अदनान कफ़ील दरवेश की रचनाएँ

अन्तिम प्रार्थना

चाँद —
दफ़ा हो जाओ
हवा —
मुझ तक सुगन्ध न लाओ
खिड़कियो —
बन्द हो जाओ
दीवालो —
और निकट आओ
छत —
मुझ पर झुक जाओ
बत्तियो —
गुल हो जाओ
धड़कनो —
थम जाओ
साँसो —
और न दबाओ
स्मृतियो —
दूर जाओ
अन्धेरो —
और गहराओ
कफ़न बनो
मुझ पर छा जाओ ।

तुम 

जब जुगनुओं से भर जाती थी
दुआरे रखी खाट
और अम्मा की सबसे लम्बी कहानी भी
ख़त्म हो जाती थी
उस वक़्त मैं आकाश की तरफ़ देखता
और मुझे वह
ठीक जुगनुओं से भरी खाट लगता

कितना सुन्दर था बचपन
जो झाड़ियों में चू कर
खो गया

मैं धीरे-धीरे बड़ा हुआ
और जवान भी
और तुम मुझे ऐसे मिले
जैसे बचपन की खोई गेंद

मैंने तुम्हें ध्यान से देखा
मुझे अम्मा की याद आई
और लम्बी कहानियों की
और जुगनुओं से भरी खाट की
और मेरे पिछले सात जन्मों की
मैंने तुम्हें ध्यान से देखा
और संसार आईने-सा झिलमिलाया किया

उस दिन मुझे महसूस हुआ
तुमसे सुन्दर
दरअसल इस धरती पर
कुछ भी नहीं था ।

बाज़

सुबह का सिपहसालार अपनी मशालें लेकर आता है
शहर में चुपचाप दाख़िल होता है उजाला
मैं दरवाज़ा नहीं खोलता
हवा का क़ासिद कुछ सूखे पत्ते रख जाता है दरवाज़े पर
मैं दरवाज़ा नहीं खोलता
शाम को आकाश में कई रंग होते हैं जिनसे बन सकती है एक मुकम्मल तस्वीर
मैं एक ऐसा मुसव्विर हूँ जिसकी कूची दम तोड़ चुकी है
मैं दरवाज़ा नहीं खोलता

हर रोज़ कुछ तेज़ धड़कता है दिल
हर रोज़ कुछ ज़्यादा घुटती है साँस
हर रात खुलता है मेरा दरवाज़ा बेख़ौफ़
हर रात सीने पर उतरता है रात का बाज़ !

वे जानते थे

आँखें रहीं घड़ियाँ
जिनमें पतझड़ सबसे अधिक बार बजा
देह रहा : जर्जर पेड़
जिसमें पीड़ाओं ने सबसे ज़्यादा घोंसले बनाए
हृदय रहा वह रस्ता
जिस पर जमा हुए
सबसे अधिक लाशों के ऊढ़े

प्रेम का निर्झर
राख बना
झड़ा
झड़ता रहा
ढँकता रहा
आत्मा को
जिनसे खिलते रहे घावों के फूल

रोना जिनके लिए प्रेम में था
सबसे बड़ा अनैतिक कर्म
उन्होंने ही कहा : थाम लो आँसू !
क्योंकि वे अच्छी तरह जानते थे
रोने से कम हो जाती है पीड़ा ।

तन्दूर

सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब
मेरे कमरे की कँटीली दीवार का नाम है
और दरवेश
एक मानूस असीर का
चर्ख़
एक बूढ़ा अइयार है
जिसकी मक्कारी मेरे इदराक को मुसलसल फ़रेब देती है

मेरी नींद के फाटक पर
सौ मन भारी
ताला लटका हुआ है
जिसकी चाबी नहर-ए-दूद में खो गई
मुझे याद नहीं मेरे हवास की सूरत कुछ भी

मैं
एक ख़्वाब से निकल कर
बदहवास
दूसरे ख़्वाब में दाख़िल होता हूँ
बदन में शोलःज़न होता है भूरा साँप
हर दूसरी छटपटाहट पहली को बोसे देती है
कमरे का ठण्डा सीला सन्नाटा
भीतर की हर आवाज़ को
ओक से सुड़ककर पी जाता है

मेरी ख़्वाबगाह एक खौलता तन्दूर है
जिसमें रोटियाँ नहीं
मेरा गोश्त पकता है ।

कविता-पाठ

एक

मैं चाहता हूँ जब काव्य-पाठ के लिए मँच पर बुलाया जाऊँ
तो अपनी उन कविताओं को सुनाऊँ जिन्हें बरसों से लिख रहा हूँ
और जो शायद अब तक शर्मिन्दगी की हद तक अधूरी हैं

