यतीश कुमार की रचनाएँ

अनिसुर रहमान

(बीएसएफ़ का जवान
जिसने भारत और बांगला देश की सीमा पर
पशु तस्करी को रोकने के लिए
बम के गोले खाए और उसके बदन के कई हिस्सों में छर्रे घुस गए)

इस अंधेरे में भी तुम कैसे ?
बिज़ुका से बन जाते हो

जबकि हमसे कहा जाता है
कि तुम्हारी जाति
अब विलुप्त हो रही है

वे ये भी कहते हैं
तुम हम में से नहीं हो
पर तुम हर बार साबित कर जाते हो
कि तुम्हारे बदन की मिट्टी
मेरी मिट्टी सी ही सोंधी है

अखंडता के केंद्र में
जहाँ गुरुत्वाकर्षण सबसे ज़्यादा है
ठीक वहीं ठुकी कील हो तुम
जिसे उखाड़ने की कोशिश में बहुरूपिये
रथ यात्रा में शामिल हो रहे हैं

अनिसुर तुम्हें कितनी बार
इस कलयुग में ईसा बनना पड़ेगा
कि लोग पत्थर मारेंगे
और तुम उन्हें माफ करते रहोगे

बम तुम्हारी ओर जब लपका
तो तुमने गेरुआ,सफ़ेद या हरा
क्या पहना था ?
सवाल में रंग इतना घुल गया है
कि मेरी नज़र धुँधला गई है

पर इस धुँधलके में भी देख रहा हूँ
तुम्हारी छाती में धँसा
एक -एक छर्रा
वह रास्ता बना रहा है
जहाँ से हज़ारों अनिसुर
बनने की राह तैयार हो रही है

बनग़ांव से कोलकाता के सफ़र में
जब रक्त तुम्हारे शरीर से बिखरकर
बंगाल की मिट्टी में
अपने बीज बो रहा था
तब क्या सोच रहे थे तुम
कि तस्करी पशुओं की थी
धर्म की या इंसानियत की

और तुम बन गए वो गौरक्षक
जिसने लोगों को नहीं
लोगों ने जिसको मारा

एक सोच हो तुम
जिसकी खिंची लकीर
और बनाई राह
पर देश को चलना है

तुम मर नहीं सकते

किन्नर

साथ भात नहीं खा सकता
पर चावल के दाने
तुम पर ही फेंकता हूँ

नौ महीने के
अविरल प्रेम का
मैं भी पैग़ाम था
गर्भवधी कटने तक
मैं भी इंसान था

अब मैं इंसानों की श्रेणी से इतर…
इंसानों को ही आशीषें बाँटता
त्रिशंकु हूँ

ब्रह्मा की छाया से निकल
नीलकंठ के विष में घुल गया हूँ मैं

सर्पमुखों के बीच सोता
अश्वमुखों का वंशज
मैं मंगल मुखी हूँ

सुख मेरी दहलीज़ में
दाखिल न हो सका
इसलिए मैं तुम्हारे
हर सुख में शामिल हूँ

मौत मुक्ति है
और
मातम से मुझे परहेज़

न तो कोई गाँव
न तो कोई शहर
मेरा समूह ही मेरा देश है

किन्नौर से संसद तक का सफ़र
त्रेतायुग से कलयुग जितना लम्बा रहा

समानता का हक़ मिलने पर भी
अवहेलना की नसें
मुझसे जुड़ी रह गईं
और अब भी मैं
समाज की बजाई हुई ताली में
एक चीख मात्र हूँ

हम तुम

एक स्थिति हैं
हम तुम

वो जो डाल पर बैठे
तोता मैना हैं न
वो हम तुम हैं

पेड़ की जो दो फुनगियाँ
आपस में बिन बात बतियाती रहती हैं
वो हम तुम हैं

कुमुदिनी के फूल
जो जोड़ो में ही खिलतें है
बस दो दिन के लिए

कल ही तो खिले थे
तुम्हारे गमले में हम

हम हैं स्टेशन की पटरियाँ
जो शुरुआत में समानांतर
और आगे जब चाहे
क्रॉसिंग पर
गले मिलती रहती हैं

या फिर नाव के वो दोनो चप्पू
साथ चलने से जिसके गति रहती है
गंतव्य पर रोज़ रख दिए जाते है
एक साथ रात काटने के लिए

