अज्ञात रचनाकार की रचनाएँ

चंदा मामा, आरे आवा 

चंदा मामा, आरे आवा,
पारे आवा,
नदिया किनारे आवा,
सोने के कटोरवा में
दूध-भात ले के आवा।
बबुआ के मुंह में घुटूक…!
घुटुक-घुटुक!

मोरा लालन के लागल नजरिया

मोरा लालन के लागल नजरिया
निंदिया ना आवे री।
आरे मोरे लालन के लागल नजरिया,
हाय मोरा बाबू के लागल नजरिया।
के लावे टोना, के लावे नजरी,
केकरा अंखियां के बाबू किरकिरी।
सासु लावे टोना, ननद फेर नजरी,
गोतिन के अंखियों के बाबू किरकिरी।
हाय मोरा लालन के लागल नजरिया,
निंदिया न आवे री।

सोनै को झुनझुना बाजनो

सोनै को झुनझुना बाजनो,
जड़ाऊ झुनझुना बाजनो।
बाके बाबा लाए चाउ तैं,
बाकी दादी बलैयां लेइ रे।
बाके बाबुल लाए चाउ तैं,
बाकी मइया बलैयां लेइ रे।

खाना है, खिलाना है

खाना है, खिलाना है,
भइया को सुलाना है।
एक घूंट दादा का, एक घूंट दादी का,
एक घूंट चाचा का, एक घूंट चाची का।
गुटर-गुटर गुट!
एक घूंट भइया का, एक घूंट बहना का,
एक घूंट तुम्हार, एक घूंट हमारा।
गुटर-गुटर गुट!
खाना है, खिलाना है,
भइया को सुलाना है।

वंदे मातरम् 

रचनाकाल: 1930

छीन सकती है नहीं सरकार वंदे मातरम्,
हम ग़रीबों के गले का हार वंदे मातरम्।

सरचढ़ों के सर में चक्कर उस समय आता ज़रूर,
कान में पहुंची जहां झनकार वंदे मातरम्।

जेल में चक्की घसीटे, भूख से हो मर रहा,
उस समय भी बक रहा बेज़ार वंदे मातरम्।

मौत के मुंह में खड़ा है, कह रहा जल्लाद से,
भोंक दे सीने में वह तलवार, वंदे मातरम्।

डाक्टरों ने नब्ज़ देखी, सर हिलाकर कह दिया,
हो गया इसको तो यह आज़ार वंदे मातरम्।

ईद, होली, दशहरा, शबरात से भी सौ गुना,
है हमारा लाड़ला त्योहार वंदे मातरम्।

ज़ालिमों का जुल्म भी काफूर-सा उड़ जाएगा,
फैसला होगा सरे दरबार वंदे मातरम्।

प्राप्त जानकारी और श्री एम.एल.वर्मा “क्रांत” जी के शोधानुसार यह रचना महान क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल की है। पाठकों से निवेदन है कि यदि आपके उक्त शोध उपलब्ध है तो उचित पन्नें की तस्वीर हमें भेज दें। इससे हम इस रचना को बिस्मिल जी के पन्नें पर स्थानांतरित कर पाएँगे।

हिंदू-मुस्लिम एकता

क्या हुआ गर मर गए अपने वतन के वास्ते,
बुलबुलें कुर्बान होती हैं चमन के वास्ते।

तरस आता है तुम्हारे हाल पे, ऐ हिंदियो,
ग़ैर के मोहताज हो अपने कफ़न के वास्ते।

देखते हैं आज जिसको शाद है, आज़ाद है,
क्या तुम्हीं पैदा हुए रंजो-मिहन के वास्ते?

दर्द से अब बिलबिलाने का ज़माना हो चुका,
फ़िक्र करनी चाहिए मर्जे़ कुहन के वास्ते।

हिंदुओं को चाहिए अब क़स्द काबे का करें,
और फिर मुस्लिम बढ़ें गंगो-जमन के वास्ते!