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता पढ़ूँ कोई बीच में उठे और मुझे टोक दे कि क्या बकवास पढ़ रहा हूँ जिसका न कोई ओर है और न कोई छोर

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता के सबसे कारुणिक प्रसँग वाली पँक्तियाँ पढ़ूँ तो किसी की पेट में गुदगुदी पड़ जाए और वह हँसता हुआ दोहरा हो जाए
और जब हास्यास्पद प्रसँग बयान करती पँक्तियाँ पढ़ूँ तो कोई सभा में दहाड़े मार रोना शुरू कर दे

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता पढ़ूँ तो कोई श्रोता पँक्ति से उठकर मेरी खिल्ली उड़ाए

मैं चाहता हूँ उन अधूरी कविताओं पर, जो शर्मिन्दगी की हद तक अधूरी हैं, किसी के होंठ कुछ कहने को हिलें लेकिन कोई शब्द न निकले
बल्कि विचलन में वह अपनी कुर्सी से उठे और काव्य-पाठ के दौरान ही सभा छोड़ कर बाहर चला जाए ।

दो

मैं चाहता हूँ जब कविता पाठ के लिए मँच पर जाऊँ
तो कोई हास्यास्पद मुद्रा न अख़्तियार करते हुए
बिना किसी ग़ैरज़रूरी भूमिका के सीधे कविता शुरू कर दूँ

मैं चाहता हूँ कविता में आई चीटियाँ मेरे माथे पर रेंगती हुई मेरे बालों के झँखाड़ में घुस जाएँ
और हरे टिड्डे मेरे कन्धों पर मुन्किर-नकीर की जगह तैनात हो जाएँ

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता पढ़ूँ तो कविता में आया चान्द मेरे चेहरे की तरह पीला पड़ जाए
और रात मेरी आँखों की तरह सूनी और काली पड़ जाए

मैं चाहता हूँ जब मैं कविता पढ़ूँ तो कविता में बजती राइफ़ल की आवाज़
सभा में आतँक पैदा कर दे
और कविता में आई घास
सभा की ज़मीन पर
दरी-सी बिछ कर श्रोताओं के तलुवों में चुभ जाए

मैं चाहता हूँ कविता में आई रेत
श्रोताओं की आँखों में भर कर किरकिराए
और दृश्य को कई बार पोंछ कर साफ़ कर दे

मैं चाहता हूँ कविता में आया लहू मेरी आँखों से टपक कर
मुझे अन्धा कर दे
और फिर कोई श्रोता अफना कर उठे
और मेरी जगह
अपनी आवाज़, अपने शब्दों में कविता पूरी करे ।

मेरी दुनिया के तमाम बच्चे 

वो जमा होंगे एक दिन और खेलेंगे एक साथ मिलकर
वो साफ़-सुथरी दीवारों पर
पेंसिल की नोक रगड़ेंगे
वो कुत्तों से बतियाएँगे
और बकरियों से
और हरे टिड्डों से
और चीटियों से भी..

वो दौड़ेंगे बेतहाशा
हवा और धूप की मुसलसल निगरानी में
और धरती धीरे-धीरे
और फैलती चली जाएगी
उनके पैरों के पास..

देखना !
वो तुम्हारी टैंकों में बालू भर देंगे
और तुम्हारी बन्दूकों को
मिट्टी में गहरा दबा देंगे
वो सड़कों पर गड्ढे खोदेंगे और पानी भर देंगे
और पानियों में छपा-छप लोटेंगे…

वो प्यार करेंगे एक दिन उन सबसे
जिससे तुमने उन्हें नफ़रत करना सिखाया है
वो तुम्हारी दीवारों में
छेद कर देंगे एक दिन
और आर-पार देखने की कोशिश करेंगे
वो सहसा चीख़ेंगे !
और कहेंगे —
“देखो ! उस पार भी मौसम हमारे यहाँ जैसा ही है”
वो हवा और धूप को अपने गालों के गिर्द
महसूस करना चाहेंगे
और तुम उस दिन उन्हें नहीं रोक पाओगे !

एक दिन तुम्हारे महफ़ूज़ घरों से बच्चे बाहर निकल आएँगे
और पेड़ों पे घोंसले बनाएँगे
उन्हें गिलहरियाँ काफ़ी पसन्द हैं
वो उनके साथ बड़ा होना चाहेंगे..

