अनुपमा तिवाड़ी की रचनाएँ

आदमी के अन्दर रहता है एक और आदमी 

आदमी के अन्दर
रहता है
एक और आदमी
रहते हैं दोनों
साथ-साथ
पर खूब झगड़ते हैं
चलते रहते हैं
उनके बीच द्वंद्व
उन दोनों को झगड़ते देखा है मैंने
बहुत बार
एक रात तो रात के आदमी ने कह दिया
“देख, जैसे-जैसे तू बूढ़ा होगा,
मैं और, और जवान होऊँगा”
इस बात पर रात भर हुई थी
दोनों के बीच खूब कहासुनी
तब से रात का आदमी रहने लगा था
दिन में चुप-चुप
पर रात तो उसकी अपनी थी न!
मैंने अपने बुज़ुर्गों से सुना था
कि पहले ये दोनों हमेशा साथ-साथ रहते थे
पता नहीं इनके बीच अब ऐसा क्या हो गया
कि दोनों रहने लगे हैं अब
अलग-अलग
दिन का आदमी अब उसे सुनना ही नहीं चाहता
पर रात का आदमी भी कम थोड़े ही है
वो चुप कहाँ रहने वाला है ?
चाहे हार जाए दिन के आदमी से
ओ, रात के आदमी
मैंने सुना है, तुम बहुत ताकतवर हो
तुम लड़ो न,
इस दिन के आदमी से
पता है तुम ही जीतोगे
तुम में बहुत ताकत है यार!
बस तुम बाहर आ कर खड़े हो जाओ
और फिर दिन में भी चलो इस आदमी के साथ
जो घूम रहा है
तुमसे अलग-अलग
फिर देखो आदमी,
आदमी लगने लगेगा

सपना बुनती औरत

एक औरत आईने के सामने बैठ
देखती है, अपने को
भरपूर नज़र से
ये खूबसूरती जो उसे आईने में दिख रही है
वो उसके सपने से बुनी है
वो ऐसी खूबसूरती के सपने और, और बुनना चाहती है
वो ऐसी खूबसूरती के खूब-खूब स्वेटर बुनना चाहती है
जी भर कर पहनना चाहती है, उन्हें
कभी-कभी दुनिया में तिरते खूबसूरती के डिज़ाइन उसकी आंखों में आ कर रुक जाते हैं
वो उन डिजाइनों से फिर नए सपने बुनने लगती है
पर कुछ हाथ उसकी सलाईयां छीन लेना चाहते हैं
उसकी ऊन के गोले को छुपा देना चाहते हैं
जिससे नहीं बुन सके, वो कोई सपना
कुछ आँखें कहती हैं,
क्या स्वेटर बुनना?
‘’बाज़ार में हर तरह का स्वेटर मिलता है,
जाओ और खरीद लाओ’’
पर वो जानती है कि,
जो सपना वो बुनेगी
वो किसी बाज़ार में नहीं मिलेगा
इसलिए वो बुनती है, सपने
वो फिर- फिर बनेगी सपने
वो एक नहीं,
अनंत सपने बुनेगी
वो इस प्रकृति की कृति को और आगे ले जाएगी आसमान तक
वो जानती है
कि, वो कितनी खूबसूरत कलाकृति है और
कला ही कला को गढ़ सकती है
मटमैले हाथ क्या कला रचेंगे?
वो रोक सकेंगे बस एक सपना बुनती औरत को

आदमी

वह देख रहा था
आदमी को,
सही जगह पर पूँछ हिलाते हुए,
और मन ही मन
हीनभावना का शिकार हो रहा था
काश! उसके भी पूँछ होती
तो उसके भी शरीर का संतुलन बन गया होता
यूँ तो पूँछ का बीज
उसके नर्म मिट्टी से बने शरीर में था या नहीं,
उसे खबर नहीं
लेकिन उसे इतना पता है कि
मौसम की शुरूआती गर्म हवाओं ने कुछ ऐसा रंग दिखाया
कि उसके शरीर में पूँछ का बीज होता तो
इन हवाओं के चलते कहाँ अंकुआ पाता?
साइंस कहता है
पूँछ,
शरीर का संतुलन बनाने के काम आती है
उसे अब समझ में आ रहा है
कि उसका शरीर इतना लड़खड़ाता क्यों है?