वो हम तुम हैं

शायद हम तुम हैं
घर के एक़्वेरियम में तैरती
नीली और काली मछलियाँ
मौन को समझ,इशारे में बात करते हैं
या वो गिनिपिग हैं दोनो
जो पिंजड़े में अपने शब्द चुगते,पचाते
और कुछ नहीं कह पाते हैं

हम दोनो हैं कभी
दो ,असंख्य
कभी एक या सिर्फ़ शून्य

पिता 

पिता मेरे कंधे की
एक टहनी टूट गयी है
प्रौढ़ वृक्ष हूँ मैं अब
और मेरी घनी लदी शाखाओं में
कोई छिद्र तक नहीं दिखता
सूरज की महीन रोशनी भी
इसे भेद नहीं पाती

पिता मेरा लदा हुआ होना
मेरी स्थिति का द्योतक है
समय से ज़्यादा
स्वयं के भार में
तुम्हारे दबे होने का अहसास लिए
फलता फूलता हूँ मैं

आज अचानक चटकी टहनी में
तुम्हारी पीड़ा और जंग लगे दर्द
अपने हस्ताक्षर करते दिख रहे है

तुम्हारे धज को
रेशा दर रेशा बिखरते
मूक देखता था कभी
और विशाल तुम्हारे आग़ोश से
अपनी स्वतंत्रता का उदघोष
थाली पीट कर किया था मैंने
मेरी स्वतंत्रता का एक तमाचा
आज मेरे चेहरे के
बाई ओर दिख रहा है

पिता तुम्हारी टहनियों और पत्तों को
रोज़ गिरते झरते देखता था
वो पत्ते रोज़ गिर कर
मेरे पथ के काँटों को ढाँपते रहे

आज जबकि तुम्हारे सारे पत्ते झर चुके है
तो पहली बार काँटे ने मुझे डसा है
और आज ही मेरे कंधे की
पहली टहनी चटकी है

पूर्ण विराम

दिखता है
बुद्ध के घुंघराले बालों जैसा
अंधेरे को केंद्र में दबोचे
झाँकता है सूरज पीछे से

चाँदना की लालिमाऊ
आतुर है मुस्कान लिए
खिलखिलाने -फैल जाने को
पहाड़ की ओट से आभा धीरे-धीरे
फैल रही है धान के बीचरे पर

भीतर कोलाहल है, दृश्य का

कंचे की तरह उछलते कूदते बुलबुले
निरंतर ध्वस्त हो रहे हैं

दृश्य बोल रहा है
परिदृश्य की खामोशी को
चुपके से तोड़ता

बीचरे रौंदे जा रहे हैं
पानी अंदर ही अंदर धँसता जा रहा है
कीचड़ के भीतर-बाहर
परत दर परत
मिट्टी सूखी-सूखी
फिर पानी,पत्थर और शब्द
सब ग़ायब

बुद्ध की हर लट में
सैकड़ों लहरें है
और वह बस मुस्काता है

सर्पिली लटें

तुम्हारी लटें लहरा नहीं रहीं
कम्पन अंतस का डोल रहा है

मन के उथले क्षितिज पर
सपनों की टुस्सियाँ फैल रही हैं

नाख़ून कितना भी काटो
बदस्तूर बढ़ता जा रहा है
और त्वचा बढ़ती स्थूलता से
ख़ुद आश्चर्यचकित है

धमनियों में शोर का पारा
तेजी से फैल रहा है
और यूँ पसीने में नमक की मात्रा
कम होती जा रही है

सावधान
वो नन्हा-सा सर्प तुम्हारे भीतर
अवचेतन में जन्मेगा- पनपेगा
और फिर दिग्भ्रांत केंचुली को पहन
तुम्हारी लटों में बदल लहराएगा

लपेट लो इन्हें अपने जूड़े में
ये लपटें भावनाओं की हैं
बढ़ते नाख़ून से खुरेचना
उस जमी हुई खुरचन को

कच्चे विष-दन्त ने अभी डसना सीखा नहीं
पर सीखना तो स्वाभाविक प्रवृति है
डंक मारना प्रकृति नहीं तुम्हारी
पर प्रवृत्ति प्रकृति को पैरहन ओढ़ाती है