तुम देखोगे जब वो हर चीज़ उलट-पुलट देंगे
उसे और सुन्दर बनाने के लिए..

एक दिन मेरी दुनिया के तमाम बच्चे
चीटियों, कीटों
नदियों, पहाड़ों, समुद्रों
और तमाम वनस्पतियों के साथ मिलकर धावा बोलेंगे
और तुम्हारी बनाई हर चीज़ को
खिलौना बना देंगे..

ठूँठ की तरह 

आसमान को
कुछ याद नहीं
कि वो किसके सिर पर
फट पड़ा था एक दिन

ज़मीन को भी कुछ याद नहीं
कि उसने किस-किस की
पसलियाँ तोड़ के रख दी थीं

उन खरोंचों और चोटों को
भूल चुके हैं लोग
और शायद हम भी
अब कहाँ याद है कुछ…

एक दिन तुम भी
मुझे भूल जाओगे
लेकिन मैं बड़ा ही ज़िद्दी पेड़ हूँ

तुम्हारी स्मृतियों में
ठूँठ की तरह
बचा रह जाऊँगा…

(रचनाकाल: 2016)

बारिश में एक पैर का जूता 

गुरुद्वारे के बाहर
एक कार के ठीक सामने
बारिश में एक पैर का जूता भीग रहा है
पानी पर मचलता हुआ
उत्सव मना रहा है

मैं
रिक्शे से गुज़रते हुए
उसे देख रहा हूँ

सब ने छतरियाँ ओढ़ ली हैं
या छज्जों की ओट में आ गए हैं
सब कुछ धीमा-सा पड़ गया है

बारिश का संगीत
जूते को मस्त किये हुए है
इन हाँफते हुए लोगों में मुझे
जूता ज़्यादा आकृष्ट कर रहा है

जूता
जिसे अपने पाँव के खो जाने का
शायद कोई दुःख नहीं है !

(रचनाकाल: 2016)

गमछा

पिता जब कभी शहर को जाते
माँ झट से अलमारी से गमछा निकालकर
पिता के कन्धों पर धर देती
जैसे अपनी शुभकामनाएँ लपेट कर दे रही हो
कि सकुशल घर लौट आना
मुन्हार होने से पहले।

जब माँ अपने यौवन में ही ब्याह कर आई थी पिता के घर
तब भी शायद उसने अपने सारे स्वप्नों को एक गमछे में लपेटकर
पिता को सौंप दिया था

पिता
जो दुनियादारी के कामों में अक्सर चूक जाते
गच्चा खा जाते
कई बार भूल जाते अपना चश्मा
अपनी क़लम
दुकान की चाबी और तमाम चीज़ें
शायद उसी तरह माँ के स्वप्नों की पोटली भी
कहीं खो आए
शहर जाते हुए किसी दिन।

माँ
जिसे मैंने टीवी और फिल्मों में दिखने वाली
पत्नियों की तरह व्यवहार करते हुए कभी नहीं देखा
कभी कुछ खुल कर माँगते-मनवाते नहीं देखा
माँ जो सिर्फ़ माँ ही थी
शायद पिता के लिए भी
कभी न पूछ सकी पिता से कि वे कहाँ उसके
स्वप्नों की पोटली छोड़ आए…

जब एक दिन ट्रेन पकड़ने के लिए घर से निकला
माँ ने मेरे
कन्धों पर भी गमछा डाल दिया
और मैंने सहसा अपने कन्धों पर काफी वज़न महसूस किया

जब स्टेशन पर अकेले किसी कोने में बैठा
ट्रेन का इन्तज़ार कर रहा था
कन्धे पर पड़े गमछे की तरफ मेरी नज़र गई
जिसका मुँह मेरी ही तरह लटका हुआ था
और मैंने महसूस किया माँ के हाथ का दबाव
जो वैसे का वैसा ही अब भी गमछे में लिपटा पड़ा था
माँ का विदा में उठा हाथ याद आया मुझे
और पिता का थका कंधा भी
जो अब गमछे के वज़न से भी अक्सर झुक जाता था…

गमछा जो अब पूरे रास्ते मेरा साथी बनने वाला था
मैंने उसपर हाथ फेरा
और उसे देखकर शुक्रिया अदा करने की मुद्रा में मुस्कुराया.

