रेवंत दान बारहठ की रचनाएँ

सूरज को न्‍योता

यह ​वक्‍त – एक ​सियाह रात​ है
रात जो ब​हुत डरावनी ​है
इस रात के स​न्‍नाटे में असहनीय है
​उल्‍लूओं और सियारों का ​शोर ।
इस रात ​में जागे और सोये ​हुए
सबके ​दिलों में अँधेरा है
इस अँधेरे ​में
देखी न​हीं किसी ने ​किसी ​की ​शक्‍ल
यहाँ धुँधलका ही रो​शनी का प​र्याय है।
इस ​दु‍निया के लोग उजा​ले से अनजान ​हैं
इस ​दुनिया के लोग सच से अनजान ​हैं
इस दुिनया ​में रोशनी​ का जिक्र भी न​हीं हुआ
ओ सूरज! तुमको इस ​वक्‍त का ​न्‍योता ​है
अब आना पडेगा यहाँ
ता​कि इस ​दुनिया के वा​शिंदे जान स​कें
​कि उजा​लों का सच ​कितना असीम होता ​है।

जीवन समर

यह समय है
जीवन समय के प्रयाण का
अस्तित्व पर उठती हुई अंगुलियाँ
चहुँ ओर चीखती हुई चुनौतियाँ
अगर सुन सको तो सुनो!

माना कि तुम सर्वाधिक योग्य हो
पर अपाहिज अयोग्यताएँ
तुम्हें ललकारे और ताने मारे
तो यह सही समय होता है
उनको ज़वाब देने का
कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा
तुम्हारे उठने से
पर हाँ ! ध्यान रखना
मायूस कर दोगे कई हक़दारों को
कुंठित कर दोगे कई ऊर्जाओं को
पुरूषार्थ की कसौटी पर
युग जब भी न्याय करेगा
अकर्मण्यता को माफ नहीं करेगा
इससे पहले कि युग तुम्हें धिक्कारे
और गूँजे गगन में अयोग्यों के नारे
इससे पहले कि
तुम पर अट्टहास करे
बैसाखियों वाले सहारे
तुम्हें उठना होगा
तुम्हें चलना होगा
तुम्हें जूझना होगा
तुम्हें जितना होगा
विजय की जयमाला
कर रही है इंतज़ार तुम्हारा।

जीवन समर की रणभेरियाँ
कायरों का नहीं
योद्धाओं का स्वागत करती है

योद्धा

जूझना झेलना और सहना
जाने क्या-क्या लिखा था
जीवन के इस समर में
लड़ना ही बदा था
पग-पग पर थीं परीक्षाएँ
बड़ी मुश्किल थी राहें
हर कदम पर कड़ी धूप थी
न रुका न झुका,
न टूटा न बँटा।
काल ने लिखी क्रूरता से
नियति की अज़ब कहानी
अक्षर-अक्षर अबखाई
पृष्ठ-पृष्ठ था पीड़ादायी
जो बाँचे उसी की रूह काँपे
पर उसी से गुजरना था
न हारा,न उदास हुआ
न रोया,न रोने दिया।

कई बार गिरा,गिरकर उठा
और ख़ुद को समझाया
है कौन यहाँ जो गिरा नहीं
संताप संकटों से घिरा नहीं
संघर्ष की लौ को जलाया
वही मंज़िलों के क़रीब आया
जो झुका नहीं,जो रुका नहीं
जो टूटा नहीं,जो बँटा नहीं
जीवन समर में वही सच्चा योद्धा कहलाया।

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सत्‍य

 

जब इंसान से इंसान किनारा करने लगे
और डरने लगे आदम की ज़ात ख़ुद से
झूठ कपट के व्यापार और बेईमानी के बीच
जब खुले आम विश्वास ठगा जाए
जब धर्म कर्म से लजाने लगे और कर्म कायरों से
ऐसे विकट समय में पृथ्वी पैदा करती है
अपनी कोख में छुपाया हुआ अनमोल बीज
मसीहा सत्य का आता है इसी तरह
जिसका कोई सगा नहीं होता
जिसको सताया जाता है हर बार
सत्य की जिसकी ख़ातिर
यीशु चढ़ गए सूली पर,
जहर पिया सु​​करात ने
आग से आलिंगनबद्ध हुआ ब्रूनो,
अपने सीने पर गोली खा गए गाँधी।
तारीख़ के पन्ने पलटो तो पता चलेगा
कि साँच को कोई आँच नहीं आई आज तक
आकाश,अग्नि,जल,पृथ्वी और हवा के दरम्यान
सच था, सच है और सच रहेगा।

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