घुंघराले बाल मेरे
मुझे और मेरी छाया
दोनों को भ्रमित करते हैं

रुद्र और बुद्ध तो
हम सब में हैं
बस लटों को बाँधना किसे आता है …

देह के मोती

कभी कभी कुछ पल
ऐसे होते है
जिनमें पलकें खोलना
समंदर बहाने जैसा होता है
उन पलों में आप और लम्हे
एक साथ सैकड़ों नदियों में
हज़ारों डुबकियाँ लगा रहे होते हैं

कभी लम्हा सतह से उपर
और कभी आप ………
लम्हों और आपके बीच की
लुक्का -छुप्पी , डुबकियाँ
सब रूमानी- सब रुहानि

फिर आप जैसे समंदर पी रहे हों
और नदियाँ सिमट रहीं हों
असीमित फैलाव समेटने के लिए

फिर एक लम्हे में छुपे हुए सारे समंदर
और उनमें छुपी सैकड़ों नदियाँ
छोड़ देते हैं बहना

लम्हे बिलकुल आज़ाद हैं अब
छोड़ देना आज़ाद कर देना
सुकून की हदों के पार
ला खड़ा करता है आपको
आप जैसे खला तक फैल कर
फिर ज़र्रे में सिमट रहे हों

बिखरते हर लम्हे ऐसे लगते हैं
जैसे आप के अस्तित्व के असंख्य कण
आपसे निकल कर
अंतरिक्ष के हर नक्षत्र को टटोलते फिर रहे हैं
पूरे ब्रह्मांड में आपका फैलाव
हावी हो रहा हो

जैसे हर लम्हा आपसे छूटकर
जाता हो ईश्वर को छूने

देवत्व की टुकड़ों में हो रही हो
स्वाभाविक वापसी

जगमगाते लम्हे, टिमटिमाते लम्हे
अंतरिक्ष में असंख्य सितारे
और उस पल उगते हैं
देह पर असंख्य नमकीन मोती

ब्रह्मांड भी कभी धरती पर
समाता हो एक शरीर के बहाने

हर ज़र्रा,हर लम्हा,शरीर का हर मोती
कायनात को रचने की क्षमता रखता है
और तब उस प्रेम भरे पल में
रीता लम्हा भी सृष्टि रचने की क्षमता रखता है।

रोटियों की गंध

अंतहीन गंध के चक्कर में
घूमती रहती है धरती
या इसी चक्र में घूमते हैं
इस पर रहने वाले लोग

मृग तृष्णा है ये गंध
या इंसानों में भी है कोई कस्तूरी

विचित्र अग्नि है
रूह झुलसती नहीं
बस सुलगती रहती है

भूख करवट यूँ बदलती है
मानो जलती लकड़ी
आँच ठीक करने के लिए
सरकाई जा रही हो

उसी आँच पर रोटी पकेगी
सोच कर नींद नहीं आती
आँच आती है, बढ़ती है
बस कमबख़्त रोटी नहीं आती

आँखें बुझ जाती है
नींद डबडबाती है
देह सो जाती है
पर भूख अपलक जागती है

हाँ,कभी-कभी ढिबरी में
ज़्यादा तेल फैल जाने जैसा
फकफ़काती भी है

एक लम्बी रुदाली है
जिसकी सिसकियाँ नहीं थमती
एकसुरा ताल है जिस पर
ताउम्र नाचता है जीवन

एक ठूँठ पेड़ है
जिसकी पत्तियाँ नहीं होतीं
तने का बस हरापन ज़िंदा है
और वो जो लहू हरे में बह रहा है
वो अजर-अमर भूख है

भूख को अमरत्व प्रदान है
पर सपनों को नहीं

देह से बाहर
देश की भूख अलग होती है
और देश के अंदर
राज्यों की अलग भूख

अनंत सीमाओं की भूख लिए
दूर अंतरिक्ष से दिखते हैं देश
ऊन के उलझे धागों जैसे
कोई एक भी सीधी रेखा नहीं दिखती

बीते दिनों देश की भूख
रोटी से ज़्यादा
पानी की हो गयी
पूरी नदी चाहिए इनको
पर इन दिनों प्यास
और विकराल हो चली है
इसे अब नदी से संतुष्टि नहीं
पूरा समंदर चाहिए