कुछ क्षणिकाएँ 

1.
मैंने सारे शब्द पढ़ लिए
बस तुम्हारा नाम ही पढ़ने में नहीं आया …
2.
जब भी कुछ टूटता है
कितना कुछ दरक जाता है
भीतर तक.
3.
उम्र के साथ,
प्रेम पकता है.
4.
इससे अच्छा और क्या हो सकता है कि
तुम्हें याद करते हुए, एक कविता रच जाए…
5.
तुम्हें याद करते हैं
चाँद
तारे
नदी
और मैं !
6.
अपने प्रिय का
शहर में होना,
सारे शहर का अपना होना है.
7.
विचारों के शिखर पर
उग आती है
एक कविता …
8.
कैसे कोई किसी के दिल में चुप से आ बैठता है
कि कोई कहता है
तुम्हारे जाने से ये शहर वीरान हो गया है …
9.
धरती से आसमान तक रंगों और रिश्तों की एक बड़ी रेंज है
मैंने दोनों को अपनी बाँहों में भर लिया है…
10.
उसने बाल क्या कटवा लिए
एक शहर हीरो हो गया …
11.
उसने जब से आसमानी साड़ी पहनी है
तभी से आसमान
आसमानी हो गया है …
12.
ये बादल बड़े आवारा होते हैं
कभी – कभी मुझे छू – छू कर निकलते हैं.
13.
वह जो है
उसे वह बने रहने की कीमत कितने मोर्चों पर चुकानी पड़ी है
पर, वो हर कीमत छोटी है
उसका वो होना बहुत बड़ा है.
14.
तुम्हारे समर्थन में
आवाज़ है
या मौन ?
15.
पिता रहते हैं बेटों के पास
पर बेटियाँ ले जाती हैं
आँखों की कोर में उन्हें !
16.
आँखों की कोर में बैठी,
पानी की बूँद
नापती है दूरी,
मेरे और बच्चों के बीच की.
17.
कामकाजी माएँ छोड़ जाती है
अपने बच्चों के पास,
गुड़ियों में धड़कता,
अपना दिल.
18.
वो मुक्त करता गया
वो बँधती गई …
19.
सब मीराओं को
जहर का प्याला पीना पड़ता है…
20.
जीवन में कितने सारे काम,
बिना काम के
काम होते हैं.
21.
सब पत्थरों से मकान नहीं बनते
फिर भी हम कितनी ही बार
बेवजह पत्थर उठाते रहते हैं.
22.
लम्हे,
रास्ते में रोक पूछते हैं,
मेरा हाल
मैं नज़रें चुराकर निकल जाती हूँ…
23.
कितना ही समझाओ इन आँसुओं को
पर, कभी – कभी तो ये अनुशासन तोड़ ही देते हैं…
24.
अब कोई शब्द इधर – उधर नहीं बिखरा हुआ है
मैंने सारे शब्द गुल्लक में डाल दिए हैं …
25.
मकान की मंजिलें
मिट्टी से पैर दूर करती जाती हैं…
26.
आँखें देखती ही नहीं
तोलती भी हैं…
27.
उसने जब भी कुछ पौधे रोपे
पौधे नहीं,
अपनी इच्छाओं के कुछ टुकड़े रोपे.
28.
मन – मन
चुप हैं
पर,
बतिया रहे हैं.
29.
उन्होंने सयाना होना चुना
और सयाना होने की सारी गलियाँ जानने के बाद
हमने, बेवकूफ होना चुना.
30.
बाजार में दोस्त सस्ते में बिक रहे थे
हमने कुछ दुश्मन खरीद लिए.
31.
समझौते के लेखक
तीरकमान नहीं लिखते.
32.
बाजार में सब कुछ मिलता है
पर, सब कुछ कहाँ मिलता है ?
33.
सबके हिस्से के बादल आसमान में थे
मैंने हाथ बढ़ाकर एक टुकड़ा ले लिया है.
34.
आँख मिलाने से कतराते हो
और
गले लगने की बात करते हो ?
35.
किसी आदमी से कोई आदमी
पूरा – पूरा अलग नहीं होता
रह जाता है आदमी के अन्दर
थोड़ा – थोड़ा जाने वाला आदमी.
36.
वो कहते हैं कि,
हम समझते नहीं हैं
पर वो जानते हैं कि,
हम समझते हैं.
37.
उन्होंने हाथ जोड़े
पैर काटे.
38.
ओ, स्त्री !
ये जीवन रंग, कहाँ से झोली में भर कर लाती हो
कि पुरुष की अतल रिक्तता भरने पर भी ये रीतते नहीं !
39.
वो सपना बुनती है
कुछ आँखों में जाला बन जाता है.
40.
कस्बई आँखों में गड़ती है
औरत की बेफिक्र चाल.
41.
कभी – कभी डर लगता है
जब चेहरा उतर कर रुमाल की तरह
हाथ में आ जाएगा
और हाथ – पैर
कहना मानने से मना कर देंगे …
42.
मेरी कलम में रहते हैं
हरसिंगार जैसे कोमल, महकते
और कैक्टस जैसे नुकीले, धारदार शब्द !