गाँव से हज़ारों मीलों दूर
इस महानगर में जब कभी बाहर धूप में निकलता हूँ
तो अपने उदास और कड़े दिनों के साथी
अपने गमछे को उठाता हूँ और उसे ओढ़ लेता हूँ
क्यूँकि मुझे यक़ीन है इस गमछे पर
इसके एक-एक रेशे पर
जिसमें मेरा ही नमक जज़्ब है !

और
सच कहूँ तो
एक पुरबिहा के लिए गमछा
महज़ एक कपड़े का टुकड़ा भर ही नहीं है
बल्कि उसके कन्धों पर बर्फ़ की तरह
जमा उसका समय भी है !

(रचनाकाल: 2016)

पुन्नू मिस्त्री 

मेरे कमरे की बालकनी से दिख जाती है
पुन्नू मिस्त्री की दुकान
जहाँ एक घिसी पुरानी मेज़ पर
पुन्नू ख़राब पँखे ठीक करता है
जब सुबह मैं
चाय के साथ अख़बार पढ़ता हूँ
वो पँखे ठीक करता है
और जब मैं शाम की चाय
अपनी बालकनी के पास खड़े होकर पीता हूँ
पुन्नू तब भी पँखे ठीक करता दिख जाता है

मुझे नहीं मालूम कि उसे पँखे ठीक करने के अलावा भी
कोई और काम आता है या नहीं
या उसे किसी और काम में कोई दिलचस्पी भी होगी
पुन्नू मिस्त्री की कलैण्डर में कोई इतवार नहीं आता
मुझे नहीं पता जबसे ये कॉलोनी बसी है
तबसे पुन्नू पँखे ही ठीक कर रहा है या नहीं
लेकिन फिर भी मुझे पता नहीं ऐसा क्यूँ लगता है कि
सृष्टि की शुरूआत से ही पुन्नू पंखे ठीक कर रहा है..

मेरे पड़ोसी कहते हैं कि, “पुन्नू एक सरदार है”
कोई कल कह रहा था कि, “पुन्नू एक बोरिंग आदमी है”
मुझे नहीं मालूम कि बाक़ी और लोगों की क्या राय होगी
इस दाढ़ी वाले अधेढ़ पुन्नू मैकेनिक के बारे में
लेकिन मैं कभी-कभी सोचता हूँ कि कोई दिन मैं अपनी गली भूल जाऊँ
और पुन्नू भी कहीं और चला जाए
तो मैं अपने घर कैसे पहुँचूँगा?

मुझे पुन्नू इस गली का साइनबोर्ड लगता है
जिसका पेण्ट जगह-जगह से उखड़ गया है
लेकिन फिर भी अपनी जगह पर वैसे ही गड़ा है
जैसे इसे यहाँ गाड़ा गया होगा
पुन्नू की अहमियत इस गली के लोगों के लिए क्या है
ये शायद मुझे नहीं मालूम
लेकिन मुझे लगता है कि
पुन्नू की दुकान इस गली की घड़ी है
जो इस गली के मुहाने पर टँगी है…

(रचनाकाल: 2016)

ढिबरी 

ये बात है उन दिनों की
जब रात का अन्धेरा एक सच्चाई होती थी
और रौशनी के लिए सीमित साधन ही मौजूद थे मेरे गाँव में
जिसमें सबसे इज़्ज़तदार हैसियत होती थी लालटेन की
जिसे साँझ होते ही पोंछा जाता था
और उसके शीशे चमकाए जाते थे
राजा बेटा की तरह माँ और बहने तैयार करती थीं उसे
लेकिन मुझे तो वो बिल्कुल मुखिया लगता था
शाम को
घर के अन्धेरों का

लालटेन, प्रायः घरों में एक या दो ही होती थीं
जिन्हें प्रायः
अन्हरकूप घरों की इज़्ज़त रखने वाली जगहों पर ही
बारा जाता था
मसलन, बैठके में या फिर रसोईघर में

कभी-कभी तेल ख़तम हो जाने पर हम ढिबरी में पढ़ते थे
मुझे आता था हाजमोला की शीशी से ढिबरी बनाना
एक छेद टेकुरी से उसके ढक्कन में
फिर बाती पिरो कर तेल भरना होता था, बस

ढिबरी जलने से करिया जाता था ताखा
जिसे सुबह गीले कपड़े से पोंछना पड़ता था
ढिबरी का प्रकाश बहुत कमज़ोर होता था
आँखों पर बहुत ज़ोर पड़ता था पढ़ने में
ढिबरी को यहाँ-वहाँ ले जाने में
उसके बुझने का धड़का भी बराबर लगा रहता था
उसके लिए ज़रूरत होती थी
सधी हथेलियों और सधे क़दमों के ख़ूबसूरत मेल की