भूख की स्थूलता
अब इस पर निर्भर है
कि ये किसकी भूख है
भारत की,पाकिस्तान की
चाइना की या अमेरिका की

पर भूटान की भूख
थोड़ी मीठी सी है

भूख की ज़िद इनदिनों
आक्टोपसी हो गयी है

इसलिए कहता हूँ यतीश
रोटी से ऊपर के सारे भूख
दरिंदे होते है
नुक़सान होना तय है

बोसों की भूख को
रोटी से नीचे की भूख मानता हूँ मैं
कई घर जिनमें रोटी नहीं है
वो बोसों के आलिंगन पर ही तो टिके हैं

और ज़्यादातर देश ??
ज़्यादातर देश टिके हैं
आलिंगन की सांत्वना पर
रोटी की गंध अपनी नाभि की कस्तूरी में लिए।

यंत्रणा का अन्तरलाप

अतृप्ति का सोता लिए
दर-ब-दर भटकते लोग
सुख की तलाश में
अपने-अपने दुःख नत्थी कर चुके हैं

खून और पसीना
एक साथ बह रहा है

हवा का रवैया इतना पुरवैया है कि
सोखना-सुखाना तक मुश्किल…

इन दृश्यों के बीच
उस हर शख्स के पास एक कविता है
जिनके हाथों में है छेनी-हथौड़ा

वे पत्थरो पर निरंतर गढ़ रहे हैं शब्दों को…

समय ने उनको घिस कर
वह सिक्का बना दिया है
जो चलन से बाहर हो चुका है

उनका पसीना अब अलोना हो चुका है
और महावर ज़ियादा सुर्ख़

स्वेदार्द्र आँखों ने कोर पर
रोक रखी है अपनी धार
मुश्किलों को मुट्ठी में दबाए
वह सोने की कोशिश में मुब्तिला है

स्वप्न में भी निर्माण और ध्वंस
लहरों की विकल्प-आवृति सा
धार के साथ एकसार है..

इन सबके दरमियान
यंत्रणा का अन्तरलाप
घरों से निकल
एक-दूसरे के गले लग रहे हैं

इन सबके बीच
अपने एकांतवास से निकल
दर्द अब एक सामूहिक वक्तव्य है.

पंचानवें प्रतिशत

रुकी हुई घड़ी की टिक-टिक
बिना नाल के घोड़े की टप-टप
किवाड़ का हल्का-सा उखड़ा क़ब्ज़ा
रगड़ता हुआ घिसटता दरवाज़ा

इनमें से हर एक में मैं हूँ

टपकता हुआ फूस का घर
घर की भीगी हुई लकड़ी
उसपर खाना बनने का इंतज़ार
इंतज़ार में जलती हुई लालटेन
लालटेन का दरका हुआ शीशा
शीशे में आधा लिपटा हुआ अख़बार
और अख़बार में सुलगते हुए सवाल

उन सब की खोजती आँखों में मैं ही हूँ

मंदिर का वो अकेला घंटा
जिसकी घंटी हो गयी है गुम
चढ़ते -चढ़ते थाली में
अकेले पड़ा रह गया वो फूल

इन सब में कहीं न कहीं मैं हूँ

ठूँठ पेड़ की वो अंतिम पत्ती
जिसने अपना हरापन
अभी -अभी छोड़ा है

उस पेड़ की वह जड़
रास्ता बनाने के लिए जिसे
अभी- अभी काटा गया है

उन सबमें ही कहीं छूट गया हूँ मैं

बिना मोती के मुँह खोले
अकेला पड़ा वह सीप
बिना स्प्रिंग के टोवेल क्लिप
जलकर बुझा हुआ
बिना बाती का दीप

इन सबके एकांत में मैं ही हूँ

दिल के सबसे करीब
खोसा गया गई फ़ाउंटन पेन
निब जिसकी शार्प है
और नालिका सुखी हुई

कविता अब स्याही से नहीं
सिर्फ़ गर्म खौलते ख़ून से
लिखी जा सकती है

घड़ी,घंटा,किवाड़,क़ब्ज़ा
दरवाज़ा,फूल,पेन,पपड़ी और मैं
सब इस देश का ९५ प्रतिशत है
जिन पर मुखौटा लगाए
बेताहाशा कविताएँ
सिर्फ़ लिखी जा रही हैं।