ईश्वर होने का अर्थ… 

ईशनिंदा शब्द ही जैसे अपराधी शब्द है.
ईश, विनम्र होने की तो हम इंसानों से भी आशा की जाती है
धैर्य का पाठ तो हमें भी सिखाया जाता है
सहनशीलता की तो हमसे भी अपेक्षा की जाती है
पर ईश, क्या तुममें,
हम जितनी भी विनम्रता नहीं ?
हम जितना भी धैर्य नहीं ?
हम जितनी भी सहनशीलता नहीं ?
क्यों, तुम्हारे नाम पर आसिया बीवी को जेल में वर्षों सड़ना पड़ता है ?
क्यों, तुम्हारे नाम पर तस्लीमा, अपनी मिट्टी से निर्वासित कर दी जाती है ?
क्यों, तुम्हारे नाम पर रुश्दी पर फ़तवा घोषित कर दिया जाता है ?
क्यों, धर्म की साजिशों के चलते अख़लाक को मार दिया जाता है ?
क्यों, हँसते – खेलते बेक़सूर माजिद को अपनी जिन्दगी से हाथ धोना पड़ता है ?
क्यों, कबीर आँखों की किरकिरी बनते हैं ?
क्यों, तुम्हारे दरबार में हम स्त्रियाँ नहीं आ सकतीं ?
क्यों, दलित नहीं आ सकते ?
क्यों, विधर्मी नहीं आ सकते ?
ये तुम्हारे “कण – कण में भगवान हैं”
का क्या मतलब है ?
“हम सब ईश्वर की संतान हैं”
का क्या मतलब है ?
मैं नहीं जानती इनके अर्थ,
तुम बताओ ?
बताओ तो सही ?
कोई तो बताओ इनके अर्थ ?
मैं जानती हूँ तुम नहीं बता सकोगे इनके अर्थ.
तुममें नहीं आएगी इतनी विनम्रता,
कि तुम अपनी निंदा सुन सको.
रोक सको कभी मंदिर – मस्जिद से बाहर निकलकर,
रोज़ हो रहे खून खराबे को
जो दे सको आदमी को आँख खोल कर देखने और मुँह खोलकर कहने की आज़ादी
नहीं होगा न तुमसे !
तो सुनो,
मेरा भी नाम लिख लो तुम्हारी निंदा में.
मुझे अच्छा लगता है ईशनिंदा शब्द !

सच से मुलाकात

साफ़-सुथरे सच,
मुझे याद है
जब तुम घनी भीड़ से निकलकर
आ खड़े होते थे
मेरे दरवाज़े पर
और बुलाते थे मुझे
बार-बार
मैं तो बस तुम्हें देख ही पाती थी
टुकुर-टुकुर!
सच, तुम जिन पंजों से घिरे थे
वे कालिख पुते को सच कहते थे
पर सच, मैं तुम्हें पहचान पा रही थी न!
भीड़ में भी, अकेले में भी
याद है हम कितना बतियाए थे
मन ही मन!
सच, तुम्हारे पास आने का मतलब था
हौंसले से लबालब होना
जो मुझमें किसी राख के ढेर के नीचे दबे
अंगारे की तरह था
और ये सब तुम जानते थे न, सच!
तभी तो तुमने मेरे लिए बाहें फैला दीं
मैं तो चाहती ही थी कि तुमसे मिलूँ
देखो न,
तुमसे मिलकर मैं कितनी सुन्दर हो गई हूँ
अब शायद तुमसे अलग हो कर जी नहीं पाऊँगी
सच, पर तुम्हारा रास्ता बड़ा कठिन है यार!
मेरे तो कभी-कभी काँटे चुभ जाते हैं
और सुनो कभी-कभी तो आँसू भी आ जाते हैं

