मनीष कुमार झा की रचनाएँ

प्रेम

बाँधो नहीं प्रेम शब्दों में
प्रेम खुला स्वर, लय है

प्रेम साधना की वेदी है
प्रेम भक्ति है, पूजा है
प्रेम चंद्र की शुभ्र किरण है
भाव न इससा दूजा है
प्रेम वासना-गंध रहित है
प्रेम राग मधुमय है

प्रेम बाँटता नहीं गरल, बस
प्रेम सुधा बरसाता है
प्रेम आर्त दीनों के मन की
पीड़ा हरता जाता है
प्रेम लालिमा अरुणोदय की
यह मधुरस संचय है

प्रेम सदा ही जीवन में नित
नव-नव ज्योति जलाता है
प्रेम हृदय के उपवन में नित
नव-नव पुष्प खिलाता है
प्रेम चेतना की सुगंध है
प्रेम मुक्त किसलय है

जीव धरा के, देव स्वर्ग के
सबने ही है प्रेम किया
प्रेम प्रवाहित कल-कल सी है
प्रेम सतत बहती नदिया
प्रेम अखंडित दिव्य

छेड़ दी बात किस जमाने की

छेड़ दी बात किस जमाने की
बात होती कहाँ निभाने की

साफ़ कहता है उसका इतराना
हाथ चाभी लगी खजाने की

सबने अपने गुरूर पाले हैं
बात होगी न अब ठिकाने की

क्यों दिखाता है आईना उसको
उसकी आदत है रूठ जाने की

उसने पहरे बिठा दिए, जिस पर
राह अपनी है आने-जाने की

खाए जिससे हजार धोखे ही
सोचता हूँ कि आजमाने की

जो भी कहना है साफ़ कह देंगे
क्या जरूरत किसी बहाने की

भाव है
प्रेम अमर, अक्षय है

 

दोहे

विकट आपदा आ पड़ी, हाय!लगा आघात।
चोट खा गयी उंगलियाँ, जख्मी हैं जज्बात।।

प्रश्न पत्र है जिंदगी, जस की तस स्वीकार्य।
कुछ भी वैकल्पिक नहीं, सभी प्रश्न अनिवार्य।।

जीवन सारा खो गया, करते रहे विलास।
बिना प्रेम रस के चखे, किसकी बुझती प्यास।।

हमको यह सुविधा मिली, पार उतरने हेतु।
नदिया तो है आग की, और मोम का सेतु।।

सुख सुविधा के कर लिये, जमा सभी सामान।
बोल न आते प्रेम के, बनते हैं धनवान।।

चाहे मालामाल हो चाहे हो कंगाल।
हर कोई कहता मिला, दुनिया है जंजाल।।

राजनीति का व्याकरण, कुर्सीवाला पाठ।
पढ़ा रहे हैं सब हमें, सोलह दूनी आठ।।

मन से जो भी भेंट दे, उसको करो कबूल।
काँटा मिले बबूल का, या गूलर का फूल।।

सागर से रखती नहीं, सीपी कोई आस।
एक स्वाति की बूँद से, बुझ जाती है प्यास।।

जेठ

आतंकी इस जेठ का, मचा हुआ आतंक।
हमला सब पर बोलता, राजा हो या रंक।।

ताप समाया हर जगह, बची नहीं तहसील।
धीरे-धीरे सूखती, संबंधों की झील।।

खाकर चाबुक ग्रीष्म का, सिसक रही है रात।
आए पावस तो जरा, ठंडे हों हालात।।

मानसून की आहटें, शीतल बहे बयार।
मौसम मलमल-सा हुआ, पा मदमस्त फुहार।।

धूप सुहाता ही नहीं, जबसे आया जेठ।
धूप छोड़ कर जोड़ते, सभी छांव से गेठ।।

खड़ा ग्रीष्म बाजार में, भाव खा रही धूप।
सूरज से सब चाहते, जाड़े वाला रूप।।

गाय-भैंस व्याकुल हुए, कुत्ते भी बेचैन।
हाँफ रहा बूढ़ा वृषभ, सूखे दोनों नैन।।

रह-रह कोयल हूकती, दर्दीली-सी तान।
सूख गया रस खेत का, मूर्छित हुआ किसान।।

बरसे जल बौछार तो, भींगे तन-मन प्राण।
ग्रीष्मकाल को चाहिए, शीतलता का दान।।

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