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‘बाकर’ मेंहदी की रचनाएँ

अब ख़ानमाँ-ख़राब की मंज़िल यहाँ नहीं

अब ख़ानमाँ-ख़राब की मंज़िल यहाँ नहीं
कहने को आशियाँ है मगर आशियाँ नहीं

इश्‍क़-ए-सितम-नवाज़ की दुनिया बदल गई
हुस्न-ए-वफ़ा-शनास भी कुछ बद-गुमाँ नहीं

मेरे सनम-कदे में कई और बुत भी हैं
इक मेरी ज़िंदगी के तुम्हीं राज़-दाँ नहीं

तुम से बिछड़ के मुझ को सहारा तो मिल गया
ये और बात है के मैं कुछ शादमाँ नहीं

अपने हसीन ख़्वाब की ताबीर ख़ुद करे
इतना तो मोतबर ये दिल-ए-ना-तवाँ नहीं

जुल्फ़-ए-दराज़ क़िस्सा-ए-ग़म में उलझ न जाए
अंदेशा-हा-ए-इश्‍क कहाँ हैं कहाँ नहीं

हर हर क़दम पे कितने सितारे बिखर गए
लेकिन रह-ए-हयात अभी कहकशां नहीं

सैलाब-ए-ज़िंदगी के सहारे बढ़े चलो
साहिल पे रहने वालों का नाम ओ निशां नहीं

और कोई जो सुने ख़ून के आँसू रोए

और कोई जो सुने ख़ून के आँसू रोए
अच्छी लगती हैं मगर हम को तुम्हारी बातें

हम मिलें या न मिलें फिर भी कभी ख़्वाबों में
मुस्कुराती हुई आएँगी हमारी बातें

हाए अब जिन पे मुसर्रत का गुमाँ होता है
अश्‍क बन जाँएगी इक रोज़ ये प्यारी बातें

याद जब कोई दिलाएगा सर-ए-शाम तुम्हें
जगमगा उट्ठेंगी तारों में हमारी बातें

उन का मग़रूर बनाया है बड़ी मुश्किल से
आईना बन के रहें काश हमारी बातें

मिलते मिलते यूँ ही बे-गाने से हो जाएँगे
देखते देखते खो जाएँगी सारी बातें

बो बहुत सोचें तड़प उट्ठीं मगर ऐ ‘बाक़िर’
याद आईं तो न आईं ये तुम्हारी बातें

बदल के रख देंगे ये तसव्वुर के आदमी का वक़ार क्या है

बदल के रख देंगे ये तसव्वुर के आदमी का वक़ार क्या है
ख़ला में वो चाँद नाचता है ज़माँ मकाँ का हिसार क्या है

बहक गए थे सँभल गए हैं सितम की हद से निकल गए हैं
हम अहल-ए-दिल ये समझ गए हैं कशाकश-ए-रोज़गार क्या है

अभी न पूछो के लाला-जारों से उठ रहा है धुवाँ वो कैसा
मगर ये देखो के फूल बनने का आरजू-मंद ख़ार क्या है

वही बने दुश्‍मन-ए-तमन्ना जिन्हें सिखाया था हम ने जीना
अगर ये पूछें तो किस से पूछें के दोस्ती का शेआर क्या है

कभी है शबनम कभी शरारा फ़लक से टूटा तो एक तारा
ग़म-ए-मोहब्बत के राज़-दारों ये गौहर-ए-आबदार क्या है

बहार की तुम नई कली हो अभी अभी झूम कर खिली हो
मगर कभी हम से यूँ ही पूछो के हसरतों का मज़ार क्या है

बईं तबाही दिखाए हम ने वो मोजज़े आशिक़ी के तुम को
बईं अदावत कभी न कहना के आप सा ख़ाक-सार क्या है

बने कोई इल्म ओ फ़न का मालिक के मैं हूँ राह-ए-वफ़ा का सालिक
नहीं है शोहरत की फ़िक्र ‘बाक़िर’ गज़ल का इक राज़-दार क्या है

