रामगोपाल ‘रुद्र’की रचनाएँ

रुद्र स्तवन

हर हर मृडेश हे प्रलयंकर!

मदघूर्ण-निशामणि नर-कपाल
प्रज्वलित-नेत्र खप्पर-विशाल
तुम पुलक-पुलक धृत-मुंडमाल
उद्धत विराट ताण्डव-तत्पर।

तुम शुभ्र-वदन उज्ज्वल-निकेत,
गणपति-हिमाद्रि-तनुजा-समेत,
पार्षद-परेश! बहु भूत-प्रेत
ले, प्रलय-राग के रचते स्वर।

परिधान-पिंग प्रिय व्याघ्रचर्म,
हो प्रथित रुद्र, भीष्मोग्र-कर्म
किसको अवगत हो सका मर्म?
तुम प्रलयंकर भी हो शंकर।

मंदर-मंथन से जब विह्वल
उगला समुद्र ने हालाहल,
तुम जो न दया करके, शितिगल!
कैसे होते ये अमर, अमर?

क्षण भर उचटा चिर-योग-शयन,
खोल त्र्यंबक तुमने त्रिनयन,
प्रकटे स्फुलिंग, जल मरा मयन,
तुमको अजेय क्या, योगीश्वर?

तोड़ो समाधि फिर एक बार,
हिल उठें अद्रि, रवि हो तुषार,
प्रज्वलित चंद्र उगले अँगार,
काँपें त्रिलोक-जल-थल थर-थर।

फुंकार उठें पन्नग कराल,
फैले अग-जग में गरलज्वाल,
नाचे प्रमत्त हो प्रलयकाल
दे ताल तुम्हारे डमरू पर।

विद्युत् द्रुतगति से तड़क-तड़क
अभ्रस्थ इरम्मद कड़क-कड़क
टूटें, अँगार उगलें निधड़क,
विध्वस्त विश्व हो क्षार-निकर।

हो अस्त-व्यस्त जगती समस्त,
टकराएँ ग्रह निज कक्ष-न्यस्त,
विधि-विष्णु मूढ़, विबुधेश त्रस्त,
चक्रांग चकित, काँपें खगवर।

हो रूढ़ि-राक्षसी का विनाश,
अंधी प्रतीती का त्वरित ह्रास,
तुम शिवस्वरूप फिर नव-विकास
के रचो नये युग, नव वत्सर।

मिट जाय द्वैत, फैलें शम् के
शुभ भाव पुन: ‘हर हर बम्’ के,
ऊँ ‘ सत्यं शिवं सुन्दरम्” के
मंजुल रव से हो विश्व मुखर।

भूला राग

कोई छंदों के बंध का बंदी नहीं जो मैं अक्षर जोड़ता जा रहा हूँ
हर अक्षर है टुकड़ा दिल का, दिल टूटा हुआ मैं जुटा रहा हूँ;
कोई गाना नहीं, यह एक फ़िसाना है जीवन का, जो सुना रहा हूँ
एक दर्द की रागिनी दाग़ों के काले सुरों पर आज बजा रहा हूँ।

एक वक़्त था, एक जमाना हुआ, जब भाग पै फूला समाता न था,
मेरा छोटा-सा बाग़ यहीं कहीं था, जो कि नंदन को भी लगाता न था,
दुनिया से जुदा घोंसला था मेरा; कौन था, देख के जो सिहाता न था!
ऋतुराज यहाँ बस आता ही था और आता जो था, फिर जाता न था।

हँसता ही सदा दिन था रहता, चाँदनी की निशा मनभावनी थी,
जब रंग-बिरंगी खिली-खिलती कलिकाओं की टोली सुहावनी थी;
नित रंग-रली-रत राग-भरे तितली-दल की छावनी थी,
जहाँ प्रेम का राग अलापते-से अलि-बालों की गुंजित लावनी थी।

आज सूनी पड़ी वह बाटिका है, आशियाने का भी न ठिकाना है रे!
हरियाली नहीं वह लाली नहीं, यह प्रान्तर आज वीराना है रे!
न बहार ही कोई बहार यहाँ, न सुगंध का राजखजाना है रे!
दल पीले पड़े धूल में कहते, आज कोंपलों का यह बाना है रे!