अब इस नई दुनिया में
जहाँ ढिबरी एक आदिम युग की बात लगती है
मैं जब याद करता हूँ अपना अन्धेरा बचपन
जहाँ अब भी बिजली नहीं पहुँचती
और न ही काम आती है ज़ोरदार टॉर्च
आज भी उसी ढिबरी से आलोकित होता है
वो पुराना ठहरा समय
जहाँ एक ढिबरी अब भी लुढ़की पड़ी है
जिसका तेल
बरामदे के कच्चे फ़र्श पर फैल रहा है …

घर 

ये मेरा घर है
जहाँ रात के ढाई बजे मैं
खिड़की के क़रीब
लैम्प की नीम रौशनी में बैठा
कविता लिख रहा हूँ
जहाँ पड़ोस में लछन बो
अपने बच्चों को पीटकर सो रही है
और रामचनर अब बँसखट पर ओठँग चुका है
अपनी मेहरारू-पतोहू को
दिन भर दुवार पर उकड़ूँ बैठकर
भद्दी गालियाँ देने के बाद …।

जहाँ बाँस के सूखे पत्तों की खड़-खड़ आवाज़ें आ रही हैं
जहाँ एक कुतिया के फेंकरने की आवाज़
दूर से आती सुनाई पड़ रही है
जहाँ पड़ोस के
खण्डहर मकान से
भकसावन-सी गन्ध उठ रही है

जहाँ अनार के झाड़ में फँसी पन्नी के फड़फड़ाने की आवाज़
रह-रह कर सुनाई दे रही है
जहाँ पुआल के बोझों में कुछ-कुछ हिलने का आभास हो रहा है
जहाँ बैलों के गले में बन्धी घण्टियाँ
धीमे-धीमे स्वर में बज रही हैं
जहाँ बकरियों के पेशाब की खराइन गन्ध आ रही है

जहाँ अब्बा के तेज़ खर्राटे
रात की निविड़ता में ख़लल पैदा कर रहे हैं
जहाँ माँ
उबले आलू की तरह
खटिया पर सुस्ता रही है
जहाँ बहनें
सुन्दर शहज़ादों के स्वप्न देख रही हैं ।

अचानक यह क्या ?
चुटकियों में पूरा दृश्य बदल गया !
मेरे पेट में तेज़ मरोड़ उठ रहा है
और मेरी आँखें तेज़ रौशनी से चुन्धिया रही हैं
तोपों की गरजती आवाज़ों से मेरे घर की दीवारें थर्रा रही हैं
और मेरे कान से ख़ून बह रहा है

अब मेरा घर
किसी फ़िलिस्तीन और सीरिया और इराक़
और अफ़ग़ानिस्तान का कोई चौराहा बन चुका है
जहाँ हर मिनट एक बम फूट रहा है
और सट्टेबाजों का गिरोह नफ़ीस शराब की चुस्कियाँ ले रहा है।

अब आसमान से राख झड़ रही है
दृश्य बदल चुका है
लोहबान की तेज़ गन्ध आ रही है
अब मेरा घर
उन उदास-उदास बहनों की डहकती आवाज़ों
और सिसकियों से भर चुका है
जिनके बेरोज़गार भाई पिछले दँगों में मार दिए गए।

मैं अपनी कुर्सी में धँसा देख रहा हूँ
दृश्य को फिर बदलते हुए
क्या आप यक़ीन करेंगे ?

जँगलों से घिरा गाँव
जहाँ स्वप्न और मीठी नींद को मज़बूत बूटों ने
हमेशा के लिए कुचल दिया है
जहाँ बलात्कृत स्त्रियों की चीख़ें भरी पड़ी हैं
जिन्हें भयानक जँगलों या बीहड़ वीरानों में नहीं
बल्कि पुलिस स्टेशनों में नँगा किया गया ।

जंगलों से घिरा गाँव
जहाँ स्वप्न और मीठी नींद को मज़बूत बूटों ने
हमेशा के लिए कुचल दिया है
जहाँ बलात्कृत स्त्रियों की चीख़ें भरी पड़ी हैं
जिन्हें भयानक जंगलों या बीहड़ वीरानों में नहीं
बल्कि पुलिस स्टेशनों में नंगा किया गया ।

