अनिल मिश्र की रचनाएँ

पहाड़ी के पत्थर 

हवा दिशा बदलती है और पानी अपने रास्ते
इन पत्थरों पर बैठकर
आसमान अपने कपड़े बदलता है

लाखों वर्षों से निश्चल निर्विकार पड़े
एक विशाल शिलाखंड पर
कभी-कभी आती है एक थकी उड़ान
और छोड़ जाती है कोई टूटा हुआ पंख
अपनी कमर में डलिया बांधे स्त्रियां आती हैं
और आंसुओं से तर कर जाती हैं
पहाड़ी की छाती
उनके साथ आते हैं बच्चे
और लगातार कुछ समझाते रहते हैं पत्थरों को
कभी-कभी आता है हारा हुआ प्रेम
और किसी शिला के सीने से लिपट कर
बहुत रोता है

जिस में घुस नहीं पाती
लोहे की नुकीली छेनी
उन्हीं प्रस्तरों को चीरती
घुसती जाती है
कोमल पौधे की मुलायम जड़

भूखे पेट की रात लम्बी होगी

यह चौराहा है या इसे एक रंगमंच कहें
दिन भर यहां किनारे बैठा एक मोची होगा
जो जूतों की मरम्मत करते- करते
समय की मरम्मत करने लगेगा
तिजहरी कहीं उस तरफ अपने पैर सीट पर रखकर
सुस्ताते रिक्शा चालक हठयोग करेंगे
और शाम होते-होते सपने गुब्बारे बनकर
अपनी ओर खींचेंगे गरीब बाप का हाथ
तभी बेबसी की सुई बताएगी
इच्छाओं और सपनों की हकीकत
यह सब करते तीरथराज के कमंडल से निकलेगी
आधी रोशन आधी स्याह रात
और मजदूर गमछा बिछा कर सो जाएंगे फुटपाथ पर
भूखे पेट की रात लम्बी होगी

इस बीच कचरा घरों में कुत्ते
जूठन पर जमाने के लिए अपना हक
एक इंसान पर टूट पड़ेंगे
बहुत से किरदार अपनी आंखों में भरे कीचड़
अदृश्य हो जाएंगे किसी गली में
धीरे-धीरे कहीं से टहलती हुई सुबह पहुंचेगी
और अलग अलग दिशाओं से प्रकट होंगे
खंडहरों के ध्वंस और नव-निर्माण के नायक

यहां चीनी और नमक की तरह बिकेगा श्रम
ग्राहक बनकर आएंगे
सेठ साहब के वफादार
बड़ी-बड़ी योजनाओं की डिजाइन लिए हाथ

शहर के नक्शे में ठिठका
इच्छाओं की पहाड़ी में बीचों बीच उगा हुआ एक पेड़ है
जो आश्वासन देता है
कभी दिन पलट जाने का
वह अपनी ओर बुलाता है
चिकने मुलायम हाथ
और लोहे की सींकों और ईंटों से लड़ने के लिए
हाथों को खुरदरा कर वापस भेज देता है

सारी घटनाओं से बेपरवाह वो शांत रहते हैं
उनकी आंखें देखती जाती हैं
उगता हुआ प्रभात ढलते हुए दिन
एक समर जो जिन्दगी के बाहर से लगातार
अन्दर की ओर चला आता है
और वो कुछ कर नहीं पाते

कल जो एक सौ पचास आए थे
आज दो तीन कम हो जाएंगे
किसी मंजिल से अंधेरी गुफाओं में गिरते हुए
स्वेद बिंदुओं की जगह
रक्त से रंगते हुए धरती का आंचल
अचानक छूट जाएंगे हमेशा के लिए
जिंदगी के हाथों से उनके हाथ

स्कूल की किताबों में जब पढ़ाई जाएगी
बादशाह की सौंदर्य प्रियता
वास्तु विदों के नाम से मशहूर की जाएंगी भव्य इमारतें
उनकी आत्माएं इसी चौराहे पर इकट्ठा होकर
देखेंगी अपनी संतानों को
इतिहास की किताबों से फिर- फिर छले जाते हुए