सुख की मुझसे मत पूछो कथा, सुख का मुझसे तभी साथ छुटा,
जब हाथ में आये हुए सुख का विधिलीला से बेबस हाथ छुटा;
देखता ही रहा, कुछ हो न सका और जीवन का हर हार लुटा,
बाट जोहती-सी एक लालसा का दिल में अरमान घुटा।

दुख देख मेरा रो पड़ा आसमाँ ओस-बूँदों से आँसू बहाने लगा,
लालसा कि समाधि पै रोता हुआ चाँद तारों के फूल चढ़ाने लगा;
मेरी आहों के दाह से काला बना पिक दर्द-कहानी सुनाने लगा,
आग खाने चकोर लगा तब से, पपीहा ‘पी कहाँ’ गुहराने लगा।

आसमान में छेद हजारों हुए, चाँद के दिल में वह दाग बना,
दुख मेरा पयोनिधि के उर में बड़वा-सी भयंकर आग बना,
वह भाग बना, बिरही को मिला और सूने सितारों का राग बना,
बेकली की निशा को रिझाते हुए बाँसुरी की कथा का बिहाग बना।

उसी भूले हुए राग के सुर को फिर आज ज़रा दुहरा रहा हूँ,
मुरझाया हुआ यह घाव कुरेद-कुरेद के ताज़ा बना रहा हूँ,
एक आग, जो राखों के नीचे दबी है पड़ी, दिल फूँक जगा रहा हूँ,
वेदना कि समाधि पै साधना का तप-दीपक एक जला रहा हूँ।

वह दिन

आज भी वह दिन न भूला।

शीर्ण मानस में मनोरथपूर्ण जीवन आ भरा था,
और जब मरुलोक भी मधुसिक्त हो पाया हरा था,
चिर-प्रतीक्षा के बाद मेरा बाग़ पहली बार फूला।

गंध-नी बह मंद शीतल गंध का करती वहन थी,
कूक पिक शुक सारिका कि रागिनी करती सर्जन थी,
टँग रहा था वृन्त पर ऋतुराज का हर ओर झूला।

एक दुनिया ही निराली थी, नयी पल-पल पुलक थी,
आप अपने सौख्य, स्वप्निल-राशि पर रोमालि ठक् थी,
शूल भी थे फूल, अपने में समाता था न फूला।

चल रही थी पाल सुख के तान लघु तरणी दुलारी,
शांत था सागर, जगत्पट पर खचित थी चित्रकारी,
बालराशि की तूलिका से था प्रकृति ने चित्र तूला।

आह! तब सोचा न था, यह चार दिन की चाँदनी है,
धौरहर हौ धूम का, चाँदी नहीं, बालू-कनी है,
स्थिर जिसे था मानता, निकला वही जल का बबूला।

घिर घुमड़ सहसा लगे घन-घन गगन में शोर करने;
क्षुब्ध सुखसागर; लगे खर-शर-सदृश हिमबिन्दु झरने;
ले गया नौका भँवर में एक झोंके का बगूला।

नि: स्व यों मुझको बनाकर, फेंक कर अनजान थल में,
क्या मिला तुझको, हुई क्या वृद्धि तेरे सिद्धि-बल में?
कब न तुझको, भाग्य मेरे, था प्रबल मैंने कबूला?

