर्ग सबेरा चमके,
अनुकरणीय बने बसुधा में शुभ आचरण तुम्हारा!

हिमगिरि के उन्नत शिखरों से काश्मीर की घाटी से,
अवध, बंग, पंजाब, सिन्धु, रावी, गंगा की माटी से,
आती है ध्वनि जिसे गा रहा अन्तः करण तुम्हारा!

रोक सका कब सदाचार को दुराचार है बाहों में,
कौन सकेगा टोक प्रगति के सेनानी को राहों में,
सत्य, त्याग, तप का अभेद्य है दृढ़ आभरण तुम्हारा!

पांचजन्य-सा एक बार जागरण मन्त्र का गुंजन हो,
छन्द-छन्द की पंक्ति-पंक्ति में जीवन का स्पन्दन हो,
राष्ट्रधर्म के लिए अमर हो जीवन-मरण तुम्हारा!

वह गीत सुनाना है!

जिसके स्वर, अम्बर पर
युग-युग तक गूँजते रहें,
यह गीत सुनाना है!

जिसकी लय, बने मलय
प्यार भरा वह मानवता का,
स्रोत बहाना है।

जन-जन में, तन-तन में
देश प्रेम, सोये अतीत का,
शौर्य जगाना है।

हृदय मिले, कमल खिलें,
पाहन उर कर द्रवित उठें,
यह दर्द उठाना है!

उन्मन मन, यह जीवन
जहाँ शान्ति पा जाय,
यही निर्माण बनाना है!

पिया की दूर नगरिया है!

आ रही मधुर मिलन की रैन,
पिया की दूर नगरिया है!

नैहर रह न सकेगी दुलहिन
चलना प्रिय के देश,
आज विदा की बेला में
रुपसी सजा ले वेश,

चलना होगा दूर देश है
कठिन डगरिया है!

निशा-केश विन्यास उषा की
माँग सजा अलबेली,
रह न सकेगी शयन कक्ष में
दुलहिन आज अकेली,

सूरज बिन्दी, ओढ़ गगन की
नील चुनरिया है!

सात समुन्दर की प्यासों को
अधरांे बीच बसाले,
केश-पाश में घन की घनता
का साम्राज्य छुपाले,

छलक न जाये तेरे प्रणय की
भरी गगरिया है!

उस काजल का अंजन करले
जिसकी रेख न मिट पाये,
लगा महावर आज सुहागिन
जिसका रंग न जा पाये,
दाग पड़े न मिटें चूनर की
कभी लहरिया है!

जो न पड़ सके धूमिल तुझको
कंुकुम वही लगाना है,
घूँघट के पट खोल नवेली
पिया मिलन को जाना है,
श्वास-श्वास पर चली आ रही
विरह खबरिया है!
मधुर मिलन की रात वहीं
कल्पना लोक के गाँव में,
कुसुमित पूनम, रजन रश्मियाँ
चन्दा की मधु छाँव में,
दूर गगन में दमक रही
तारों की अटरिया हैं!

तेरा अटल सुहाग सुहागिन
कभी न मिटने वाला,
उसे न सकती मार मौत की
तरल गरल मयि हाला,
बजा रहा जो शून्य विजन में
प्रणय बँसुरिया है!

जन्म जन्म का बिछ ड़ा साथी
निश्चय तुझे मिलेगा,
रात अतृप्त इच्छाओं का
निस्तार वहीं पर होगा,
कर न आज मनुहार
द्वार पर खड़ा सँवरिया है!

एक उन्मत मन मगर चाहें बहुत हैं,

एक उर है पर छिपी आहें बहुत हैं,
सोचता है मौन सीमा पर, ‘प्रवासी’
एक मंजिल है मगर राहें बहुत हैं!

बेबसी का नाम ही तो व्यक्ति है,
आज की कल पर मगर आसक्ति है,
भाव की अभिव्यक्ति मैं कैसे करूँ
भावना ही भाव की अभिव्यक्ति है!

