राकेश प्रियदर्शी की रचनाएँ

एक बार फिर मुस्कुराओ बुद्ध

हे बुद्ध!
इस समकालीन परिदृश्य में,
जब फट रही है छाती धरती की
पसर रही है निस्तब्धता
आकाश के चेहरे पर,
कहां हो तुम? आओ बुद्ध!
एक बार और मुस्कुराओ बु्द्ध

तुम्हारे आने व मुस्कुराने से,
जन-मन मंगल होगा,
धरती की गोद हरी-भरी हो जायेगी
और झूमने लगेगा सम्पूर्ण जीवमंडल

जगमगाते सितारों को बाहों में समेट कर,
तुम्हारे आने से फिर लिखा जायेगा
एक नया इतिहास और बनेगी
दया-करुणा की एक नयी संस्कृति
जहां खून से रंगे
असमानता की कहर बरपाती दीवार
नहीं होगी,
चलेंगे लोग प्रीति के साथ
तुम्हारे बताये मार्ग पर

चारों दिशाओं में गूंजेगी
एक बार फिर वही प्रतिध्वनि –
बुद्धं – शरणम् – गच्छामि
धम्मं – शरणम् – गच्छामि
संघं – शरणम् – गच्छामि

सांप

बिल्कुल बहरा होता है सांप
किसी की नहीं सुनता है वह

इस लोकतन्त्र में
कुछ भी नहीं सुनाई देता है उसे

सबको काटता है वह,
पर खाता है केवल बेबस और निरीह को

सांप सब कुछ स्पष्ट देखता है,
पर चुप्पी साधे रहता है

रेंगनेवाला सांप से ज्यादा खतरनाक होता है
दौड़ने और उड़नेवाला सांप

काला नाग से भी ज्यादा खतरनाक होता है,
सफेद सांप
और चार टंगवा से ज्यादा खतरनाक होता है,
दू गोरवा सांप

कितना भी पिलाओ दूध, वह काटेगा ही
जहरीले होते हैं अधिकांश सांप

अपनी धुन पर दुनिया को नचाता है वह,
और स्वयं तमाशा देखता रहता है

कहाँ नहीं है सांप?
हर जगह फण काढ़ कर बैठा है

केवल कुर्सी की सुनता है सांप
और किसी की नहीं सुनता

जहां जितनी बड़ी कुर्सी, वहां उतना बड़ा
होता है सांप

सांप की पूजा होती है इस देश में,
बड़ी महिमा है सांप की!

एक युग का अवसान भी

बच्चा माँ-बाप के लिए
सिर्फ कलेजे का टुकड़ा नहीं,
आंखों का तारा भी होता है

हँसता-खिलखिलाता, खेलता-कूदता बच्चा
सिर्फ घर का महमह फूल ही नहीं होता,
माँ-बाप की जिन्दगी भी होता है बच्चा

निठारी में या दंगों में बच्चा
जब भी मारा जाता है तो
माँ-बाप का सिर्फ कलेजा ही नहीं फटता
आँखों के कोर से खून के आँसू भी बहते हैं

काली व्यवस्था वाले रंगों में
सफेदी की ओर से लाख मुआवजे
की घोषणाओं का हो चमत्कार
इस तरह की मौत का कोई मुआवजा नहीं होता

मेरे दोस्त! किसी बच्चे की मौत
सिर्फ मौत नहीं होती,
एक इतिहास की भी मौत होती है,
मौत होती है एक सपने की भी,
एक भविष्य की भी मौत होती है,
एक युग का अवसान भी होता है

सोने की चिड़िया और प्रवासी पक्षी

सोने की चिड़िया कहे जानेवाले देश में
सफेद बगुलों ने आश्वासनों के इन्द्रधनुषी
सपने दिखाकर निरीह मेमनों की आंखें
फोड़ डाली हैं

मेमने दाना-पानी की जुगाड़ में व्यस्त हैं.
सफेद बगुले आलीशान पंचतारा होटलों
में आजादी का जश्न मना रहे हैं

प्रवासी पक्षियों के समूह सोने की चिड़िया
कहे जाने वाले देश के वृक्षों पर अपने घोंसले
बना रहे हैं और देशी चिड़ियों के समूह
खाली वृक्ष की तलाश में भटक रहे हैं

कुछेक साल देशी चिड़िया को लगातार सौंदर्य
का ताज पहनाया गया और प्रवासी पक्षी
अपना स्थान बनाने की खुशी में गीत गुनगुना रहे हैं