चाहा बहुत के इश्‍क़ की फिर इब्तिदा न हो

चाहा बहुत के इश्‍क़ की फिर इब्तिदा न हो
रूसवाइयों की अपनी कहीं इंतिहा न हो

जोश-ए-वफ़ा का नाम जुनूँ रख दिया गया
ऐ दर्द आज ज़ब्त-ए-फु़गाँ से सिवा न हो

ये ग़म नहीं के तेरा करम हम पे क्यूँ नहीं
ये तो सितम है तेरा कहीं सामना न हो

कहते हैं एक शख़्स की ख़ातिर जिए तो क्या
अच्छा यूँ ही सही तो कोई आसरा न हो

ये इश्‍क़ हद-ए-ग़म से गुज़र कर भी राज़ है
इस कशमकश में हम सा कोई मुब्तला न हो

इस शहर में है कौन हमारा तेरे सिवा
ये क्या के तू भी अपना कभी हम-नवा न हो

दर्द-ए-दिल आज भी है जोश-ए-वफ़ा आज भी है

दर्द-ए-दिल आज भी है जोश-ए-वफ़ा आज भी है
ज़ख्म खाने का मोहब्बत में मज़ा आज भी है

गर्मी-ए-इश्‍क निगाहों में नहीं है न सही
मुस्कुराती हुई आँखों में हया आज भी है

हुस्न पाबन्द-ए-कफ़स इश्‍क़ असीर-ए-आलाम
ज़िंदगी जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा आज भी है

हसरतें ज़ीस्त का सरमाया बनी जाती हैं
सीना-ए-इश्‍क़ पे वो मश्‍क-ए-जफ़ा आज भी है

दामन-ए-सब्र के हर तार से उठता है धुवाँ
और हर ज़ख्म पे हँगामा उठा आज भी है

अपने आलाम ओ मसाइब का वही दरमाँ है
‘‘दर्द का हद से गुजरना’’ ही दवा आज भी है

‘मीर’ ओ ‘गालिब’ के ज़माने से नए दौर तलक
शाएर-ए-हिंद गिरफ़्तार-ए-बला आज भी है

दुश्‍मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

दुश्‍मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं
इतने हम लाएक़-ए-जफ़ा ही नहीं

आज़मा लो के दिल को चैन आए
ये न कहना कहीं वफ़ा ही नहीं

हम पशेमाँ हैं वो भी हैराँ हैं
ऐसा तूफाँ कभी उठा ही नहीं

जाने क्यूँ उन से मिलते रहते हैं
ख़ुश वो क्या होंगे जब ख़फा ही नहीं

तुमने इक दास्ताँ बना डाली
हम ने तो राज़-ए-ग़म कहा ही नहीं

ग़म-गुसार इस तरह से मिलते हैं
जैसे दुनिया में कुछ हुआ ही नहीं

ऐ जुनूँ कौन सी ये मंज़िल है
क्या करें कुछ हमें पता ही नहीं

मौत के दिन क़रीब आ पहुँचे
हाए हम ने तो कुछ किया ही नहीं

हज़ार चाहा लगाएँ किसी से दिल लेकिन

हज़ार चाहा लगाएँ किसी से दिल लेकिन
बिछड़ के तुझ से तेरे शहर में रहा न गया

कभी ये सोच के रोए के मिल सके तस्कीं
मगर जो रोने पे आए तो फिर हँसा न गया

कभी तो भूल गए पी के नाम तक उन का
कभी वो याद जो आए तो फिर पिया न गया

सुनाया करते थे दिल को हिकायत-ए-दौराँ
मगर जो दिल ने कहा हम से वो सुना न गया

समझ में आने लगा जब फ़साना-ए-हस्ती
किसी से हाल-ए-दिल-ए-राज़ फिर कहा न गया

इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं

इस दर्ज़ा हुआ ख़ुश के डरा दिल से बहुत मैं
ख़ुद तोड़ दिया बढ़ के तमन्नाओं का धागा

ता-के न बनूँ फिर कहीं इक बंद-ए-मजबूर
हाँ कैद़-ए-मोहब्बत से यही सोच के भागा

ठोकर जो लगी अपने अज़ाएम ने सँभाला
मैं ने तो कभी कोई सहारा नहीं माँगा

चलता रहा मैं रेत पे प्यासा तन-ए-तन्हा
बहती रही कुछ दूर पे इक प्यार की गंगा

मैं तुझ को मगर जान गया था शम्मा-ए-तमन्ना
समझी थी के जल जाएगा शाएर है पतिंगा

आँखों में अभी तक है ख़ुमार-ए-ग़म-ए-जानाँ
जैसे के कोई ख़्वाब-ए-मोहब्बत से है जागा

जो ख़ुद को बदल देते हैं इस दौर में ‘बाक़िर’
करते हैं हक़ीक़त में वो सोने पे सुहागा

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