वरदान नहीं माँगूँगा!

तुम एक बार बस आ जाओ जीवन में,
सच कहता हूँ वरदान नहीं माँगँूगा!

यह अर्चन का फिर बुझा दीप जल जायेगा,
मेरा मुझ को खोया अतीत मिल जायेगा,
दे दूँगा प्राणों की सौगात तुम्हें मैं
पर बदले में प्रतिदान नहीं माँगूँगा!

चिर परिचित पगध्वनि जो सूने में आती है,
उर-कंपन को संगीत बनाती जाती है,
प्रतिबिम्ब दिखादो वह जग के दर्पन में
अज्ञात सखे पहिचान नहीं मांगूँगा!

आहों में छिपने वाले हर आह बुलाती है,
जीवन की सूनी-सूनी हर राह बुलाती है,
यदि क्रन्दन ही बन कर तुम मेरे उर में
बस जाओ तो मुस्कान नहीं माँगूँगा!

जागृति में हो साकार या कि सपनों में,
उर-भावों की यमुना कल्पना बनों में,
टूटी वीणा के तार एक क्षण भर को
जुड़ जाओ मैं मधु गान नहीं माँगूँगा!

वृत्तियों की वर्तिका तब जल उठी!

जब पड़ा स्नेह संचित नेह का
वृत्तियों की वर्तिका तब जल उठी!

लौ लगी ऐसी कि लौ ज्योतिर्मयी
हो उठी उर के सघन तम-तोमपर,
कामनाओं के पतंगे जल मरे
कल्पना पंछी उड़ जले व्योग पर,

सत्य का आभास कुछ ऐसा हुआ,
साधना की सुप्त कलिका खिल उठी !

निष्प्रकंपित दीप की उस ज्योति से
अन्ध को पी कर धुवाँ उठने लगा,
आँधियाँ बिचलित हजारों हो गई
मुक्त हो आलोक भी हँसने लगा,

स्वर्णवर्णी रश्मि बन अन्तर्मुखी,
हो स्वयं अन्तर्जगत में धुल उठी!

भेदती उतरी किरन वह तीर-सी
उस अगम तल के गहन आवर्त में,
फट गये जड़ राशि के दृढ़ आवरण
व्यक्त बन, अव्यक्त था उस गर्त में,

प्ररेणा थी पथ-प्रदर्शक कौन-सी,
ग्रान्थि जड़-चेतन जगत की खुल उठी!

मैं वहाँ था शान्ति के साम्राज्य में
सुन्दरम-सत्यं-शिवं की गोद में,
थे प्रवाहित मधु सुधा के स्रोत भी
चेतना छहरी हुई थी मोद में,

किन्तु वह था कौन चिर परिचित वहाँ,
देख कर जिसको अमरता मिल उठी!

मेरी मुस्कानो में चेतना तुम्हारी है,
मेरे क्रन्दन में भी वेदना तुम्हारी है,
मैं डूबा हूँ इस लिये ध्यान सागर में
मेरे चिन्तन में आराधना तुम्हारी है!

तुम मुझे भुला कर भुला नहीं पाओगे,
तुम मुझे विदा कर बुला नहीं पाओगे,
ठुकराओ मत अर्चना दीप बुझ जायेगा
तुम इसे बुझा कर जला नहीं पाओगे!

बीन तेरी है मगर गीत मैं गाने बैठा,
तेरी लय में हूँ अपने स्वर को मिलाने बैठा,
तेरे भावों के जगत में

निष्काम कर्म साधना

फल की साध त्याग करके साधक साधना करो!

जीवन क्षणिक जीव अविनाशी जग मायामय छलना है,
नश्वरता तम में दीपक बन तुम्हें चिरंतन जलना है,
कुछ पाने की आश त्याग कर आराधना करो!

ध्याता! ध्यान करो, तुमसे है ध्येय तुम्हारा दूर नहीं,
दृष्टा दर्शन करो इष्ट का दृश्य तुम्हारा दूर नहीं,
शाश्वत कर्मों से भोगों की मत चाहना करो!