विकास

पेड़ की डालें फैलती जाती हैं चारों ओर
डंठल और पत्तियों से बनाती घनी छतरी
धीरे-धीरे चिड़ियां भी आती हैं
और बना लेती हैं डालियों से लटकते घोंसले
फिर आती हैं लताएं पास जंगल से रेंगती हुई
लिपट जाती हैं ऊपर से नीचे तने के साथ
ऋतु आने पर महक आती है
फूलों की डोली में बैठी
कीट आते हैं पतंगे आते हैं
रंग आता है और आते हैं खट्टे-मीठे स्वाद
पीछे-पीछे आता है मनुष्य
और उस जगह विकास शुरू करने की घोषणा करता है

सावन की भरी नदी थी हमारा रास्ता 

मेरे पास तुम्हे याद करते हुए वो अधूरी कविता है
जिसे लिखी थी मैंने कभी उन्ही दिनों
जब फूलों से पराग लेकर
मधुमक्खियों की तरह हम शब्द बनाते थे
भरी हुई हैं जिसमें
करवटें बदल बदल कर काटती रातें
आसमान में थोड़ी दूर उड़ने के बाद
हवा में ही कट कर गिर जाने वाले पंख हैं
जब जब कोशिश करता हूं
कुछ पंक्तियां लिख कर पूरा करने की उसे
मैंने महसूस किया अंदर उस राख की तपन
जिसमे जिन्दा थीं आज भी बहुत सी चिनगारियां

उन दिनों को याद करते हुए मेरे पास
चुभते हुए कांटे हैं
बगीचे से चुराए सुर्ख गुलाब के
एक बड़े फूल के साथ साथ आ गए थे वो
किस्मत ऐसी कि सुर्ख फूल सूख कर स्याह हो गया
पर कांटे और भी कड़े और नुकीले
उन्हें ही तुम्हारा प्यार समझते हुए
मैंने किसी मूर्ति की तरह
अपने दिल के गर्भ गृह में
प्रतिष्ठित कर दिया है
अपनी चखी हुई खट मीठी बेरें
चढ़ाता हूं उन पर प्रसाद की तरह

मेरे पास कच्ची मिट्टी की गागर थी
और तैरना भी नहीं आता था
सावन की भरी नदी था हमारा रास्ता
इसके पहले कि हम किसी किनारे पर पहुंच पाते
गागर गल गई थी मेरी
मुझे पता नहीं था कि मैं डूब गया था
या मिल गया था किसी तिनके का सहारा
लेकिन वक्त को मैंने हिरन की तरह छलांगे लगाते
एक घने जंगल में गुम होते हुए देखा

खाली जगह

इस सृष्टि में कोई खाली जगह नहीं है
जिसे हम खाली समझते हैं
वहाँ अनजान देशों के संघर्षों के
उड़-उड़ कर आए असंख्य धूल-कण हैं
एक दूसरे को आवेशित करती विधुत-तरंगे हैं
वहाँ मूच्र्छित पड़ा है प्रेम
किसी मौसम में फिर हरा हो जाने के लिए

अपने प्रादुर्भाव के समय से
शांत-स्थिर पड़े विशाल पत्थर की
अखंड उदासी से
निकल आने की कशमकश है
वहाँ है चींटी के चलने की आवाज
और दूब के तिनके का हवा में हिलना है

अपनी पहली सन्तान होने पर
बरगद के पेड़ में धागे बाँधते समय
माँगी गयी तुम्हारी मेरी मनौतियां हैं
बेहद ऊमस भरी रात में
पस्त पड़े हौसलों को
अपनी बाहों का सहारा देकर उठाती
सुबह के सूरज की किरनें हैं
इसके अलावा वहाँ सच्चे-झूठे किस्से हैं
जिनके सहारे जीते आ रहे हैं हम