वृक्ष पर बैठे प्रवासी पक्षियों की बीट से
पुण्य भूमि पर पाश्चात्य गंदगी फैल रही है
विश्व गुरु कहे जानेवाले देश में गुरु पीटे जा रहे हैं
और चेले प्रेमिकाओं संग व्यस्त हैं
शिक्षा व्यवस्था का बोझ गदहों की पीठ पर
लाद दिया गया है

अपने निहित स्वार्थ के लिए सफेद
बगुले लगातार देश को बांटने की साजिश में लगे हैं
देश जितना बंटेगा कुर्सियां उतनी ही सुरक्षित होंगी

महाभारत आज भी जारी है
भूखे-नंगे लोग युद्ध क्या करेंगे, मारे जा रहे हैं
बिसात आज भी बिछी है
द्युत खेला जा रहा है ‘कौन बनेगा करोड़पति’
जैसे टीवी सीरियल देखकर बच्चे ही नहीं,
तथाकथित बुद्धिजीवी भी फोन डायल कर रहे हैं

हवा में तैर रहा है बिना परिश्रम के
करोड़पति बनने का सवाल –
प्रवासी पक्षी अगली सदी तक कितने अण्डे देंगे?

नदी

(1)

वह नदी की आंखों में डूबकर
सागर की गहराई नापना चाहता था
और आसमान की अतल ऊंचाइयों में
कल्पना के परों से उड़ान भरना चाहता था,
पर वह नदी तो कब से सूखी पड़ी थी,
बालू, पत्थर और रेत से भरी थी

(2)

वह कैसी नदी थी जिसमें स्वच्छ जल न था,
न धाराएं थीं, न प्रवाह दिखता था,
वहां सिर्फ आग ही आग थी

(3)

नदी थी तो दुःख का विस्तार था,
वहाँ पानी नहीं, हर तरफ हाहाकार था

(4)

नदी की आँखों में आंसुओं की धारा थी,
उसकी आंखों में भी आंसुओं की धारा थी,
एक धारा का दूसरे से इस तरह नाता था
कैसे कह दूं कि वहां जीवन न था

कागज बीनता बच्चा

कूड़े के ढेर से काग़ज़ बीनता बच्चा
पूरा का पूरा हिंदुस्तान की जीती-जागती तस्वीर है
काग़ज़ बीनता बच्चा हमारी वर्तमान व्यवस्था
की पोल खोल रहा है

उसके फटे-चीटे कपड़े देख कर भी हम
स्वच्छ और विकसित होने की कर रहे हैं
घोषनाएँ अगले दशक के अंत तक

उसकी भूख से सटी हुई आँतों और गालों पर
सूखे हुए आँसुओं के निशान से
हम लिख रहे हैं भारत का इतिहास

कूड़े के ढेर से काग़ज़ बीनता बच्चा
बाजार के विरुद्ध एक चीख़ है

हम कर रहे हैं जिस कूड़े के ढेर से घृणा
वही उसका सपना है
भारत का सपना
भारत का भविष्य और कूड़े का ढेर !

कूड़े के ढेर से काग़ज़ बीनता बच्चा
कूड़े के ढेर पर सफ़ेदी की ऊँचाई नाप रहा है अपनी आँखों से
कूड़े के ढेर की खोज में भटकता बच्चा
कोसों नंगे पाँव चलता है पीठ से बोरा लटकाए
बोरे के वज़न में उसके पूरे परिवार की
रोटी की संख्या छिपी है
कहाँ-कहाँ नहीं कूड़े के ढेर से मिलती है
उसे रोटी की गंध !

कूड़े के ढेर से काग़ज़ बीनते बच्चे के बारे में सोचता हूँ
यह हम सब पर निर्भर करता है कि वह
भविष्य का निर्माता बनेगा या विध्वंसकारक

इतिहास

सदियों से उस बंजर जमीं पर
पानी, खाद डालने के बदले
राख, बालू और पत्थर डाला गया,
बन गया वह विशाल, शांत पहाड़

सैकड़ों वर्षों से वह सूरज की
साजिश का शिकार रहा,
अंधेरे में तड़पता, घुटता रहा,
सैकड़ों वर्षों से उस शांत पहाड़ में
अरबों टन आग का गोला जमा है

रोशनी में रहनेवालों
उस अंधेरे में रोशनी जाने दो,
नहीं तो सदियों से मौन रहता आया
वह ज्वालामुखी मुखर विस्फोट कर जायेगा
अपनी आग से जला जायेगा

सदियों की शांति जब भंग होती है
तो आकाश के पृष्ठ पर भी क्रान्ति
का इतिहास बना जाती है

 

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