रचनाकाल: सन 1932

नाला-ए-बुलबुल 

रचनाकाल: सन 1930

दे दे मुझे तू ज़ालिम, मेरा ये आशियाना,
आरामगाह मेरी, मेरा बहिश्तख़ाना।

देकर मुझे भुलावा, घर-बार छीनकर तू,
उसको बना रहा है, मेरा ही कै़दख़ाना।

उसके ही खा के टुकड़े, बदख़्वाह बन गया तू,
मुफ़लिस समझ के जिसने, दिलवाया आबो-दाना।

मेहमां बना तू जिसका, जिससे पनाह पाई,
अब कर दिया उसी को, तूने यों बेठिकाना।

उसके ही बाग़ में तू, उसके कटा के बच्चे,
मुंसिफ़ भी बन के ख़ुद ही तू कर चुका बहाना।

दर्दे-जिगर से लेकिन चीखूंगी जब मैं हरदम,
गुलचीं सुनेगा मेरा पुर-दर्द यह फ़साना।

सोजे़-निहां की बिजली सर पर गिरेगी तेरे,
ज़ालिम! तू मर मिटेगा, बदलेगा यह ज़माना।

मुझको न इस तरह का, अब कुछ मलाल होगा,
गुलज़ार फिर बनेगा मोहन का कारख़ाना।

नौजवानों

रचनाकाल: सन 1930

सूखा नहीं था ख़ून शहीदों का दार से,
ताज़ा था दिल का ज़ख़्म, अभी उनके वार से।

लो उसके और क़त्ल का फ़रमान कर दिया,
ज़ख़्मी जिगर के सोज़ का सामान कर दिया।

बातों में जिनके साथ में, रातों जमा किए,
उन सबको छोड़ बैठा हूं भारत के वास्ते।

पर वह रसम के वास्ते छोड़े न जाएंगे।
हाथों से टांके ज़ख़्म के, तोड़े न जाएंगे।

किस जगह मजनूं हो, फ़रहाद कहां हो देखो,
ओ अहिंसा के पुजारी! यह सभा तो देखो।

जानदारों से फ़क़त होती मुहब्बत तुमको,
प्रेम मस्तानों का अंदाज़े-रवां तो देखो।

रस्सियांे से गले मिलने को बढ़े जाते हैं,
ख़ुद-ब-ख़ुद गोद में सूली के, चढ़े जाते हैं।

बन करके अश्क दर्दे-मुहब्बत न जाएगा,
भारत के हर जवान को हरकत में लाएगा।

बरतानियों को ख़ून के आंसू रुलाएगा,
गिन-गिन के अब हर एक का बदला चुकाएगा।

पाबंद हिंद दम व दिलासा नहीं रहा,
कालों से छेड़ करना तमाशा नहीं रहा।

हां ऐ जवाने-मुल्क, ज़रा मैं भी देख लूं,
लाता है रंग कैसा भगतसिंह का ये ख़ूं।

सुखदेव, राजगुरु से तुम्हें कितना प्यार है,
यह शोर इक़बाल का ढाता है क्या जुनूं।

देखूंगा मैं इसे भी कि बदला है क्या लिया,
उस रोज़ गै़र पढ़ते हैं किस-किस का मर्सिया।

प्रतिज्ञा

रचनाकाल: सन 1930

ऐ जन्मभूमि जननी, सेवा तेरी करूंगा,
तेरे लिए जिऊंगा, तेरे लिए मरूंगा।

हर जगह, हर समय में, तेरा ही ध्यान होगा,
निज देश-भेष-भाषा का भक्त मैं रहूंगा।

संसार की विपत्ति हंस-हंस के सब सहूंगा।
तन-मन सभी समर्पित, तेरे लिए, ओ जननी!