दबाव और सृजन

पहाड़ बनते देखा है कभी
या नदी बनते देखी है
नक्षत्र में सितारे जुडते देखे हैं कभी
या जंगल का सृजन होते देखा है

दुखों के पहाड़ भी
अनदेखे खड़े हो जाते है
भावना की नदी भी
बिन बताए अनचाहे बह जाती है

तने का फैलाव
और लदे फल का झुकाव
तो सब देखते हैं
पर मिट्टी के दबाव में
बीज का अंकुरण
और जड़ का संतुलन
कोई नहीं देखता

जनता के हालात तो दिख जाते हैं
पर भीड़ के हालात
राजतंत्र को भी नहीं दिखता

भीड़ को बनते नहीं
बल्कि भीड़ को दिशाहीन होते
सब देखते हैं

पहाड़ को उजड़ते
नदी को सूखते-भटकते
उल्कापिंडो को गिरते और भष्म होते
सबने देखा है

सच तो ये है कि
सारी जीवंत उत्पत्ति
दबाव में आकर उभरती है
चाहे कोख में शिशु हो
या ज़मीन के नीचे पड़े
बीज का अंकुरण

सृजन दबाव का विस्तार है
पर दबाव को कोई
देखना नहीं चाहता

विडंबनाएँ 

प्यासे हैं कुएँ
अब उनमें किसी का
प्रतिबिम्ब नहीं उभरता
वह भी आत्महत्या कर रहा हैं !

लोहे में तब्दील हो रहा है साइकिल
पर यह यात्रा
घर वापसी की नहीं है !

घर के अंदर भी
“लोहा”अपनी जगह खोता जा रहा है

और अयस्क का निर्यात
अनवरत जारी है !

प्लास्टिक महावर को बदल देगा
मालूम पड़ता है
शक्ल और सीरत
दोनो बदले जा सकते हैं ?

आलता को भी बदल देंगे
जैसे बदला जा रहा है
मेहंदी को रसायन से

परंतु ख़ुशबू ?
ख़ुशबू तो मौलिक है ।

मौलिकता उस काग़ज़ की तरह है
जिसपर निब चला-चला कर
क़लम की परख की जाती है।

कट्टम -काटी अब सिर्फ़ खेल नहीं है
इसने कविताओं पर भी
क़लम चलानी शुरू कर दी है
और यूँ शब्दों की छटपटाहट
दबी रह गई ।

इन सभी दृश्यों के बीच

वर्षों पहले मर चुके
गज़राज का सिक्कड
आज भी
उसी पाए से बँधा है !

अंकुश आज भी जंग रहित है

और महावत की पीढ़ियाँ
रह-रह कर
निर्वात में
इंतज़ार की आँखे लिए
ताकती रहती हैं!

आज

वक़्त ने अपनी शक्ल छुपा दी
और घड़ी ने अपने हाथ
बर्फ़ पिघलने और
नदी जमने लगी है
पगडंडियाँ हो रही हैं विलुप्त
और रास्ते लगें हैं फैलने

केंचुओं ने छोड़ दिया है
मिट्टी का साथ
और मिट्टी ने किसानों का
बारिश ने ही
चुरा लिया है
मिट्टी से सोंधापन

गुलाब के काँटे
अब चुभते नहीं
आघात करते हैं
कमल अब सूरज को देख नहीं खिलता
छुइमुई ने भी शर्माना छोड़ दिया है
और दीमक
दीमक अब लोहे को भी चाट जाता है

नेवला बिल में घुस गया है
साँप बिल में अब नहीं रहता
शहर में घुस आया है
सियार अब आसमान ताके
आवाज़ नहीं लगाता
मुँह झुकाए रिरियाता है।

और इंसान ???
इंसान ने इन सबकी शक्ल चुरा ली है

देह, बाज़ार और रोशनी – 1

उस कोने में धूप
कुछ धुँधली सी पड़ रही है

रंगीन लिबास में
मुस्कुराहट
नक़ाब ओढ़े घूम रही है

उस गली में पहुँचते ही
बसंत पीला से गुलाबी हो जाता है

इंद्रधनुषी उजास किरणें
उदास एकरंगी हो जाती है

और वहाँ से गुज़रती हवा
थोड़ी सी नमदार
थोड़ी सी शुष्क
नमक से लदी
भारीपन के साथ
हर जगह पसर जाती है