नयनों का सावन

मेरी पलकें क्या देख रहे? देखो मत नयनों का सावन।
जो देख सको तो देखो मेरे भाव, हृदय मेरा पावन।

आँखें तो हैं बरसाती नद,
जो आयी बाढ़, बहीं उन्मद,
भर आता बरसाती पानी,
तो धीरज की खो जाती हद;
क्या देख रहे छिछले लोचन,
मिटते जिनके मोती बन-बन?
दिल की मेरी दुनिया देखो, देखो मेरे मन की चितवन।

बादल बनकर जो आते हैं,
मोरों को नाच नचाते हैं,
बिजली के सैन चला दिल पर
कितनों के वज्र गिराते हैं,
कैसे हैं ये घनघोर नयन,
काले ये दिल के चोर नयन!
आँखों में किन्तु पपीहे की, बस एक रूप–स्वाती-जीवन।

आँखों से धोखा होता है,
जीवन अपना घर खोता है,
कैसे कोई विश्वास करे?
आँखें हँसतीं, मन रोता है;
बदला करती हैं ये क्षण-क्षण,
क्षण में करतीं सर्वस्व-हरण,
आँखों में प्रिय! क्या घूम रहे? आओ, देखो मन का उपवन।

तोता ज्यों आँख बदलता है,
आँखों का कौतुक चलता है,
थिरता इनमें कब आ पायी?
जो कुछ है, भृंग-चपलता है;
निरखो मत हे मोहक नर्तन,
देखो इनका बर परिवर्तन,
काले इन पर्दों के भीतर देखो अपना ही रूप-सुमन।

दीपशिखा

आग हूँ, मुझसे न खेलो।

तुम शलभ सुकुमार, कोमल दल तुम्हारे,
वृन्त पर झूला किये, खेला किये मृदु वल्लियों से
कल्पना कि गोद में; मीठी मलय की थपकियों ने
स्नेह से सिंचित किये कुन्तल सँवारे;
दूर ही रहना, न छूना,
जल गया जो आप अपनी आँच में, उस काँच का मैं हूँ नमूना;
आप अपने से छला मैं भगा हूँ, मुझसे न खेलो!

मैं जली, जलती रही, ज्वाला जलाये;
ललकते लौ से लिपटने के लिए कितने सनेही
झूमते आये शलभ, दुर्लभ प्रणय-उपहार लाये!
जल मरे पल में मुझे देते दुआएँ;
और मैं टुक भी न डोली:
वे मेरे बेबोल मेरी एक बोली के लिए, फिर भी न बोली;
जो जलाता ही रहा, वह त्याग हूँ, मुझसे न खेलो।

तुम चले हो आज मुझसे प्यार पाने?
स्नेह से ही जो जली, जिसका प्रणय परिताप बनकर,
भाप की बड़वाग्नि का उत्ताप बनकर जल रहा है;
गरल से आये सुधा उपहार पाने?
प्रेम क परिहास हूँ मैं,
अविचलित ज्यों केतु हूँ अपने गगन का, दर्द का इतिहास हूँ मैं;
दृष्टि ही जिस

हार-जीत

धार में छोड़ी मैंने नाव, तीर पर दुनिया रोती रही।

एक दिन इसी तीर पर कहीं,
कहीं से, अपने से अनजान,
किसी का लेकर व्याकुल प्यार
और बस भोलेपन का ज्ञान,
हवा के दामन में बेहोश,
चूमती लहरों की मुस्कान,
लगी आकर थी मेरी नाव
लिये कुछ गूँज, लिये कुछ गान;
नाव में क्या-क्या था सामानतीर पर चर्चा होती रही।

और तब मैं सहसा रो पड़ा
कि मैंने देखी दुनिया नयी,
लगीं लगती-सी, पहली बार,
जमातें नयी, बिसातें नयी;
रूप की लगी हुई थी हाट
प्रेम बेहया, दया छलमयी
यहाँ आकर तो, हे भगवान!
देखता हूँ, पूँजी भी गयी;
तीर पर दुनिया भर की आँख-आँख में तीर चुभोती रही।

मगर जाना ही हो जिस ठौर,
वहाँ मर्जी की कैसी बात?
किसी ने चला दिया, चल पड़ा
चक्र-सा चलता मैं दिन-रात;
नाव लग गयी किनारे-घाट,
उतरकर, जहाँ मिल गया दौर,
लगा दी मैंने वहीं बिसात;
प्रीति मेरी, दुनिया के लिए रुपहले हार पिरोती रही।