आईना भीगता है 

स्याह, काले बादल
उतर आते हैं
आईने में
शाम होते-होते उमड़ने लगते हैं
आँखों में
रात के धुंधलके में
फट पड़ते हैं बादल
भीगता है आईना
रात-रात भर
सहरों, सहर बाद
फूटती हैं कुछ कोंपलें
और ढक लेती हैं
अपनी हथेलियों से
आईने को
पर पेड़ हैं कि
उगते जाते हैं
कटते जाते हैं
काले बादल
फिर-फिर आते हैं
आईना भिगोते जाते हैं

जूते

            1
मुझे मेरे नाप के जूते नहीं मिलते
और तुम,
अपने बनाए जूते बदलने को तैयार नहीं
बताओ,
तुम मेरे नाप के जूते बना सकते हो
या
मैं अपने पैर कटवाऊँ?

2

बहुत समय से ढूँढ़ रही हैं
मेरी आंखें,
अच्छे जूतों की दुकान
लेकिन कहीं चमड़ा ठीक नहीं
कहीं केनवास ठीक नहीं
तो कहीं उनकी बनावट ठीक नहीं
मुझे कोई दुकान नहीं दिखी
जिसमें मेरे पैरों के नाप और मन के मुताबिक जूते मिलें
पर, नंगे पैर कैसे रहूँ?
कभी-कभी तो यूँ ही खीजती रहती हूँ अपने पैरों पर
कि ये इतने एड्ड-बड्ड क्यों हैं?
जो किसी जूते में फिट नहीं होते

3
माना कि पैर पहले आए
और
जूते बाद में
लेकिन, अब जूते पैरों से पहले बाज़ार में आ जाते हैं
तो कई बार जूते फिट
और
पैर अनफिट हो जाते हैं

4

बहुत से लोगों के पैरों में,
चमकीले जूते देख
मैं भी पहुँच गई एक दिन,
भरे बाज़ार की बड़ी-बड़ी दुकानों पर
वैसे ही चमकीले जूते खरीदने
पर उन्हें छू कर देखा तो पाया कि वो जूते,
हड्डी, मांस, खून और मन से नहीं बने थे
उनकी तो बस त्वचा ही चमकीली थी
उस दिन के बाद मैं कभी नहीं गई ऐसी दुकानों पर
क्योंकि
खाली चमकीले जूते,
मेरा कितने दिन साथ देते?

पागलों के लिए कोई जगह नहीं 

पागलों का कोई,
घर नहीं होता
पागलों का कोई,
गाँव नहीं होता
पागलों का कोई,
देश नहीं होता
कोई हक़ नहीं जमाता पागलों पर
फिर भी पागल अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवाते हैं
किसी न किसी गाँव में / शहर में / देश में.
पागल गाँव में होते हैं तो बच्चे,
उन्हें पत्थर मारने का मज़ा लेते हैं
घरों / दुकानों के सामने से वे दुत्कार दिए जाते हैं
पर, शहर बड़े सभ्य होते हैं
यहाँ के न पुरुष, न महिलाएँ और न बच्चे उन्हें तंग करते हैं
यहाँ कोई पत्थर नहीं मारता उन्हें
कोई देखता तक नहीं उन्हें
वो मुट्ठी भर – भर गालियां फेंकें,
दिन भर बड़ – बड़ करते फिरें,
तब भी कोई नहीं देखता उन्हें
सब, आंखें चुराते हुए जल्दी से गुज़र जाना पसंद करते हैं,
इनके पास से
कौन मुँह लगे इनके ?
शहरों में पागल पुरुष तो किसी भी काम के नहीं होते
अलबत्ता औरतें, दिन में कितनी ही बदसूरत या पगली कहलाएँ
पर, रात के अंधेरों में वहशी आँखों द्वारा मौका पाते ही खींच ली जाती हैं
और फिर भरी जून में कम्बल में लिपटी,
बड़े – बड़े, ऊबड़ – खाबड़ सख्त जूते पहने
लूले हाथ की गूँगी पगली औरत,
दिखती है मुझे, पूरे नौ महीने से.

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