मेरा यक़ीन कीजिए
दृश्य फिर बदल चुका है
आइए मेरे बगल में खड़े होकर देखिए —
उस पेड़ से एक किसान की लाश लटक रही है
जो क़र्ज़ में गले तक डूब चुका था
उसके पाँव में पिछली सदी की धूल अब तक चिपकी है
जिसे साफ़ देखा जा सकता है
बिना मोटे चश्मों के ।

मेरा यक़ीन कीजिए
हर क्षण एक नया दृश्य उपस्थित हो रहा है
और मेरे आस-पास का भूगोल तेज़ी से बदल रहा है
जिसके बीच
मैं, बस, अपना घर ढूँढ़ रहा हूँ …।

(रचनाकाल: 2017)

खोज

 मैं तुम्हारी खोज में,
युगों से रत रहा,
सुबह जब मैं आँख मलते हुए,
उठा ,
और देखा ,
सूरज की किरणों का जाल,
जिसने मेरी अबोध दृष्टि,
उचकने का प्रयास किया,
मैं समझा तुम ,
प्रकाशपुँज हो।

जब भूख ने मुझे,
विचलित किया,
और मैं इसे,
शान्त करने हेतु,
जंगलों में फिरने लगा,
और मैंने नाना प्रकार के,
वृक्षों का अवलोकन किया,
जो सुदृढ़ और विशाल थे,
मैं समझा तुम सर्वव्पापी,
और हर तरफ़ से मुझे,
घेरे हुए हो।

फिर मैंने अपने भोजन,
की व्यवस्थित संस्था का,
विकास किया,
कृषि की खोज की,
और एक दिन ओले और तूफ़ान ने,
मेरी फ़सल को बर्बाद ,
कर दिया,
तब मैं समझा ये तुम हो,
जो सर्वशक्तिमान हो।

फिर रात ने दस्तक दी,
और मैं तुम्हारी बनाई भूमि पर,
एक फ़लसफ़ी की भाँति,
पसर गया,
और आकाश को,
असँख्य तारा मण्डलों से,
सुसज्जित पाया,
मैं चीख़ उठा,
ये तुम हो,
जो धरती पर नहीं,
बल्कि आसमानों में रहते हो।

और युगों युगों तक,
इन्ही भ्रमों में,
जीता रहा।

मैसोपोटामिया, मोहन-जोदड़ों,
मिस्र, फ़ारस और यूनान ,
इत्यादि सभ्यताएँ,
मेरी गवाह बनीं।

मैंने तुम्हे प्रस्तर-खण्डों में खोजा,
तो कहीं घाटी की धुन्ध में,
कभी नार की लपटों में,
तो कभी शँख-नाद में,
जैसे-जैसे मेरे मस्तिष्क का,
विकास हुआ ,
मैंने वैसे-वैसे तुम में
नए गुणों के दर्शन किए
और उनकी व्याख्या की
तुम्हारे लिए गगन-चुम्बी
प्रतिमाएँ और मन्दिर बनाए
तुमसे मिन्नतें, मुरादें की
अब तुम मेरी सभी सफलताओं
और असफलताओं के
पर्याय बन गए।

फिर मैं अपने विकास के उत्कर्ष
पर पहुँचा
और अब मैंने तेरी सत्ता
मानने से इनकार कर दिया
क्योंकि अब मैं
अत्याधुनिक हो चुका था .
फिर इस अन्धी प्रगति में
मैंने अपनी ही क़ब्र खोदनी
शुरू की
और एक दिन मेरा ही
बनाया सूरज
मुझे लील गया।

और आज मेरी तुमसे भेंट
हुई
‘हा-हा’-
तुम हँसते रहे
मुझ पर सदैव

शायद सोचते होंगे
‘मैंने भी
एक अनोखे जीव की
सृष्टि की’।

(रचनाकाल: 2016)

अन्तिम फैसला 

हमारी मेहनत
हमारे गहने हैं,
हम अपना श्रम बेचते हैं,
अपनी आत्मा नहीं,
और तुम क्या लगा पाओगे हमारी क़ीमत?