मोल करने आये, मनचले,
न जाने कैसे-कैसे लोग,
किसी की आँखों में था लोभ,
किसी की बात—नीतिमय रोग;
मिले मुझको ऐसे उपदेश,
भरा जिनमें था केवल ढोंग;
जानकर मुझे महज़ अनजान
किया सबने ठगने का योग;
मुझे छलकर दुनिया कि चाल आबरू अपनी खोती रही।

और अब आज विदा कि घड़ी,
विदा उनसे, जो अच्छे लगे;
विदा उनसे, जिनके अरमान
दु: ख में रात-रात भर जगे:
विदा उनसे भी, बनकर मीत
जिन्होंने मेरे मोती ठगे;
विदा उन सपनों को भी आज,
आज तक जो पलकों से टँगे;
तीर-सा चल तीर से तेज, तीर पर छाया सोती रही।

फलेंगे, निश्‍चय, बनकर पेड़,
कि बोये हैं मैंने जो बीज;
छोड़ आया हूँ मैं जो राख,
बनेगी दुनिया का तावीज;
प्रेम की आवेगी वह बाढ़
कि धो देगी जो गली-गलीज़;
रंग लावेगी मेरी हार
एक दिन बनकर जन की चीज़;
हारकर भी मैं हँसता चला, जीतकर दुनिया रोती रही।

की प्रलय, वह नाग हूँ, मुझ से न खेलो!

वैरागी का गीत

जीवन में जो भी प्यार मिला,
जन-जन से जो दुत्कार मिली,
विजयी बन कर जो कुछ पाया,
उम्मीदों को जो हार मिली,
अरमान संजोये थे जितने
बालू की नीर लकीरों में,
वरदान मिले जो-जो जग से,
पीड़ा जो अपरम्पार मिली;
मैं तोड़ चला सारे बंधन, सब छोड़ चला जो प्यारा है!
लो, आज सभी कुछ लो, साथी! यह सब कुछ आज तुम्हारा है।

वह एक बिन्दु-सी, जो मीलित
कलि के उर में अज्ञात पली,
उच्छलित-सिन्धु-शीतल-तल में
जो चिर अभाव की ज्वाल जली,
वह एक अतृप्त पिपासा-सी,
जीवन की मुग्ध निराशा-सी,
सीपी के सम्पुट में सिमटी
मोती-सी जो वासना ढली,
हलचल जिसकी पारा ढलमल, संयम शीशे की कारा है!
लो, आज सभी कुछ लो, साथी! यह सब कुछ आज तुम्हारा है।

सपने तो बहुत-बहुत देखे,
सुख-दुख भी बहुत जुगोये हैं,
जाने कितने अनमोल रतन
पाये हैं, मैंने खोये हैं,
उलझन के इन शैवालों में
छल-जालों को क्या-क्या न मिला!
फूले न समाये प्राण कभी
तो कभी फूटकर रोये हैं;
मोती-मणियों से ही मैंने अपना यह गेह सँवारा है;
पर आज सभी कुछ लो, साथी! यह सब कुछ आज तुम्हारा है।

थी चाह बड़ी, मैं भी देखूँ
दूबों की कोमल राह सखे!
थी चाह स्नेह-समुंदर की
मैं भी पा सकता थाह सखे!
पर चाव रहे मन के मन ही
मेरे बालू ही बाँट पड़ी,
छू मुझे बसंती झोंका भी
बन जाता लू का दाह सखे!
तूफान जहाँ कण-कण में है, यह वह अंत: सरिधारा है!
लो, आज सभी कुछ लो, साथी! यह सब कुछ आज तुम्हारा है!