वहाँ गरज रहे हैं बादल
अपने कंधे पर बैठाए सदियों के आक्रोश
भविष्य में वहाँ अँधेरे और प्रकाश की
बनी पगडंडी पर
चला जा रहा है रूठा मनु
एक श्रद्धा सी लगने वाली स्त्री
पोटली में रखे बीजों को
छितरा रही है दशों दिशाओं में

इतिहास के अस्पताल के बाहर
एक सनकी शल्य-चिकित्सक ने
सजा रखी है
महान राजाओं और समाज-सुधारकों की
खोपड़ियों के अर्ध-सत्य की प्रदर्शनी
बहुत सी टूटी हुई उम्मीदे हैं
लेकिन उससे भी ज्यादा हैं बांसुरी के स्वर

घड़ी, घड़ी, रामायण 

इंतजार है विभाग के मुखिया का
पूरा होते ही प्रबन्ध
सूचना पर पधारेंगे

सजा दी गयी हैं
फूलों की मालाएँ
यथानिर्धारित मेज पर जलपान
माइक की टेस्टिंग हो रही है

रस्मी तौर पर कामरेड को
अलविदा कहेगा ये सभागार
जिसकी नियति में
मिलना ही बिछड़ना है
और बिछड़ना ही मिलना

पहली पंक्ति में बैठा कामरेड
मंचासीन होगा
आला अधिकारियों के बीच
कीमत चुकानी पड़ी उसे
इस सम्मान के लिए
पूरे अड़तीस साल

मन के लिए कुछ भी नही बदला
कल और आज का अन्तर
बताते हैं
सिर्फ आईना या कैलेण्डर
या फाइलों पर जमीं
धूल की परतें

सोचते हुए सत्य
उस सभागार में
कोई वर्तमान में नही था
उस सभागार में
कोई वर्तमान नहीं था

नाजुक शिशु की तरह
सर्दी और जुकाम से पीड़ित
भविष्य के सीने पर
सरसों का गरम तेल
मला जा रहा है
अतीत गंठिये के दर्द से
बैठ गया है
रास्ते की किसी बेंच पर

यह वह दिन है
जब दफ्तर के वाटर कूलर ने
कामरेड की गिलास से
कुछ कहा है
कुर्सी ने कुछ कहा तो नहीं……
बेवजह कुछ कहने से
बचती रही है कुर्सी

सभागार खचाखच भर चुका है
जितने बैठे हैं
उतने ही पीछे खड़े हैं लोग
कामरेड ने
अन्याय के विरूद्ध आंदोलन चलाए
कामरेड ने
लोहे को मोम की तरह गलाए
कामरेड ये थे कामरेड वो थे
कामरेड जो नहीं थे वो भी थे
किसी के गम ने कुछ कहा
किसी के अहम ने
कुछ न कहकर

भाषणों में दोस्ती और दुश्मनी के
कुछ निजी कारण सार्वजनिक हुए
कुछ अन्दर मसोस कर रह गये
अवसर देख कर

कामरेड को
भेंट की गयी छड़ी
कमर और घुटनों में
हौसला भरने के लिए
कल भी

कामरेड को
भेंट की गयी-
घड़ी
क्यों?
यह सही वक्त बतायेगी
यह वक्त ही बतायेगी

और अन्त में
तुलसी की एक रामायण
फिर पूछोगे क्यों?