कब रवि ने प्रकाश के बदले जगती से अभिलाषा की,
गगन, पवन, सिकता, घन ने कब कुछ पाने की आशा की,
कर्तव्यों से अधिकारों की मत याचना करो!

तुम में आत्म-तेज गौतम का, कपिल पतंजलि की लव है,
ज्ञान, भक्ति, वैराग्य भगीरथ के तपक का चिर वैभव है,
बढ़ो करो पुरूषार्थ विश्व में सद्भावना भरो!

इष्ट देव के चरणों में संचित पुण्यों को अर्पित कर,
तुम्हें अमरता मिल जायेगी निज को उन्हें समर्पित कर,
स्वार्थ, त्याग, निष्काम, कर्म से अब कामना करो!

भटक चुके हो बहुत ‘प्रवासी’ जनम-मरण के फेरे में,
मिल न सकेगी शान्ति कभी भी चिर अशान्ति के घेरे में,
मानस में मानवी सृष्टि की शुभ सर्जना करो!

अपने
आज सपनो को हॅँू साकार बनाने बैठा!

 

यह है माया को संसार!

यहै है माया का संसार,
समुझि डगरोहियो बढेउ अगार,
पाँय के आगे फिसलनि है,
राह सूखी पै रपटनि है!

फूलि का यौवन मैहाँ फूल,
रहे हैं कहुँ डालिन पर झूल,
देखि के तुम इनका अनुकूल
न जायउ कहुँ अपनो पनु भुल,
फाटि जाई फँसि कै आँचल,
विकट ऐसी यह उरझनि है!

बचपना ओरू ऐस गरिजाय,
जवानी सपनेन मा धुलि जाय,
श्याम पर गई सफेदी छाय,
बुढ़ापा लै गै मौत उठाय,
अचाका झप्पा मरि है काल,
बाज की ऐसी झपटनि है!

बदलु ना पारस, बदले काँच,
सपन मा सौ-सौ नाच न नाच,
साँच ना यहु ना, बहु है साँच,
साँच पर कबहु न आई आँच,
हियइ मा अमरउती है धार,
बहि रही जगकी मटकनि है!

सुवा सेमर तजि कै उड़ि परा,
पतिंगा कहूँ दिया पर जरा,
कमल माँ फँसिकै भँउरा डरा,
बीन का सुनिकै हिरना मरा,
समुझि तुइ जहिका रस्सी रहा,
साँप की वह तौ घिसलनि है!

होली

सत्यमेव जयते की गूँजी दिग्-दिगंत में बोली,
हुई धर्म की विजय जल गई दुराचार की होली,

यही दिवस था अंगारों पर झोंक दिया जलजात गया,
करि पग के नीचे किसलय-सा पटका वह नवजात गया,
धर्मप्राण जीवन की थी ज्वाला पर हुई समीक्षा,
अगर हो गया राम-भक्त देकर के अग्नि परीक्षा,

ऊषा ने सामोद लगाई स्वयं माल पर रोली!
हुई धर्म की विजय जल गई दुराचार की होली!!

ग्रीवा में विषधर सर्पों के हार पिन्हाये जाते थे,
कदम-कदम पर काँटो के अम्बार बिछाये जाते थे,
नन्हा विद्रोही सन्मुख झुक सका नहीं विपदाओं से,
खेल खेलता रहा विप्लती लपटों पर बाधाओं से,

सह कर कष्ट वन्दिनी संस्कृति की हथकड़ियाँ खोली!
हुई धर्म की विजय जल गई दुराचार की होली!!

यही दिवस था जब मानव ने दानवता को ललकारा,
गूँज गया भूतल पर ‘हर हर महादेव’ का नारा,
हिमगिरि का झुक गया शीश चट्टानें भी थी पिघल उठी,
सागर की हर लहर चरण चुम्बन करने को मचल उठी,

निकल पड़ी जब मतवालों की थी बालि पथपर टोली!
हुई धर्म की विजय जल गई दुराचार की होली!!