पर देश-द्रोही बनकर यह पेट नहीं भरूंगा।
धन-माल और सर्वस्व, यह प्राण वार दूंगा।

होगी हराम मुझको, दुनिया की ऐशो-इशरत,
जब तक स्वतंत्र तुझको, माता मैं कर न लूंगा।

कह-कह के माता! तेरे दुख-दर्द की कहानी,
भारत की लता-पेड़ों तक को जगा मैं दूंगा।

हम हिंद के हैं बच्चे, हिंदोस्तां हमारा,
मैं मात! मरते दम तक कहता यही रहूंगा।

शहीदों की याद में 

रचनाकाल: सन 1931

फांसी का झूला झूल गया मर्दाना भगतसिंह,
दुनिया को सबक दे गया मस्ताना भगतसिंह।

राजगुरु से शिक्षा लो, दुनिया के नवयुवको!
सुखदेव से पूछो, कहां मस्ताना भगतसिंह।

रोशन कहां, अशफ़ाक़ और लहरी, कहां बिस्मिल,
आज़ाद से था सच्चा दोस्ताना भगतसिंह।

स्वागत को वहां देवगण में इंद्र भी होंगे,
परियां भी गाती होंगी ये तराना भगतसिंह।

दुनिया की हर एक चीज़ को हम भूल क्यों न जाएं,
भूलें न मगर दिल से मस्ताना भगतसिंह।

भारत के पत्ते-पत्ते में सोने से लिखेगा,
राजगुरु, सुखदेव और मस्ताना भगतसिंह।

ऐ हिंदियो, सुन लो, ज़रा हिम्मत करो दिल में,
बनना पड़ेगा सबको अब दीवाना भगतसिंह।

नारी चेतना 

जो कुछ पड़ेगी मुझ पे मुसीबत उठाऊंगी,
खि़दमत करूंगी मुल्क की और जेल जाऊंगी।

घर-भर को अपने खादी के कपड़े पिन्हाऊंगी,
और इन विदेशी लत्तों को लूका लगाऊंगी।

चरख़ा चला के छीनूंगी उनकी मशीनगन,
आदा-ए-मुल्को-क़ौम को नीचा दिखाऊंगी।

अपनी स्वदेशी बहनों को ले-ले के साथ में,
भट्टी पे हर कलाल के धरना बिठाऊंगी।

जाकर किसी भी जेल में कूटूंगी रामबांस,
और कै़दियों के साथ में चक्की चलाऊंगी।

रचनाकाल: सन 1932

स्वदेशी गाढ़ा

रचनाकाल: सन 1923

मुझे गाढ़ा स्वदेशी मंगा दो, सजन!

है फैली काहिली दुनिया जहान में सारे,
इसी ख़्याल से मेरे ख़याल हैं न्यारे,
तमाम दिन मेरा बेकार गुज़रे है प्यारे,

मैं तो कातूंगी चरख़ा, करूंगी भजन!
मुझे गाढ़ा स्वदेशी मंगा दो, सजन!

इसी की साड़ियां, चादर-कमीज़ बनवाना,
इसी का कोट-ओ-कुरता बनाओ मनमाना,
इसी की टोपियां, अचकन, रज़ाई बनवाना,

जो सुधारा चाहो तुम अपना वतन!
मुझे गाढ़ा स्वदेशी मंगा दो, सजन!

रुई की क़द्र विलायत में लोग करते हैं,
इसी के ज़ोर से दुनिया से कब वो डरते हैं,
हमारे मुल्क से लेकर जहाज़ भरते हैं,

है ये नज़रों में हल्की, पै भारी वज़न!
मुझे गाढ़ा स्वदेशी मंगा दो, सजन!

स्वतंत्रता के दीवाने 

रचनाकाल: सन 1940

जब रण करने को निकलेंगे स्वतंत्रता के दीवाने,
धरा धंसेगी प्रलय मचेगी, व्योम लगेगा थर्राने।

बहन कहेगी जाओ भाई, कीर्ति-कौमुदी छिटकाना,
पुत्र कहेगा, पिता, शत्रु का झंडा छीन मुझे लाना।
स्वाभिमानी मां कह देगी, लाज दूध की रख आना,
और कहेगी पत्नी, प्रियतम, विजयी हो स्वागत पाना।

सब पुरवासी लोग हर्ष से, फूल लगेंगे बरसाने,
जब रण करने को निकलेंगे स्वतंत्रता के दीवाने,

