रेणु मिश्रा की रचनाएँ

नितान्त अकेली

पहले जब तुझे जानती नहीं थी
सुनती थी तेरी हर एक बात
तेरे इशारों पर चला करती थी
जो कहना मानती थी तेरा
तो खुश रहने जैसा लगता था
ओ मेरी रूह,
कितना दबाव था तेरा मुझ पर

लेकिन एक दिन
मैं हो गयी विद्रोही
लोग मनमन्नी कहने लगे
तुझे जानने की कोशिश में
पहचान गयी खुद को
उपदेशों के सांकलों में बाँध के
कोशिश भी की तूने रखने की
मगर मैंने एक ना सुनी
सारी रिवाज़ें रवायतें तोड़ भाग निकली
दुखता था दिल
कांपता था शरीर
दफ़्न होती जाती थी धड़कनें
मगर मैं भागती रही
नापती रही साहस के पहाड़ों को
तैरती रही दरिया के रौ के विरुद्ध
और छिपाती रही खुद को
बस अपने लिए खोज के निकाले गए
समय के घने वीरान जंगल में

मैं जान रही थी कि
तू खोज रही होगी मुझको
लेकिन मैं जानती हूँ ना
कि मैं कहाँ पाना चाहती थी तुझको
अब ना तेरे सुख का कोई गीत
या विचारों की प्रतिध्वनि
मुझ तक पहुँचती है
और ना तेरे विश्वास की कोई कड़ी
या नियम की कोई ज़ंजीर
मुझे गहरे तक जकड़ती है
तुझे खुश रखने की आकांक्षा भी
अब कहाँ बची है मुझमें?
अब मैं भगोड़ेपन के सुकून में जी रही हूँ
अलमस्त, बेलाग, नितांत अकेली!!

भूख का कटोरा

आज कल चिता की आंच पर
पकते हैं कितने भूखे किसान
जो बोते हैं तड़पती भूख के बीज को
धरती के उमसते आंवें में
चढ़ाते हैं धधकते सूरज को जल
करते हैं इंद्र से प्रार्थना
कि बारिश की नर्म बूंदों से
खिल जाये सुनहरी गेंहू की बालियां
मगर उन्हें नहीं पता
कैसे मनाये समय के कुचक्र को
जो भरने नही देता
उनके अनाज की कोठली
उड़ा देता है सर से
गिरवी पड़ा आस का छत्तर
छोड़ जाता है नादान भूखे हाथों में
कुलबुलाता खाली दूध का कटोरा
और चूल्हे की सोई आंच के पास
औंधी पड़ी हुई देकची
अब तो परमात्मा भी नहीं आते
देकची में पड़े एक दाने से
भूखों का पेट भरने!
पर धरती का पूत भूखा रहके भी
नहीं देख पता अपने आस पास
आँखों में लिलोरती भूख
तंग आकर समय के खेले से
खुद ही लगा लेता है फाँसी
या चढ़ा लेता है खुद को
चिता के धधकते चूल्हे पर
भूख मिटाने की चाह में
मिटा लेता है खुद को
पर चिता की भूख है कि
कभी मिटती ही नहीं!!
अब भूख के कटोरे में दर्द भी है!

समझदारी

दुनिया में दिल अज़ीज़ होने के लिए
समझदारी की नयी तहजीब सीखो
जब भी किसी से मिलो
बत्तीसी का इस्तेमाल बेहिसाब करो
कभी हाथ पकड़ के,
तो कभी गले लगा के बात करो
लोगों की हाँ में हाँ मिलाने के लिए
गिरगिटी फितरत के अनुसार रंग बदलो
दिखावे की नकली दुनिया को है
केवल दिखावे में विश्वास
सकुचा के चुप रह जाने से,
या केवल मुस्कुरा भर देने से,
समझ लिए जाओगे दंभी और खड़ूस
समझदार कहे जाने वाले लोग,
गले ना उतरने वाली बात को भी
मन की हांडी में पका ही लेते हैं
चाहे भीतर ही भीतर सुलग रहे हों
और जलन बेइन्तहां मची हो
लेकिन उठने नहीं देते मन से धुंआ
पानी की तरह बह रहे ठंडे लहू से
दाब देते हैं मन की कलुषता
उभार लाते हैं चेहरे पर
उजली, करारी, ठहाकेदार हंसी
दिखावटी दुनिया, इसे ही तो मानती है
मिलनसार होने की निशानी
आज की दुनिया में
सबसे बना के चलने को कहते है
सबसे बड़ी ‘समझदारी’!!

खुशबुओं का सफ़र

खुशबुएँ, जो रचती हैं
स्मृतियों का अपरिमित संसार
अपने महसूस होने के बहाने से
करा जाती हैं
उन कालखंडों का आभास
जिन के बीच से गुज़रते हैं
जीवन के वो पहलु
जो अब अपने दरमियाँ नहीं है
वो हिलोरती हैं बचपन का वो लम्हा
जो अब भी बंद है
स्कूल के ख्वाबी दिनों में
जब अपने घर को लौटते थे
बस्तों में छुपा कर
गुलमोहर की खुशबु
जिन्हें किताबों में तब छुपाया था
जब दोपहर की धूप में वो
बदलते वक़्त की गिरा जाती थी टुनगी
फिर वो खुशबू तब्दील हो जाती
जवां हाथों की हिना में
बांधे हुए काकुलों के गुलों में
फिर बिखर के मिल जाती है
खिलती-बिखरती हुई साँसों में डूबी
मोहब्बत की खुशबु में
जाने कितने अजनबी लम्हों को
अपने अहसासों में जज़्ब करते हुए
उम्र की बियाबानों गुज़रते हुए
जब महुओं से टपकती थी
ढलती उम्र के एहसासों के रेशे
इल्म हो जाता था
ज़िन्दगी अब मौत से ज़्यादा दूर नहीं
मैं बदल जाती हूँ रूह की एक खुशबु में
बिलकुल खुशबु की ही तरह आज़ाद
रचूंगी फिर से खुद को
नयी खुशबुओं की सोंधी मिट्टी से