कैसे कहें
कि कुछ शामों की सुबह नही होती
फाइल में नये पन्ने तो जुड़ते हैं
कोई लिखा पन्ना मगर
फिर से नही होता सादा

क्या अयोध्या क्या लंकाकांड
रोज ही उठाना पड़ता है धनुष बान
चार पद चौसठ मात्राएँ
तय करेंगी आगे की यात्राएँ

भाइयों और बहनों
सेवा से लेते अवकाश
साथी के हाथों में है
एक महाकवि की कृति

इतना तो वह अच्छी तरह समझता है
कि हर किसी को लिखना होता है स्वयं
अपने जीवन का उत्तरकांड

पतंगें 

शरद के नीले आसमान में
उड़ रही हैं रंग बिरंगी पतंगे
किसी पर ओबामा उड़ रहे हैं
किसी पर मदीबा

जब उड़ती है एक पतंग
आसमान बाहें फैलाकर उसे चूमता है
सूरज अपने रथ को तनिक नीचे ले आता है
उसकी पीठ थपथपाने
चिड़ियां चकित होकर देखती हैं
उसकी अठखेलियां
बाहों में बाहें डाल स्वप्न
उड़ते हैं इरादों के साथ
और हारे और उदास चेहरों पर छिड़कते हैं
हौसलों के पवित्र जल

रात भर की बेचैनी के बाद
बच्चों की आंखों की टिम टिम
छतों या मैदानों में
पतंगों की पीठ पर सवार होकर
निकल पड़ती है एक नई दुनिया खोजने
जिस के रास्ते उन्होंने देखे थे
सपनों में

पृथ्वी की बंदिशों के खिलाफ
शुरू हो जाता है
सविनय अवज्ञा आंदोलन

कोई समय है
घड़ी की मात्र टिक टिक
कोई समय है
घंटाघर की बीमार टन-टन
पतंगों के साथ उड़ता समय है
आकाश के साथ तटबंधों को तोड़कर
एक धारा में बह जाना

जब कट कर गिरती है एक पतंग
नदी रुक जाती है
और पहाड़ दरक जाते हैं थोड़ा
यह बात बच्चों के सिवा
कोई और नहीं जानता

पुश्तैनी कच्चा मकान

गाँव में था अपना
पुश्तैनी कच्चा मकान
झाड़ियों से घिरी डगर पर
बढ़ता जाता था आगे
उम्र के ढलान पर
अतिरिक्त सावधान यात्री
की तरह

बारिश के दिनों में
भीगे बैल सा सहमा
दुबका रहता था
किसी अनहोनी की आशंका में
आसमान की तरफ देखने से
चुराता आँखें

उसकी गोद में
आँखें बन्द कर छिपे
बहुत बाद पता चलता था हमें
वरुण और पवन के गुंडों का
हाहाकार

अधिक छूट दे देने के अपराध-बोध में
कभी-कभी लगा देता था
अनावश्यक चपत
सीधी मुंडी हमेशा रखने की
करता हुआ ताकी़द

ग्रीष्म में तपती दोपहर सा
जब भी आ धमकता सुबह-सुबह
वसूलने मालगुजारी
तहसीलदार का चपरासी
दौड़कर अन्दर से लाते हम
उसके लिए गुड़ और पानी
इधर-उधर झाँकते
करने लगता घर
दुर्गा सप्तशती का पाठ

अछूत समझकर
लगातार बख्शते
सेंधमार चोरों के
शुक्रगुजार हैं हम
दुनिया की नजर में
बने रहे फिलहाल
एक खाते-पीते घर

वैशाख और जेठ में
महुए की लप्सी
सावन में बनते ठोकवे उसी के
काट देते काठ के दिन
काले पहाड़ सी भादों की रातों में
पकती घनी नींद की कोदों
और नीम के गिरते फलों के बीच
पधारते दिल्ली-लखनऊ से
बड़े-बड़े नेता
बैठे-बैठे चारपाई पर तय करते
रुस और अमेरिका का भविष्य

देश और दुनिया की
बड़ी-बड़ी बातों के रस में डूबा
भूल जाता
गृहस्थी के टाट में
जगह-जगह हुए छेद
अजगर सी लपेटी दुश्वारियों को
प्राणों की सारी शक्ति से छुड़ाता
बीच कहीं सबके-सार्वजनिक
देखने लगता घर
मुंगेरी लाल के हसीन सपने

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