गरज उठे पर सिंह दनुजता की विदीर्ण कर छाती,
भारत माँ पा गई पुनः खोई संस्कृति की थाती,
युग-युग से जलती आई है ज्वाला में अपवाद की,
मिट न सकेगी कभी धरा से परिपाटी प्रहलाद की,

मिले हृदय से हृदय उड़ रही थी अबीर की झोली!
हुई धर्म की विजय जल गई दुराचार की होती!!

किसने आकर मन-मन्दिर में जीवन-ज्योति जगादी है,
अन्धकार के धूमिलपन पर रज रश्मि फैलादी है,

किसका यह स्पर्श परम परिचित है अनजाना-सा,
किसका यह स्वर है जो युग-युग से है पहिचाना सा,
कौन, तुम्हारे इंगित पर मैं चला किन्तु तुम कहाँ चले,
जगती के इस निर्जन पथ पर मुझे अकेला छोड़ चले,

ढहती आशा की दीवारें, पर तुम अब भी मौन हो,
बस मैं सब कुछ पा जाऊँगा बतलादो तुम कौन हो!

दीपावली

राम की दिग्विजय दीपावली दिपेगी,
पाप का रावण सदा जलता रहेगा!

बच न पायेगी पिशाची वृत्ति लंका
आज मारुति चल पड़ा होकर सजग है,
दानवी को लक्ष्य करके रूद्र का
खुल उठा प्रलयंकरी प्रज्वलित दृग है,

सत्य तो शिव सुन्दरम् का रूप है,
असत को अभिशाप ही मिलता रहेगा!

है असम्भव, इन्द्रजित की शक्ति कैसे,
वीर अंगद की प्रतिज्ञा तोड़ देगी,
है असम्भव, धरणि कैसे दृढ़ व्रती के
चरण तल को सहज में ही छोड़ देगी,

बाँध करके सेतु बाधा सिन्धु पर,
राम का अभियान यह चलता रहेगा!
आज ज्योतिर्मय हुए है दीप वह
आँधियों में जो कभी बुझते नहीं हैं,
उठ चुके हैं आज फिर दृढ़तर कदम
लक्ष के इस पार जो रूकते नहीं हैं,

शक्ति संचित है युगों के स्नेह की,
प्रलय में आलोक यह पलता रहेगा!
बुझ चलेगी टिमटिमाती तारिकायें
स्वर्ण संस्कृति का सबेरा आ रहा है,
जागरण का मंत्र भर कर के स्वरों में
आज तनमय हो प्रवासी गा रहा है,

कामना का यह कमल मरुभूमि में,
चेतना लेकर नई खिलता रहेगा!!

मधुर लय है, स्वर है, दर्द भरा क्रन्दन है,
भाव के साथ ही उर का छिपा स्पन्दन है,
बीन का ठाठ विकृत, तार है टूटे गायक
कैसे गाओगे छिपा बेबसी का क्रन्दन है!

दरिंदगी से इन्तकाम अभी बाकी है,
प्यार की एक सुबह-शाम अभी बाकी है,
मय में डूबे हुए मयखाने के हालावादी
दीनता के जहर का जाम अभी बाकी है!

तेरी अन्दाज़ ही दुनिया की कहानी बन जाय,
आदम आन की तलवार का पानी बन जाय,
फूँक दे आग को मुर्दा रगों के ताने में
जिसको छू करके बुढ़ापा भी जवानी बन जाय!

तुम आओगे

तु आओगे जब, मरु बसंत बन जायेगा,
चन्दा से करके प्यार चाँदनी चल देगी!

हर साँस तुम्हारी आशा के सम्बल पर है,
हर आश तुम्हारे आश्वासन के बल पर है,
तुम आओगे ! आरती दीप बुझ जाने पर
तारों से कर मनुहार यामिनी चल देगी!