उधर गर्वपूर्ण रिपुदल का कटक अपार खड़ा होगा,
इधर स्वयंसेवक दल, कर में झंडा लिए अड़ा होगा।
उन्हें तोप-तलवार तीर का, मन में गर्व बड़ा होगा,
इधर अहिंसा का उर में भी, जोश नया उमड़ा होगा।

उत्साही कवियों की कविता, शौर्य लगेगी बरसाने,
जब रण करने को निकलेंगे स्वतंत्रता के दीवाने,

गोदी सूनी हो जाएगी, कितनी ही माताओं की,
और चूड़ियां भी उतरेंगी, कितनी ही अबलाओं की।
घिर आएंगी शिशुओं पर भी, घोर घट विपदाओं की,
जबकि चलेगी भारत भू पर, वह आंधी अन्यायों की।

ऐसा आर्तनाद होगा वह, लग जाएंगे दहलाने,
जब रण करने को निकलेंगे स्वतंत्रता के दीवाने।

भारत एक खोज – शीर्षक गीत 

Discovery of India जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित पुस्तक है। इसके हिन्दी अनुवाद का शीर्षक “भारत एक खोज” है।

इस पुस्तक पर आधारित एक दूरदर्शन धारावाहिक “भारत एक खोज” का प्रसारण 1988 में हुआ था। धारावाहिक के निर्माता-निर्देशक श्याम बेनेगल थे।

प्रस्तुत है इस धारावाहिक का शीर्षक गीत जिसे वसंत देव ने लिखा / अनूदित किया था।

नासदासीन नो सदासीत तदानीं नासीद रजो नो वयोमापरो यत।
किमावरीवः कुह कस्य शर्मन्नम्भः किमासीद गहनं गभीरम॥

सृष्टि से पहले सत नहीं था
असत भी नहीं
अंतरिक्ष भी नहीं

आकाश भी नहीं था
छिपा था क्या, कहाँ
किसने ढका था
उस पल तो
अगम अतल जल भी कहां था

सृष्टि का कौन है कर्ता?
कर्ता है या विकर्ता?
ऊँचे आकाश में रहता
सदा अध्यक्ष बना रहता
वही सचमुच में जानता
या नहीं भी जानता
है किसी को नहीं पता
नहीं पता
नहीं है पता
नहीं है पता

वो था हिरण्य गर्भ सृष्टि से पहले विद्यमान
वही तो सारे भूत जाति का स्वामी महान
जो है अस्तित्वमान धरती आसमान धारण कर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर

जिस के बल पर तेजोमय है अंबर
पृथ्वी हरी भरी स्थापित स्थिर
स्वर्ग और सूरज भी स्थिर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर

गर्भ में अपने अग्नि धारण कर पैदा कर
व्यापा था जल इधर उधर नीचे ऊपर
जगा जो देवों का एकमेव प्राण बनकर
ऐसे किस देवता की उपासना करें हम हवि देकर

ऊँ! सृष्टि निर्माता, स्वर्ग रचयिता पूर्वज रक्षा कर
सत्य धर्म पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर
फैली हैं दिशायें बाहु जैसी उसकी सब में सब पर
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर
ऐसे ही देवता की उपासना करें हम हवि देकर

सो जा ललना, सो जा ललना

सो जा ललना, सो जा ललना।
मां की गोदी तेरा घर है
तेरा घर है, तेरा घर है,
फिर क्यों मेरे मन में डर है
सोने-चांदी का है पलना।
सो जा ललना, सो जा ललना।
मीठी-मीठी नींद बुला दूं
थपकी दे दे तुझे सुला दूं,
कभी न रोना और मचलना
सो जा ललना, सो जा ललना।
चंदा आया, चंदा आया
साथ बहुत-से तारे लाया,
मीठा दूध कटोरा लाया
अच्छे पथ पर ही तुम चलना।
सो जा ललना, सो जा ललना।

सैयाद की करामात

मुर्ग़ दिल मत रो, यहां आंसू बहाना है मना,
अंदलीबों को क़फ़स में चहचहाना है मना।

हाय! जल्लादी तो देखो, कह रहा सैयाद ये,
वक़्ते-ज़िबह बुलबुलों को फड़फड़ाना है मना।