काँटे मेरे पग-चुम्बन को
मग में जो थे बेजार खड़े,
मेरी पावन पग-धूलि चढ़ा
सिर पर, लज्जा के भार गड़े;
आँधी आयी, पर मैं न रुका,
तूफान उठे, पर मैं न झुका;
चट्टान अड़ी, उखड़ी झंझा,
पग आगे ही कुछ और बढ़े;
साथी! यह तो वह जीवन है, संकट ही जिसे दुलारा है;
पर आज सभी कुछ लो, साथी! यह सब कुछ आज तुम्हारा है।

मेरा बल ही क्या था जो मैं
लहरों से होड़ लगा पाता!
साधन ही क्या थे प्राप्य मुझे,
जो मन की साध मिटा पाता?
फिर भी अनजान हिलोरों पर
बढ़ चली नाव झोंके खाती;
कौतूहल था, तूफानों में,
देखूँ तो, क्या-क्या है आता;
हर कष्ट झेल, हर विघ्न ठेल, अपनेपन से जो हारा है;
वह अपनापन, यह लो साथी! यह सबकुछ आज तुम्हारा है।

मेरी जितनी सामर्थ्य रही,
मुझसे जितना जो बन पाया,
मैंने तो यत्न किया, लेकिन,
फिर भी, न बनी कंचन काया;
लोहा भी पारस को छूकर
तर जाता है बनकर सोना,
मेरे तो पारस भी निकले
मुट्ठी-भर मिट्टी की माया;
फिर भी, मैंने समझा, मेरा सपना ही सत्य-सहारा है;
यह सपना भी अब लो, साथी! यह सब कुछ आज तुम्हारा है।

मंजर-गीत

गाऊँ, कुछ गीत सुनाऊँ रे, मंज़र हूँ, मधु बरसाऊँ।

मैं चूम-चूम दिनकर के कर, पी सुधा-स्निग्ध शशि के शीकर,
वंदित वसंत की मौन-मुखर सुषमा के साज सजाऊँ रे!

मलयज-रानी के धर दुकूल, सौरभ से अपने स्वप्न तूल,
रचना पर अपनी भूल-भूल, झूलूँ, फूलूँ, मुस्काऊँ रे!

गर्वित रसाल, हर्षित तमाल, सुरभित वनांत, अंबर विशाल,
तितली रसज्ञकुल मधुपमाल, सबसे मैं रास रचाऊँ रे!

चूमें चिड़ियाँ मेरे मधु-कर, झूमें पल्लव मुझको पाकर,
मेरी अनन्य-श्री भर दे स्वर अंग-जग में, मैं इठलाऊँ रे!

सूने में नभ के बादल-दल, भू पर खेतों में दल श्यामल,
मेरे रागों से हों प्रांजल, मैं मन की बीन बजाऊँ रे!

कूके केकी कोयल पगली, पिहके पपिहा प्रति वनस्थली,
फूली न समाए कली-कली, मैं वह संदेश सुनाऊँ रे!

खिल-खुल खेलें जन प्रेम-फाग, रह जाय न कण-भर द्वेष-राग,
सब लाल-लाल, सब बाग-बाग, भागे विराग, मैं भाऊँ रे!

दो दिन की मेरी प्रेमकथा, हर ले अंग-जग की मर्मव्यथा,
है मरण मर्त्य की प्रथा, मरूँ, पर अमराई भर जाऊँ रे!

प्रयाण-गीत

बढ़े चलो जवान तुम, बढ़े चलो, बढ़े चलो।

खड़ा विकट पहाड़ है,
मृगेन्‍द्र की दहाड़ है,
प्रचण्ड शैल-शैल पर
प्रपात का प्रहार है;
परन्‍तु शृंग-शृंग पर
अडिग अभंग अंघ्रि धर
चढ़े चलो जवान तुम, चढ़े चलो, चढ़े चलो।

कि लक्ष-लक्ष विघ्ननदल
घिरे प्रलय-प्रबल-चपल,
रुके न तुम्हारे चरण
नवीन-कल्पना-सबल;
उसी प्रकार आधि से
अनन्‍त विघ्न-व्याधि से
लड़े चलो जवान तुम, लड़े चलो, लड़े चलो।