हवा में सिर्फ़ देह का पसीना तैरता है

दर्द और उबासी में घुलती हँसी
ख़ूब ज़ोर से ठहाके मारती है
सब रूप बदल कर मिलते है वहाँ

सिर्फ मिट्टी जानती है
बदन पिघलने का सोंधापन
और बर्दाश्त कर लेती है
हर पसीने की दुर्गन्ध

उन्ही मिट्टियों के ढूह पर
बालू से घर बनाता है
एक आठ साल का बच्चा
और ठीक उसी समय
एक बारह साल की लड़की
कुछ अश्लील पन्नों को फाड़ती है
और लिखती है आज़ादी के गीत

पंद्रह अगस्त को बीते
अभी कुछ दिन ही हुए है

देह, बाज़ार और रोशनी – 2 

वक़्त से पहले
अँधेरा दस्तक देता है
शाम होते होते सभी खुद को
पेट के अंधेरे में गर्त कर लेते हैं

रंगीन कमरों से निकलती रोशनी
आँगन में धुँधली
और दरवाज़े पर अंधी हो जाती है

बच्चा वहाँ जन्मा जरूर
पर दूध कौन पिलाएगा
यह तय नहीं है

माँ मुट्ठियों में वक़्त को धकेलते
भोर के पहले पहर मिलती है
उस वक़्त दिखते हैं अजनबी चेहरे
देहरी से बाहर भागते-फिरते

दोपहर तक खिलखिलाहट में
नमकीन मुस्कुराहट पनाह पाती है
और शाम होते ही
सर्प की तरह फिर से फ़न फैलाती है
हर शाम ज़िंदगी
अपनी परिभाषा भूल जाती है
सिसकियों में घुली खिलखिलाहट
रात भर बेसुरा गीत गाती है

तभी रात कब्र में दफन आठ साल का लड़का
कुछ बासी फूलों में सांस फूँकता है
और ग्यारह साल की लड़की के हाथों में सौंप देता है
कब्र के स्याह अँधेरें में एक जोड़ी आँखें चमक उठती हैं।

देह, बाज़ार और रोशनी – 3

असमय फूल अक्सर यहाँ खिल जाते हैं
फूल खिलना यहाँ एक दर्दनाक हादसा है
अगर खिल गए
तो मसल भी दिए जाते हैं
तब खिलती मुस्कुराहट पर
सुर्ख़ छींटे भी पड़ जाते हैं

बदलते दृश्यों में
अजीब सी बौखलाहट तैरती है
भावनाएँ यांत्रिक बन मुखौटे लगाती हैं

पेट से पूरे बदन पर
चढ़ती आग की भी एक उम्र होती है
उम्र की साँझ पर तपिश
पेट से ही चिपकी रह जाती है
बदन पर नहीं उतरती
और तब इंतज़ार मौत से भी बदतर लगती है

अकेला खड़ा तुलसी चौरा
कभी आँखे बंद नहीं करता
आँगन में मुस्कुराता चहबच्चा
सारे आँसुओं को ज़ज्ब कर लेता है
वह कभी नहीं सूखता
बस दाग़ धोता रहता है

इन्हीं दृश्यों के बीच
आठ साला बच्चा
ढ़ूह की मिट्टी
मस्तक पर लगाता है
और ग्यारह साल की लड़की ने अब
उसकी उंगली सख़्ती से पकड़ ली है।

देह, बाज़ार और रोशनी – 4

धुँध नीम अंधेरे में
झीमती आँखों के बीच
कुछ तारे टिमटिमा रहे हैं
बालू के ढेर पर
लोहा पिघलाने की तैयारी चल रही है

आठ साल के बच्चे ने अब
पत्थरों को तराशना सीख लिया है
उन्हीं मूर्तियों में ग्यारह साल की लड़की
अब रंग भर रही है

वे गोबर में जन्में कुकुरमुत्ते हैं
बिल्कुल सफ़ेद शफ़्फ़ाक
एक चिंगारी की तरह
सूरज की ताप बनने की यात्रा है

