रेहाना रूही की रचनाएँ

दिल को रह रह के ये अंदेश डराने लग जाएँ

दिल को रह रह के ये अंदेश डराने लग जाएँ
वापसी में उसे मुमकिन है ज़माने लग जाएँ

सो नहीं पाएँ तो सोने की दुआएँ माँगें
नींद आने लगे तो ख़ुद को जगाने लग जाएँ

उस को ढूँढे उसे इक बात बताने के लिए
जब वो मिल जाए तो वो बात छुपाने लग जाएँ

हर दिसम्बर उसी वहशत में गुज़ारा कि कहीं
फिर से आँखों में तिरे ख़्वाब न आने लग जाएँ

इतनी ताख़ीर से मत मिल कि हमें सब्र आ जाए
और फिर हम भी नज़र तुझ से चुराने लग जाएँ

जीत जाएँगी हवाएँ ये ख़बर होते हुए
तेज़ आँधी मंे चराग़ों को जलाने लग जाएँ

तुम मिरे शहर में आए तो मुझे ऐसा लगा
जूँ तही-दामनों के हाथ ख़

जुनून-ए-इश्क़ में सद-चाक होना पड़ता है

जुनून-ए-इश्क़ में सद-चाक होना पड़ता है
इस इंतिहा के लिए ख़ाक होना पड़ता है

किसी से जब कभी हम ज़िंदगी बदलते हैं
तो फिर बदन की भी पोशाक होना पड़ता है

ज़मीं पे ख़ाक-नशीनी का वस्फ़ रखते हुए
कभी कभी हमें अफ़्लाक होना पड़ता है

अगर मैं डूबी उसे साथ ले के डूबूँगी
मोहब्बतों में भी सफ़्फ़ाक होना पड़ता है

हवा के साथ मोहब्बत के धूप-सहरा में
गुलों को भी ख़स ओ ख़ाशाक होना पड़ता है

बिसात-ए-वक़्त की चालें समझ सकें ‘रूही’
कम-अज़-कम इतना तो चालाक होना पड़ता है

ज़ाने में लग जाएँ

कौन कहाँ तक जा सकता है

कौन कहाँ तक जा सकता है
ये तो वक़्त बता सकता है

इश्क़ में वहशत का इक शोला
घर को आग लगा सकता है

जज़्बों की शिद्दत का सूरज
ज़ंजीरंे पिघला सकता है

तेरी आमद का इक झोंका
उजड़ा शहर बसा सकता है

आईने में जुरअत हो तो
अक्स भी सूरत पा सकता है

आँखों में ठहरा इक मंज़र
राह में गर्द उड़ा सकता है

तुझ को पैहम सोचने वाला
ख़्वाब को हाथ लगा सकता है

 

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