घिरी कभी विकट अमा,
सशंक हो उठी क्षमा,
अशंक तुम चले, चली
चकित मरुत्परिक्रमा;
उसी प्रकार, शक्‍ति-रथ
बढ़ा प्रबुद्ध, मुक्‍तिपथ
गढ़े चलो जवान तुम, गढ़े चलो, गढ़े चलो।

अनभ्र वज्रपात हो,
उदग्र चक्रवात हो,
अनल उगल रहे शिखर,
कुहान्‍ध आर्त्‍त प्रात हो,
परन्‍तु वज्रदेह-से,
अजेय गेह-गेह से
कढ़े चलो जवान तुम, कढ़े चलो, कढ़े चलो।

स्वतन्‍त्रताप्‍ति के लिए,
कलुष-समाप्‍ति के लिए,
समाज में सुनीति की
अखण्ड व्याप्‍ति के लिए,
ध्रुवैक लक्ष्य-अक्ष पर
अमोघ राष्‍ट्र-रश्मि-शर
जड़े चलो जवान तुम, जड़े चलो, जड़े चलो।

 

मलयोच्छ्वास

श्रद्धा तो बहुत मिली जग से, थोड़ा-सा प्यार कहीं मिलता! !

मैं जहाँ गया, ‘जय हो, जय हो’ वन-वन के पंछी बोल उठे,
दल-फल-किसलय-कलि-मुकुल-कुसुम खिल-खिल खुल-खुल
मुँह खोल उठे,
वन-वल्लरियाँ मकरंद-विकल, गुल्मिनियों का अंचल सरका,
दूबों का यौवन दमक उठा, मानस के सरसिज डोल उठे;
आँखें तो बहुत मिलीं, लेकिन उर का उपहार नहीं मिलता।

फूलों की धूल-भरी शोभा सिहरन से सद्य: स्नात हुई,
रवि की अनुरागमयी नलिनी कुछ लाल हुई, अवदात हुई;
मद-गंध-अंध मैं गंधवाह जिस ओर चला, रस-घट छलका,
छू दिया जिसे वह स्वर्ण हुआ; छू गयी रात, मधुप्रात हुई;
पर मैं जिसमें ‘मैं’ को छू लूँ, ऐसा अभिसार नहीं मिलता।

रोमांच हुआ सर में, सरि में, कुवलय-कुल के कल-केसर में,
मेरी सुख-सन्निधि से जागी रस-रंग-तरंग चराचर में;
सबने जाना, मैं राजा हूँ, मस्ती का और जवानी का;
नदियों ने केवल ज्वार लखा, ज्वाला देखी कब सागर में!
थम जाय जहाँ हलचल मेरी, ऐसा आधार नहीं मिलता है।

थोड़ी-सी लू चल जाती है, संसार विकल हो जाता है,
वह मेरी ही अँगड़ाई है, जीवन जिसमें सो जाता है;
संयम की भी हद होती है, कब तक मन को बाँधे कोई?
लाचारी है, खो जाता है, रो आता है, रो जाता है;
दुनिया में तो रोने का भी खुलकर अधिकार नहीं मिलता।

दुर्दिन

गरज रहा है आसमाँ,
प्रलय का बँध रहा समाँ,
घुमड़ रहे घटा-कटक
कि आज व्योम पर विजय किये अकड़ रही अमा।

हहर रहे पहाड़ पर
विटप नदी-कछार पर
कि मृत्यु आ गयी निकट
उजड़ न जाय जड़ उखड़ हवा के एक वार पर।

दिगंत अंधकारमय
दुरंत दु: ख-भारमय
घटाएँ दुंद बाँधके
बजा रही है दुन्‍दुभी प्रलय-प्रणाद एकलय।

हहास बाँधके पवन
हिला रहे लता-भवन
झुलस चुकी हैं क्यारियाँ
चमन-चमन में धूम है कृतान्‍त कर रहा हवन।

इधर जो नीड़ों में विहग
भयार्त्‍त शावकों से लग
परों में घर छिपा रहे
कि तार-तार हो रही है डाल-डालियों की रग!