तुम हमें हमारा हक़ नहीं देते,
क्योंकि तुम डरते हो,

तुम डरते हो
हम निहत्थों से,
तुम मुफ़्त खाने वाले हो,

तुम हमें लाठी और,
बन्दूक की नोक पे,
रखते हो

लेकिन याद रक्खो,
हम अगर असलहे उठा लेंगे,
तो हम दमन नहीं,
फ़ैसला करेंगे

(रचनाकाल: 2016)

पहचान

बचपन में मुझे
माँ और पिता के बीच में
सुलाया जाता

मेरी नींद कभी-कभार
बीच रात में ही
टूट जाती
और मैं उठते ही माँ को ढूँढता।

घुप्प अन्धेरे में
एक जैसे दो शरीरों में
मैं अन्त नहीं कर पाता
इसलिए मैं
अपनी तरफ़ ढुलक आए
दोनों चेहरों को टटोलता।

पिता की नाक
काफ़ी बड़ी थी
सो मैं उन्हें पहचान जाता
मेरे लिए जो पिता नहीं थे
वो ही माँ थी
इस तरह मैंने अन्धेरे में
माँ को पहचानना सीखा।

(रचनाकाल: 2016)

समय का तिलिस्म 

समय के हाथ में
एक अद्भुत तिलिस्म होता है
ये जीवितों को मार भी देता है
और मुर्दों को ज़िन्दा भी कर देता है
समय और इतिहास के
आयामों में
चींख़ें,रोदन और नारे
हमेशा गूँजते रहते हैं
अनवरत, लगातार, बारम्बार।

राख हो चुकी ज्वाला में भी
चिंगारी दबी होती है
जो कब, कैसे और किस रूप में
भड़क उट्ठे
कोई नहीं जानता।

समय का तिलिस्म
बहुत ही ख़तरनाक और
रोमांचक होता है
जिसकी पेचीदा गलियों में
मैं
अक्सर भटक जाता हूँ।

जहाँ कुछ भी स्पर्श करता हूँ
तो सजीव हो उठता है
मेरी आँखों में आँखें डालकर
देखने लगतीं हैं
इतिहास के पन्नों पर दर्ज
तारीख़ें
जो मानो जवाब पाने
की ही
प्रतीक्षा में बैठीं हों।

और मेरे पास उनका
कोई जवाब नहीं होता
और फिर यह तिलिस्म
छटने लगता है
और एक अजीब सी-ख़ामोशी
मुझसे लिपट जाती है.

(रचनाकाल: 2016)

अकेलापन 

एक

अकेलापन तुम्हें घेरेगा हवा की तरह
तुम्हें उदास करेगा जैसे पतझड़ में झड़ते हैं सूखे पत्ते
और उदास हो जाती है प्रकृति
अकेलापन तुम्हें धिक्कारेगा तुम्हें बहलाएगा तुम्हें पगलाएगा
अकेलापन तुम्हें अवकाश देगा आत्मा के छन्द को सुनने का
उसे रचने के औज़ार तराशने का
अकेलापन तुम्हें उलझाएगा
तुम्हें स्मृतियों के समुद्र में डुबाएगा
तुम्हें रुलाएगा
तुम्हारे गीले आकाश पर तारों की तरह टिमटिमाएगा वो
तुम्हें मसखरे की तरह हँसाएगा
अकेलापन तुमसे शाम के झुटपुटे में बेल की तरह लिपट-लिपट जाएगा

अकेलापन एक जगह होगी
जहाँ तुम ‘होने’ का अर्थ खोजोगे
अकेलापन तुम्हें अधिक मनुष्य और अधिक निष्ठुर बनाएगा ।

दो

तपती है दुपहरिया
उड़ती है लू
कमरे में जमती है महीन धूल की चादर
कानों को अखरती है पँखे की कर्कश आवाज़

किताबें मुँह फुलाए घूरती हैं
देख-देख हतोत्साहित होता हूँ
उँगलियाँ चटकाता हुआ

आत्मा धँसती है शरीर की झाड़ियों में
देह धँसती है बिस्तरे में

दिन का डाकिया
उड़ेल देता है बालकनी पर सुनहरे पत्र
सूख जाते हैं अलगनी पर रँग-बिरँगे कपड़े
जिन्हें फैलाते हैं कोमल हाथ
देर तक गूँजती है गलियारे में नन्ही बच्ची की आवाज़
उड़ जाती है डाल से आख़िरी चिड़िया

एक स्त्री की चीख़ घुट जाती है उसके सूने बरामदे में
वो हँसती है जैसे फट जाता है साज़ का पर्दा
खीझती है ख़ुद पर; पटकती है बर्तन
हँसती है और छुप कर रो-रो लेती है

जर्जर पेट ऐंठता है दोनों का
दुखती है गुदा…

हम मारे गए

जब दुःख रिस रहे थे
हमारी आत्मा के कोनों-अन्तरों से
हम पागलों की तरह सर धुनते थे

हम स्वप्न में भी भागते
और बार-बार गिर पड़ते
हम अन्धेरे द्वीपों के किनारों पर
खड़े विलाप करते

हमारा अन्त हमें मालूम था
आप, बस, इतना ही समझिए
कि हम कवि थे
और कविता के निर्मम बीहड़ एकान्त में
मारे गए !