सोच में जमी हुई बारूद
अब पिघलने लगा है
चित्त की शीतल परतों पर हलचल है
बाह्य और भीतर एकमेव हो जाने को है
इस संगम से एक नए आन्दोलन का
उद्बोधन होने वाला है

भँवर में पतवार मिल चुका है उन्हें
चिंगारी विस्फोट के लिए तैयार है
स्वतंत्रता का सही अर्थ
तराशने की यात्रा है अब

और ऐसा ही हुआ
पंक से निकले अरुण कमल ने
पूरे पोखर को एक उपवन बना दिया
और अब वहाँ फूल खिलने से
दर्द नहीं उमंग की अभिलाषा होती है

परंतु इस शहर में कितने वनपोखर हैं
जिन्हें एक अरुण कमल का इंतज़ार है

ओसारा

घर का ओसारा
पहले सड़क के चौराहे तक
टहल आता था

पूरे मोहल्ले की ठिठोली
उसकी जमा पूँजी थी

ओसारे से गर कोई आवाज़ आती
तो चार कंधे हर वक़्त तैयार मिलते
शाम हो या कि रात
वहाँ पूरा मेला समा जाता था

हर उम्र का पड़ाव था वह
कंचे की चहचहाहट
चिड़िया उड़ और ज़ीरो काटा में
चहचहाती किलकारियाँ

पोशंपा के गीत
या ज़मीन पर अंकित
स्तूप का गणित

पिट्ठु फोड़ हो
या विष-अमृत की होड़
या फिर ताश और शतरंज में लगाए कहकहे
सब के सब वहाँ अचिंतन विश्राम करते

पर आज वहाँ
हर वक्त दोपहर का साया है
वो चौराहे तक पसरा हुआ ओसारा
चढ़ते सूरज में सिमट आया है

ढलती शाम की पेशानी
वहाँ अब टहल नहीं पाती
और न ही उगते सूरज की ताबानी के लिए
कोई जगह शेष है

ओसारा अब अपना पैर सिकोड़े
सर पर चढ़े सूरज को ताक रहा है
और वो ख़ुद में समा गए
अपने ही साये से बेइंतहा परेशान है

मैं पूछ नहीं सका

पूछना चाहता था
ठीक पास बैठी महिला से
कि उसने मास्क क्यों पहन रखा है
क्या उसकी साँसे घुटती नहीं है

सामने खड़े दरबान से भी पूछना था मुझे
कि क्या तुम्हारी टांगों में दर्द नहीं होता
कुछ पल के लिए
बैठ क्यों नही जाते

रीढ़ को झुकाए
मोची से भी कहना था मुझे
ऐंठ जाएँगी टाँगे बैठे-बैठे
थोड़ा चहलकदमी तो कर लो

सर्द रात में बोरे में लिपटे
बुज़ुर्ग से पूछना था
जिसके हाथ में
जल कर बुझ चुकी बीड़ी है
सीना धौंकनी-सा फड़फड़ा रहा है
और पेट का तंदूर ठंडा पड़ गया है

बुझायी गयी बीड़ियों से
दीवार पर उसने
बीते दिन लिख रखे हैं
भाषा अव्यक्त सी है

उसके ही पाँव से टिकी
उस औरत से भी पूछना भूल गया मैं
जिसकी आँखों का नूर
कोरों पर अब भी अटका पड़ा है
नमक बहने का उस पर असर कम क्यों है?

वह इतनी तेजी से दौड़ा
कि मैं पूछ ही न पाया
उस बच्चे से
उसके घर का पता
मासूमियत पर जिसके
चढ़ चुका है
नीमक़श तेजाबियत का नशा
जो मुझे ऑफ़िस आते-जाते
हर बार खेलता दिख जाता है

उन किन्नरों से भी नहीं पूछ पाया
कि तुम्हें तीसरे लिंग का दर्जा मिलने में
युग क्यों बीत गए ?
कागज में दर्ज हो चुकने के बाद
अब भी चौराहे पर
तुम ताली क्यों बजा रहे हो ?

उस पागल से
उसकी हँसी का राज
समझना था मुझे
जो मुर्दा घरों के बाहर
रोते-बिलखते लोगों पर हँसता है

मैं ख़ुद से भी नहीं पूछ पाया
कि इतना परेशां क्यूँ हूँ
और सही समय पर
आँखें मूँद लेने की कला
कब सीख गए !!

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