उधर मरुत्प्रहार से
प्रपूर्ण जलविकार से
हिलोरे क्षुब्ध अब्धि के
चले प्रचण्ड युद्ध के तुरंगों की कतार-से।

अनन्‍त में गड़े हुए
नयन-नयन जड़े हुए
चकित कि हो रहा है क्या
लगाते मेघ फेरियाँ, हवाओं पर चढ़े हुए।

कि तड़तड़ा उठी तड़ित्
दिगन्‍त हो उठे चकित
गिरा कहीं ज्वल्लसित
सुरेन्‍द्र का प्रचण्ड दर्प-दण्ड उग्रता-भरित।

घहर घनन्-घनन् घनन्
गगन के बज उठे भवन
भुवन में मौन छा गया
सिहर उठे धरा के रोम-रोम भीषिका-प्रवण।

समस्त सृष्‍टि-कल्पना
समस्त दीप्‍ति-ज्योत्सना
समस्त शौर्य-वीर को
लगा कि काठ मार गयी एक व्योम-भर्त्सना।

मुहूर्त्‍त-भर मही रही
प्रशान्‍त, ठगी-सी रही
जगे परन्‍तु शीघ्र ही
उदग्र चक्रवात और काँपने लगी मही

न जाने हो रहा है क्या
पुन: डुबो रहा है क्या
बिड़ौजा, वज्र-समान ही
धरा के ग्राम-ग्राम को, घनों की पंक्‍तियाँ सजा?

कि आग-सी लगी वहाँ
बसे हैं देवता जहाँ?
धुँए के गोल उठ रहे
घिरा है घटाटोप कृ

नया साल

बीत गया, लो! साल पुराना, नया साल फिर आया, साथी!
फिर पलकों के पुलिन पनीले, भाव-सिंधु लहराया, साथी! !

कितनी देर कहाँ बिरमे हम
कितना क्या पाया रंजोगम
कहाँ-कहाँ पर अपने दिल को
रोया किये, मनाया मातम
भूल जायँ भूलें जो भी कीं, दाग-दर्द जो पाया, साथी!
हम भूले हैं, जग भूला है, भूलों की यह काया, साथी! !

शूलों में संसार खिला है
शूलों में ही प्यार खिला है
जीत जिसे दुनिया कहती है
हारों का उपहार मिला है
डेग-डेग पर बिछी हुई है, यहाँ रूप की माया, साथी!
कहाँ-कहाँ क्या कहें कि हमको माया ने भरमाया, साथी!

जड़ तो जड़, जड़ता क्यों खोवे?
चेतन भी अचेत बन रोवे
जड़ता का यह भार विश्‍व
चाहता कि अब चेतन ही ढोवे
व्याप रही है चेतनता पर एक अचेतन छाया, साथी!
किस जादूगर ने जगती पर ऐसा जाल बिछाया, साथी!

नयी खोज का ज्ञान मिला है
ज्ञानी को विज्ञान मिला है
वैज्ञानिक को खोज-ढूँढकर—
प्रतिमा में पाषाण मिला है
अब तो सत्य वही, जो तर्कों से आकर टकराया, साथी!
जो न देखना कभी बदा था, ऐसा दृश्य दिखाया साथी!

एक साल, यह एक साल जो
बीत गया, यह विषमकाल, जो
गया, कयामत-सी बरपाकर
दुनिया का कर बुरा हाल यों
भूल सकेंगे क्या हम, इसने कैसा प्रलय मचाया, साथी!
भूल सकेंगे क्या हम, इसने क्या-क्या नाच नचाया, साथी!

कितने रौंदे गये देश, उफ्!
कितनों के लुट गये वेश, उफ्!
प्रकृति जहाँ इठलाती होती
अस्थि-भस्म हैं वहाँ शेष, उफ्!
दीन निहत्थों पर भी निर्मम बम्म गया बरसाया, साथी!
बच्चे, बूढ़े और युवतियों पर गोली की छाया, साथी!