मेरे रागों की स्वर सर्जना सिसकती है,
मेरे भावों की अभिव्यंजना तड़पती है,
तुम आओगे जब असम बीन की मीड़ों पर
तारों से कर अभिसार रागिनी चल देगी!

उर हारों की लड़ियाँ आँसू बन जायेंगी,
रजनीगन्धा की कलियाँ कुम्हला जायेंगी,
तुम आओगे विश्वास मृतक जीवित करने
जब मिलन विदा ले विपथ-गामिनी चल देगी!

विस्मृति झंझा में, जिसे सँवारा है मैने,
तन्मय होकर सौ बार पुकारा है मैंने,
तुम आओगे जब हृदय वेदना-घन-नभ पर
सुस्मृति चाहों की दमक दामिनी चल देगी!

रुक जाओ बादल!

आज मिलन की मधुर यामिनी खिली पूर्णिमा है,
मिधु मण्डल पर छाने वाले रूक जाओ बादल!

मत डालो अवगुण्ठन मुख की आभा पर अपको का,
मत पालो खुशियों की बेला में सावन पलकों का,
प्रणय निवेदन को मत बाँधो आज लाज की पाशों में,
चक्रवाक युग का अतृत्प बन जायेगा पागल!

बरसों की साधना आज वरदान बन रही है,
असम बीन पर भग्न भावना गान बन रही है,
चिन्तन की चेतन चपलाओं क्षण भर रूक जाओ,
किन्हीं प्रतीक्षित नयनों का धुल जायेगा काजल!

मंज़िल का आह्वान आज चलने वाले ने पाया है,
अन्तर का हर तार आज अन्तर में जुड़ पाया है,
जाने दो आहों को उन साँसों तक हिमवाही,
मत छेड़ो कुहरे की रिमझिम के मादक पायल!

शबनम से बोझिल रातों को नीरवता में खोने दो,
अन्धकार की धमता को चिर शान्त पड़ा ही सोने दो,
प्राची पर मुस्काने वाली क्षण भर रुको अरुणि में,
किसी सु

दुखद निराशा गीत रे!

व्यथित हृदय में प्रति चल बजते,
दुखद निराशा गीत रे!

वह कर तरणी चली कि जिसकी छुट गई पतवार अरे,
महा प्रलय का हास चतुर्दिक ले गूँजी शत धार अरे,
बैठा रहे हैं, जग – सागर में जन्तु सदृश सब अपने!

हार हुई है जिसे समझता था,
है मेरी जीत रे!

शून्य गगन को देख रहा है निज का करके अंकन,
हृदय सिन्धु का बढ़ता जाता क्षण प्रतिक्षण स्पन्दन,
स्पन्दन में हहर रहा है अट्टहास झंझा का,
झंझाओं में छहर रहा है अश्रुपात नयनों का!

दूर आदि से आलिंगन,
करता है मूक अतीत रे!

कहीं वियोगी से पीड़ित हो जलद दूत बन आये,
जो कोमल किसलय से उर पर तड़ित बज्र बन छाये,
निकल पड़ीं कुछ ज्वलित उसाँसें दृष्टि शून्य में खोयी,
एक आह भर कर अन्तर में स्वप्निल जग में सोई,

बोला अन्तर परदेशी भी,
कभी हुआ है मीत रे!

अतृप्तता व्यथा, जीवन में उलझी हुई निराशा,
विक्षिप्तता परिधि के ऊपर मानव मृग-सा प्यासा,
झन-झन करके गिरी शृंखला फटी यवनिका लख के,
टप-टप करके गिरे अश्रु रोया मानव जी भर के!

अश्रु-पात की कल-कल में,
गा उठी नियति संगीत रे!

जब जीवन है जटिल पहेली समाधान फिर कैसा,
जब अन्तिम लय इति में होगी अथ का चिंतन कैसा,
आहत तप्त क्यों जग में उल्टी भरता आहें,
ज़मी-जनाज़ा-क़फन-आसमा देख बदली राहें!