वक़्ते-ज़िबह मुर्ग़ को भी देते हैं पानी पिला,
हज़रते हंसान को पानी पिलाना है मना।

मेरे खून से हाथ रंगकर बोले क्या अच्छा है रंग,
अब हमें तो उम्र भर मरहम लगाना है मना।

ऐ मेरे ज़ख़्मे-जिगर! नासूर बनना है तो बन,
क्या करूं इस ज़ख़्म पर मरहम लगाना है मना।

ख़ूने दिल पीते हैं ‘असग़र’, खाते हैं लख़्ते-जिगर,
इस क़फ़स में कै़दियों को आबो-दाना है मना।

सैयाद को दिखा दो 

भारत के नौजवानो, अब जा के जेल भर दो,
आज़ादी के समर में आ-आ के जेल भर दो।

परतंत्रता की बेड़ी माता की, आ के काटो,
ज़ालिम के गोली-डंडे खा-खा के जेल भर दो।

सुस्ती में पड़ के सोने का यह समय नहीं है,
गाने स्वतंत्रता के, गा-गा के जेल भर दो।

माताएं और बहनें जब जेल जा रही हैं,
गर मर्द हो तुम कुछ भी, शरमा के जेल भर दो।

बातें बनाने का, यह बिल्कुल समय नहीं है,
सत्याग्रह का अवसर शुभ पा के जेल भर दो।

अब तो समय नहीं है पढ़ने का, छात्र-वीरो,
तुम पूर्वजों के ख़ूं को दिखला के जेल भर दो।

सैयाद को दिखा दो, तप-तेज-त्याग अपना,
भारत के पुत्र सच्चे कहला के जेल भर दो।

देखकर तुम्हारा साहस, ‘त्रिभुवन’ करे प्रशंसा,
दुश्मन के दिल को, प्यारो, दहला के जेल भर दो।

रचनाकाल: सन 1930

मेरी बिटिया सो जा

मेरी बिटिया सो जा, सो जा।
कुत्ता तबला बजा रहा है,
नाच रही है बिल्ली,
कुत्ता जाएगा कलकत्ता,
बिल्ली जाए दिल्ली।
घोड़ा बाबू ढोल बजाएं,
बछड़ा जी सारंगी,
बंदर बाबू काम न करते,
खाते हैं नारंगी।
मेरी बिटिया सो जा, सो जा।

शहीदों का संदेश 

दिन ख़ून के हमारे प्यारे न भूल जाना,
ख़ुशियों में अपनी हम पर आंसू बहाते जाना।

सैयाद ने हमारे चुन-चुन के फूल तोड़े,
वीरान इस चमन में अब गुल खिलाते जाना।

गोली को खा के सोए जलियान बाग में हम,
सूनी पड़ी क़बर पर दीपक जलाते जाना।

हिंदू व मुस्लिमों की होती है आज होली,
बहते हमारे रंग में दामन भिगोते जाना।

कुछ क़ैद में पड़े हैं, कुछ क़ब्र में पड़े हैं,
दो बूंद आंसू इन पर ‘प्रेमी’ बहाते जाना।

रचनाकाल: सन 1930

पैग़ाम

मेरे पुत्रों को यह पैग़ाम दे देना ज़रा बेटा,
मर मिटो देश की ख़ातिर, मेरे लख़्ते-जिगर बेटा।

जना करती हैं जिस दिन के लिए औलाद माताएं,
मेरे शेरों से कह देना कि वह दिन आ गया बेटा।

जहां में बुज़दिलों की भांति रोने-गिड़गिड़ाने से,
किसी को हक़ मिला भी है, बताओ तो भला बेटा।

सुना है सिंहनी एक शेर जनकर सुख से सोती है,
करोड़ों शेरों के होते हुए, दुख पा रही बेटा।

तुम्हारी शक्ल देखूंगी न हरगिज़ दूध बख़्शूंगी,
निकालोगे न तुम जब तक विदेशी वस्तु को बेटा।

‘रामसिंह’ जिस्म ख़ाकी ख़ाक में मिलता है, मिलने दो,
करो मत मौत का खटका, अमर है आत्मा बेटा।

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