‘शांति’ ‘शांति’ उसका भी स्वर है
जो अशांति का स्वयं निकर है
‘न्याय’ ‘न्याय’ उसकी पुकार है
स्वयं अनय पर जो तत्पर है
इस बीसवीं सदी ने, देखो, कैसा स्वांग रचाया, साथी!
सभ्यवेशधारी प्रपंच ने कैसा लोह बजाया, साथी!

प्राणों का बलिदान करें जन
युद्धों का यशगान करें जन
एक इशारे पर दिवान्‍ध बन
तन-मन-धन कुरबान करें जन!
यही शांति का स्रोत समझ बैठा है जग बौराया, साथी!
मानव के शोणित को मानव क पिशाच अकुलाया, साथी!

नभ अनभ्र अब आग उगलता
जलनिधि जन-जलयान निगलता
कोने-कोने में पृथ्वी के
धू-धू रण का पावक जलता
वज्र-वसुधा पर पुन: प्रलयवर्षी बादल घुमड़ाया, साथी!
क्या न करेगा त्राण हमारा फिर मोहन मनभाया, साथी!

क्या उपदेश दिया गौतम ने!
‘ तम का अंत किया तम ने?
वैर, वैर से कब जाता है? ‘
प्रीति-रीति क्यों खो दी हमने?
प्रियदर्शी का प्रेम-सँदेशा जग ने क्यों बिसराया, साथी?
क्यों शोणित के लिए, अकारण, मानव आज लुभाया, साथी!

पणता से आज आसमाँ।

पाटलिपुत्र के खंडहर से

हे गरिमा के विस्मृत प्रतीक!

अरमानों की मूर्च्छित समाधि!
विधुरा विभवश्री के सिँगार!
प्रभुता के ओ कंकाल-शेष!
नि: शेष कलाओं के मज़ार!
महिमा-मंडित मागध अतीत की सुप्त प्रगति, चिर–निर्व्यलीक!

कितने युग आये और गये
तुम पर कितनी क्या छोड़ छाप;
कितनों का सुख, कितनों का दुख
देखा है तुमने सपरिताप;
देखा है तुमने बर्बरता का सभ्य वेश, शासन अलीक।

पर, सच कहना, हे वृद्ध, कभी
क्या ऐसा ही था समय हाय!
जब आज सदृश था मगध-लोक
इतना दरिद्र, इतना अपाय?—
जन-जन जड़वत्, मन क्षत-विक्षत, जीवन प्रतिहत, सहते व्यलीक।

दाने-दाने को आज पड़े
लाले, बिललाते वृद्ध-बाल,
बस चटोरे चंटों के
अतिरिक्त बने सब ही कँगाल,
असमय चिन्ता-हिम से मुरझे यौवन-मानस-मुख-पुण्डरीक्।

तन-मन-जीवन प्रतिबद्ध वायु–
मंडल में आज विषाक्त बना,
खर-कूकर से भी हाय! हीन–
तर राम-कृष्ण का भक्त बना;
कुछ बोलो तो हे आर्य! मिटेगी कब, कैसे, यह नियति-लीक?

हो रहे विफल सारे प्रयास,
होता जाता बल-धैर्य क्षीण;
इस अंधतमस में भ्रान्त, पंथ
भी सूझ न पड़ता समीचीन;
तुम इतना तो बतला दो हे, है कौन सफलता-सरणी ठीक।

संकेत मात्र तुम दे दो, हे
अनुभवी, मगध के मौलि-मौर!
हमको बस आवश्यकता है
तुम ‘हाँ’ कह दो, बस कुछ न और;
हे साधु! विलोको, तत्पर हैं नवयुग के ये अगणित अनीक।

तुम तो सुनते हो अहोरात्र
सुरसरिता का वह स्वर-सँदेश
पाटली-पुत्र! रे सुप्त सिंह!
उठ, जाग, बचा पतयालु देश–
फिर भी, यह कैसा मौन? लाज-भय कैसा यह? हे चिर-अभीक!
जागो, ओ गरिमा के प्रतीक!

 

Share