समझ रहा हूँ, समझ चुका हूँ,
फिर क्यों मन भयभीत रे!

उदय हुआ यदि प्राची पर तो अन्त प्रतीची पर है,
जहाँ जनम है खुशी लिये इति क्रन्दन में निश्चित है,
अथ में इति, इति में अथ मिलकर उखड़ चुके हैं डेरे,
भटक शून्य में जीवन कहीं लेने जा रहे बसेरे!

फिर जग के बन्धन -विधान पर,
यह कैसी परतीत रे!

हागिन का सिंदूर पड़ जायेगा धूमिल!

धरा-संगीत

सपनों की दुनिया में खोये कवि आज तुम,
जीवन की बात करो धरती के गीत लिखो!

यौवन के मद में बनी बावरी पुरवइया,
डोल उठी मादकता लेकर अमरइया,
खन-खन-खन बोल उठीं गेहूँ की बालियाँ,
सरसों के फूलों पे भौंरों की तालियाँ,
अरहर के भग जगे जई चने लहक उठे,
चटक रही मटर कहीं खेत सभी महक उठे,

भौरों के राग का,
टेसू के फाग का,

भावों की गलियों में भटके कवि आज तुम,
जीवन की बात करो धरती के गीत लिखो!

पीपल के पेड़ तले टूटी सी मड़ैया,
लैरुआ को साथ लिये मोहन की गैया,
सामने कछारों में लिपटी हरियाली,
नाच उठी प्रकृति नटी हो कर मतवाली,
हिरनी अलसायी हुई डाल रही टोना,
खेल रहे सरिता के तट पे मृग छौना,

बालू की सेज पर,
क्षण भर को बैठकर,
जगती की हलचल से ऊबे कवि आज तुम,
जीवन की बात करो धरती के गीत लिखो!

लह-लह-लह अमिलतास डाल लहलहा उठी,
मह – मह अमराई भरे अंक महमहा उठी,
सन – सन – सन पछुआ चली घटा मुस्करा उठी,
रिमझिम के गीतों में कोयलिया गा उठी,
जंगल में दूर कहीं अमवा की छाँव तले,
टेसू में आग लगी धरती का प्यार पले,

कोयल की कूक में,
पपिहा की हूक में,

प्रेयसि के चिन्तन में तन्मय कवि आज तुम
जीवन की बात करो धरती के गीत लिखो!

जेठ भरी दुपहरिया सूरज की छाँव में,
जोत रहा हरवाहा खेतों को गाँव में,
भोजन का थाल लिये गाँव की नवेली,
पास चली हंसिन-सी खेत को अकेली,
विरहा के राग जगे पायल की रुनझुन में,
वीणा के तार जगे घण्टी की टुन-टुन में!

वर्षा की रिमझिम में,
बिरहा की गुनगुन में,

चन्दा की दुनिया में भूले कवि आज तुम
जीवन की बात करो धरती के गीत लिखो!

सूने मैदानों में खेत औ, खलिहानों में,
बैलों की शक्ति जगी निर्धन किसानों में,
कुटियों के दीप जगे खुशियों का साज हुआ,
धरती के राजा का धरती पे राज हुआ,
नाच उठी चाँदनी है चन्दा की बातों में,
बन गया पयाल सेज शुक्ल चैत रातों में,

चन्दा की चाँदनी में,
तारों की यामिनी में,

नयनों के पलकों में बन्दी कवि आज तुम,
जीवन की बात करो धरती के गीत लिखो!

दूर तुम्हें गाँवों में सर्जना बुला रही,
दीनों के आहों की गर्जना बुला रही,
मानव के श्रम की है साधना बुला रही,
आहत के अन्तर की वेदना बुला रही,
अन्तिम है साँसों की कामना बुला रही,
मानवता की है तुम्हें प्रार्थना बुला रही,

आ रही पुकार है,
भूमि की जुहार है,

हाला के प्याला में डूबे कवि आज तुम,
जीवन की बात करो धरती के गीत लिखो!

 

Share