(रचनाकाल: 2016)

ठिठुरते लैम्प पोस्ट

वे चाहते तो सीधे भी खड़े रह सकते थे
लेकिन आदमियों की बस्ती में रहते हुए
उन्होंने सीख ली थी अतिशय विनम्रता
और झुक गए थे सड़कों पर

आदमियों के पास, उन्हें देखने के अलग-अलग नज़रिए थे :
मसलन, किसी को वे लगते थे बिल्कुल सन्त सरीखे
दृढ़ और एक टाँग पर योग-मुद्रा में खड़े
किसी को वे शहंशाह के इस्तक़बाल में
क़तारबन्द खड़े सिपाहियों-से लगते थे
किसी को विशाल पक्षियों से
जो लम्बी उड़ान के बाद थक कर सुस्ता रहे थे
लेकिन एक बच्चे को वे लगते थे उस बुढ़िया से
जिसकी अठन्नी गिर कर खो गई थी; जिसे वह ढूँढ़ रही थी
जबकि किसी को वे सड़क के दिल में धँसी
सलीब की तरह लगते थे

आदमियों की दुनिया में वे रहस्य की तरह थे
वे काली ख़ूनी रातों के गवाह थे
शराबियों की मोटी पेशाब की धार और उल्टियों के भी

जिस दिन हमारे भीतर
लगातार चलती रही रेत की आँधी
जिसमें बनते और मिटते रहे
कई धूसर शहर
उस रोज़ मैंने देखा
ख़ौफ़नाक चीख़ती सड़कों पर
झुके हुए थे
बुझे हुए
ठिठुरते लैम्प पोस्ट…।

गायें 

सुबह होती है
और गायें खूँटों पर बन्धी रम्भाती हैं और चारा माँगतीं हैं
गायें दिन-दिन भर चरवाहे के साथ चरने जातीं हैं
और शाम को लौट आती हैं अपने खूँटे पर
और रम्भाती हैं ।

दुधारू गायें दुही जाती हैं और पूजी जाती हैं ।
गायें मुँह उठाए देखती हैं रास्तों की तरफ
मनुष्यों को गुज़रते हुए देखती हैं गायें
गायों ने देखा है कितने-कितने मनुष्यों को
कितनी-कितनी बार गुज़रते हुए
गायों ने देखा है युद्ध नायकों और सैनिकों को
कितनी-कितनी बार गुज़रते हुए
गायों की एक झपकी में समय का
पूरा लश्कर गुज़र जाता है
चुपचाप ।

गायें सानी खाती रहती हैं
और मध्यप्रदेश में एक मुसलमान
गोकशी के जुर्म में मार दिया जाता है !
गायों के गले में बन्धी घण्टियाँ बजती हैं
गायें सुनती हैं राजस्थान में
गोकशी के जुर्म में मारे गए एक मुसलमान के बारे में

गायें अपनी पूँछ से मच्छरों को हाँकती हैं
अपने खुर पटकती हैं
पिटती हैं कोई खाने की चीज़ झपटते हुए बाज़ारों में
मण्डियों में अपने पुट्ठों पर ज़ख्म लिए
फिरती हैं गायें
बूढ़ी गायें अपने डाँगर शरीर लिए धीरे-धीरे चलती हैं
कभी कूड़े के ढेर में खाने की कोई चीज़ तलाशती हुई
कभी दीवार में देह रगड़ती हुई ।

गायें सुनती हैं एक मुसलमान की सार्वजनिक हत्या की ख़बर
गायें अपनी नान्द में मुँह घुसाये चारा खाती हैं
बैठ कर पगुराती हैं ।

गायें गायों से मनुष्यों के बारे में नहीं पूछतीं
गायें गायों से मुसलमानों के बारे में नहीं पूछतीं
गायें मनुष्यों से मनुष्यों के बारे में कोई सवाल नहीं करतीं

बस, एक दिन गायें
स्वयँ उठकर चली जाती हैं
बूचड़खानों की तरफ़ …

(रचनाकाल : 2017, दिल्ली)

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