अनंतप्रसाद रामभरोसे की रचनाएँ

बच्चा होना, कितना अच्छा 

बच्चों के संग बच्चा होना
कितना अच्छा लगता है!

कभी खेल में हँसना गाना
ता-ता थैया नाच दिखाना,
और कभी नाराज सभी से
हो जाना, फिर मुँह लटकाना।
झूठ-मूठ ऊँ-ऊँ कर रोना
कितना अच्छा लगता है!

गाल फुला आँखें मिचकाना
करना काम कभी बचकाना,
बंदर जैसी हरकत करके
कभी डराना फिर भग जाना।
खाना झूठ मूठ ले दौना
कितना अच्छा लगता है!

कल्लू नीनू चुन्नू-दीनू
के संग मिलकर गप्प लड़ाना,
इंजन बनकर छुक-छुक करना
या टिक-टिक घोड़ा बन जाना।
ऊपर लाद सभी को ढोना
कितना अच्छा लगता है!

खटर-पटर मत कर 

खटर-पटर मत कर दी चुहिया,
खटर-पटर मत कर!
तेरी खटर-पटर से मम्मी
हो जाती है तंग,
फिर भी बाज न आती हो तुम
करने से हुड़दंग।
क्यों शैतानी दिखलाती हो,
तुम मेरे ही घर!
कुटुर-कुटुर खा जाती हो सब
गेहूँ, चावल, दाल,
और कुतर कर कपड़े सारे
करती हो बेहाल।
बिल्ली मौसी का भी तुमको
जरा नहीं है डर!
इतनी उछल-कूद भी अच्छी
बात नहीं होती,
तेरी जैसी चूहिया एक दिन
पछताती, रोती।
सोच-समझकर अब तू भी तो
सही काम कुछ कर!

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