 

बाइज़्ज़त बरी

आसमानी स्लेट पर
चाँद की दुधिया स्याही से
तुम्हारी हर वो बात लिखना चाहती हूँ
जो कहीं दिल में घर कर गयी
या लिख देना चाहती हूँ
मेरी जुबां पर अटकी हर वो बात
जो धडकनों के बीच
कसमसा के दम तोड़ गयी

लिखना चाहती हूँ वो ताल्लुकात
जो तुम्हारे मेरे बीच
‘कुछ तो है’ का फलसफा कहते हैं
जो तुम्हारे मेरे दरमियाँ
अनाम से रिश्ते की बुनियाद रखते हैं

तुम्हें चाहने की बेखुद-सी तस्सली
और ना पाने की ना-उम्मीदी सुकून
दिल में बेचैनी भर कर रखता है
तुम्हारे ना होने पर भी
मुझमे ज़िन्दा रहने की
ख्वाहिश भरता है

आखिर क्यों करते हो ऐसा
कि दिल करता है
तुम्हारे बेगुनाह से गुनाहों की
फेहरिस्त को सरेआम कर दूँ
और सबसे नीचे
डिफाल्टर के तौर पर
केवल तुम्हारा नाम लिख दूँ

बस डर लगता है
कहीं तुम्हे मुल्ज़िम साबित करने की
नाक़ाम कोशिश में
दुधिया स्याही ख़त्म ना हो जाए
और तुम बिना किसी वकालत के
मेरे प्यार भरे इल्जामों से
बाइज्ज़त बरी ना हो जाओ!!

रेतीला मन

जब घेरता है,
अकेलेपन का अँधेरा
तो इस घने, अपनेपन की दुनिया से
कोई टिमटिमाते आस का दीपक ले
रास्ता नहीं दिखाता
ना ही कोई युक्ति और ना मुक्ति
टिक पाती है हाथों की चलनी में
बार-बार जी में आता है
कि दुनिया का कारोबार छोड़
कहीं दूर भाग जाएँ
किसी पहाड़ की दुरूह चोटी पर
या
मन की निचली गहरी खाई में
छुप जाएँ किसी आदम काल की गुफा में
जिसमे बिच्छुओं का ज़हर
इंसानी जहर की सांद्रता से कम हो
या बहते जाएँ नदियों के बीचों बीच
जाने पहचाने माजी के किनारों से बचते हुए
बह जाएँ समंदर के अथाह लहरों पर
जो स्मृतियों के बक्से को गड्ड-मड्ड कर
बहा दे लोभित करते चिन्हों को
और छोड़ आये हम आवारा आत्माओं को
किसी सुनसान निर्जन टापू पर
उस निर्जन सुनसान टापू पर
मन खोजे फिर संवेदनाओं का नया भूगोल
रचे रंग बिरंगे संवादों की नयी दुनिया
अंतर्मन के खारे पानी के सोतों से
भर लाये ताज़े मीठे पानी की झीलें
तलाशे अनसुलझे भावों की कंदराएँ
जहाँ लिखी जाये प्रेम की कोई नयी ऋचा
जिनको सुन खिल उठे
थार की चुप्पी सा पसरा रेतीला मन
और उग आये
कैक्टस से जीवन में,
मुस्का

विस्थापन

अपनी धरती पर ही
विस्थापन का दंश सहता
काले कीचट कपड़ों में लिपटा
कोयला निकालता आदमी
खोजता है
अमावस की रात सी अंधेरी खदान में
पूर्णिमा के चाँद सा गोल
रोटी का टुकड़ा
कमज़ोर हाथों से करता है
बार-बार हथौड़े की चोट
धरती के सीने पर
क्योंकि उसे याद आता है
भूख से बिलबिलाते अपने बच्चों का चेहरा
जिनके पेट में दहक रही है
सदियों से जलती कोयले की अंगीठी
लेकिन बस, नहीं है तो
अदहन देने के लिए मुठ्ठी भर अनाज
दिन भर की मेहनत के बाद
मिलती है उसे
पलकों पर झर-झर के उतरती
कोयले की धुंध वाली सफ़ेद साँझ
और, उसके हाथों पर रख दी जाती है
लाचार सी आधी-पौनी दिहाड़ी
जो अपने मालिक से
जिरह करने में भी सहमती है
काले कोयले के काले धन से
उजले हो जाते हैं सफ़ेदपोश
और छोड़ जाते हैं
कोयले की कालिख
उसके हाथों की लक़ीरों में
धरती की गोद में जाकर भी
भूखा ही रहा आदमी!!

न के गुलाबी फूल!!

 

 

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