रामचरित उपाध्याय की रचनाएँ

दोहा / भाग 1

शृंगार सुषमा

छत्र लगाये धनरिधर, बिहँसि बजावत वेनु।
बसौ हिये हरि हित-सहित, ग्वाल ग्वालिनि धेनु।।1।।

उर लगियत, परियत पगन, हौं ही करियत कान।
मौन गहौ मानौ कही, मैं न गही पिय मान।।2।।

कीजत इतौ न आतुरी, तजौ चातुरी चाल।
भावत घर रहनो न जौ, क्यौं आवत घर लाल।।3।।

दुरत न करत दुराव कत, अनत बसे जेहि हेत।
नयन नकारे देत हैं, आप नकारे देत।।4।।

केतिकहू सिख दीजियत, मन गहि मान सकैन।
होत पराये आपने, वा नैनन मिलि नैन।।5।।

तजहु सकुच उर निठुर उठु, अजहु तजी नहीं देहु।
नेक नवाजस करहु तौ, एव नवाजस लेतु।।6।।

प्रन न टरै तव, मम टरैं, प्रान-नाथ ये प्रान।
नभ घेरे आवहिं जलद, कीजे जलद पयान।।7।।

अलि मिस बोलि बुलाय कछु, हा साहस इतराय।
इतै चितै चट चोरि चित, लली चली यह जाय।।8।।

करि न दुराव दुरै न किहुँ, देहिं कहे रति रैन।
अलि साने मद बैन ये, ये अलसाने नैन।।9।।

मो तन तकि बतराय कछु, सखि सन सैनन माहिं।
छत से उतरि गई कहूँ, चित ते उतरत नाहिं।।10।।

दोहा / भाग 2

हँसि भौंइन लजि दृगन भनि, अधरन मैं इठलाय।
करिनी सी हिय-कमल दलि, चली नवेली जाय।।11।।

मानिनि भाव न भीतरी, गोइ सकति मुसकान।
बिनु कारन आदर अधिक, अधिक जनावत मान।।12।।

कित चितवत इत नेकु लख, उदित कला ससि दोज।
राजत मिस द्विजरात के, असि कर मनो मनोज।।13।।

पबि लगि मरनो औचके, बरुक लिखे बिधि खोट।
पै न लगै किहुं काहु को, अदब दबी दृग-चोट।।14।।

आवत ही घर भरि उठ्यो, बतरस लग्यौ न घात।
तदापि मिले दोउन खिले, पूछि दृगनि कुसलात।।15।।

घुँघरारी टुटि केस मुख, छहरि छयो छवि देत।
भ्रमत कोकनद भ्रम मनौ, अलि अवली मधु हेत।।16।।

पपिहा बारयौ तोहिं पै, हियो देत गहि नेहु।
हनि पाइन तिहिं ताहु पै, मेघ मोघ अघ लेहु।।17।।

कटि तनु भरे सुजंघ-जुग, सब तन भरे उमंग।
खिलत जवानी पाइ मनु, खिलत रहत से अंग।।18।।

रुकि न सकी आवत बन्यौ, तजि गुरु जन की भीति।
मोहि करी अति बावरी, खरी रावरी प्रीति।।19।।

कढ़ि आये तन सेद कन, पुलकि उठी उहिं काल।
पाती लखि पि

दोहा / भाग 3

सब विधि जो जैवो तुम्हैं, इतौ कपट केहि काज।
लावत उर हरखत हियैं, लावत उर नहिं लाज।।21।।

अधमीचे दृग पुलकित लजि, ज्यौं ज्यौं चौंकति बाल।
त्यौं त्यौं मलि मसकत रसिक, गालनि लाल गुलाल।।22।।

बिच नासा नग गवन यौं, गुथि नथनी छवि देत।
मनु मथनी मन मथ गही, मन मथिबे के हेत।।23।।

मिलि पिय सौं घूँघट न करु, सहमि न तू गहि मौन।
लगत सलोनो रूप लखि, सौतिन कै दृग लौन।।24।।

रिस साने दृग दुहुँन के, जदपि जुरे सगुमान।
तीख मान तिहिं छन दुर्यो, आई मुख मुसकान।।25।।

दृग दोउन के लड़त लखि, ज्यौं ज्यौं बढ़त चबाव।
त्यौं त्यौं रस सरसंत अधिक, नित नव प्रकटत भाव।।26।।

लखि लखाइ चख चीह्नि मुख, ठिठकी भई न ठाढ़ि।
लजी भजी बरबस यहै, लिये जाति जिय काढ़ि।।27।।

मीत-मिलन की चाह उर, जदपि बढ़त अति आज।
क्योंहूँ चलन न देत यै, अरी होत अरि लाज।।28।।

रंचक नहिं हिचकी हिये, आवत जात निसंक।
लागन चहत न अंक पै, लागन चहत कलंक।।29।।

केतिक हूँ काँटन घिरी, सुन केतकी प्रवीन।
क्यों हूँ तदपि कलीन के, तो रस तजै अलीन।।30।।

य-कर-लिखी, छाती छ्वावत बाल।।20।।

दोहा / भाग 5

तप बल गरब न कीजिये, बरु करिये तप नाहिं।
गाधि-सुअन लखि मेनका, दौरि गहे गर माहिं।।41।।

धरम-विमुख, खर, स्वान, अहि, कृपन, कुमीतरु राँड़।
दूरहि ते दस बरजियै, उनमत भडुआ, भाँड़।।42।।

दुर्लभ सो नर जगत में, मानव कुल सिंरनेत।
जो बिनु मागे ही रहे, जो बिनु माँगे देत।।43।।

पतिबरता, अरु पुत्रिणी, पाक-प्रवीन पवित्र।
रूपवती पण्डित तिया, दुरलभ ‘राम चरित्र’।।44।।

सुख सपनो, दुख दुुगुन नित, आँतर दिन उपवासु।
भोगत नरक सदेह सो, गेह कुनारी जासु।।45।।

नृप, ज्ञानी, तिय प्रौढ़, रस-काव्य, सिखायो अस्व।
चारहुँ ते जुग चारिहूँ, पैयत सुख सर्वस्व।।46।।

नारी गृह भूखन बसन, नूतन रहे बखान।
दास वैद मन्त्री महिप, तन्दुल पान पुरान।।47।।

मरन-हरन सुनि होय जो, पण्डित हू हिय खेद।
तौ ज्ञानी अरु मूढ़ में, कछुक रह्यौ नहि भेद।।48।।

गुरु अन्त्यज, ब्राह्मण निपढ़, बूढ़ गृही, यति ज्वान।
रसिक-अधन, तपसी धनी, षट दुख हेतु समान।।49।।

नहिं कोऊ ऐसो कहूँ, जाको रिपु जग माहिं।
मीन कहा केहिको दुखद, हने जाहिं जल माहिं।।50।।

 

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