अनुपम सिंह की रचनाएँ

हम औरतें हैं मुखौटे नहीं

वह अपनी भट्ठियों में मुखौटे तैयार करता है
उन पर लेबुल लगाकर, सूखने के लिए
लग्गियों के सहारे टाँग देता है
सूखने के बाद उनको अनेक रासायनिक क्रियाओं से गुज़ारता है
कभी सबसे तेज़ तापमान पर रखता है
तो कभी सबसे कम
ऐसा लगातार करते रहने से
उनमे अप्रत्याशित चमक आ जाती है ।

विस्फोटक हथियारों से लैस उनके सिपाही घर -घर घूम रहे हैं
कभी दृश्य तो कभी अदृश्य
घरों से उनको घसीटते हुए
अपनी प्रयोगशालाओ कीओर ले जा रहे हैं
वे चीख़ रही हैं, पेट के बल चिल्ला रही हैं
फिर भी वे ले जाई जा रही हैं ।

उनके चेहरों का नाप लेते समय
ख़ुश हैं वे
आपस मे कह रहे हैं कि
अच्छा हुआ इनका दिमाग नहीं बढ़ा

इनके चेहरे, लम्बे-गोल, छोटे-बड़े हैं
लेकिन वे चाह रहे हैं कि सभी चेहरे एक जैसे हों
एक साथ मुस्कुराएँ
और सिर्फ़ मुस्कुराएँ
तो उन्होने अपनी धारदार आरी से
उन चेहरों को सुडौल
एक आकार का बनाया

अब मुखौटों को उन औरतों के चेहरों पर
ठोंक रहे हैं वे
वे चिल्ला रही हैं
हम औरते हैंं
सिर्फ़ मुखौटे नहीं

वह ठोंके ही जा रहे हैं
ठक-ठक लगातार
और अब हम सुडौल चेहरों वाली औरतें
उनकी भट्ठियों से निकली
प्रयोगशालाओं में शोधित
आकृतियाँ हैं ।

हमारे गाँव की विधवाएँ

उधध रंगों में लिपटी औरतें
हमारे गाँव की विधवाएँ हैं।
हमारी दादियाँ चाचियाँ माएँ हैं
जवान भाभियाँ, बहनें हैं
जो उजाड़ ओढ़ अन्धेरे में
सिसकियाँ भर रही हैं।

ज्ञान की खोज में जब पोते-पोतियाँ
कहीं दूर जा रहे होते हैं
तो विधवा दादियाँ दूर से ही
अपना प्रेमाशीष हवा में छोड़ देती हैं।

विधवाएँ टूटी हुई बाल्टियाँ हैं
जिसमें सगुन का जल नहीं भरा जाता।
विधवा हुई माएँ बेटियों के ब्याह में
अपने आंचल से उनका सिर नहीं ढकतीं
बस हारी आँखों से उन्हें निहारती रहती हैं।
मन ही मन क्षमा माँग लेती हैं माएँ
विदा होती बेटियों से
और न जाने किन जंगलों में खो जाती हैं।

शुभ कार्यों से बेदख़ल विधवाएँ
मंगलाचार को रुदन के राग में गाती हैं।
हमारे गाँव की विधवाएँ और बिल्लियाँ एक जैसी हैं

बहुवर्णी स्त्रियाँ कब बनीं विधवाएँ
बिल्लियों में किसने भरे ये रंग
न विधवाएँ जान पाती हैं
न ही बिल्लियाँ।

एक सुबह ऐसी भी

सुबह से मची थी अफ़रातफ़री
बेरहमी से
दो फाड़ हो रही थीं चीज़ें ।

तुच्छ चीज़ों के लिए
मुलायम चेहरों पर झलका था
कसैलापन
हवा एकदम रुक्ष थी
चौकन्ने थे खूँटे पर बैल
कान पारे खड़ा था कुत्ता
गायें पूछ रही थीं मानो
आखिर ! किस दरवाज़े बान्धी जाऊँगी ।

बच्चे अकबकाए हुए थे
जैसे पहली बार देखी हो सनकी हवाएँ
जिसने उजाड़ दिए घरौन्दे उनके
हवाओं के रुख पर
खींची गईं दीवारें
दीवारों में क़ैद हो गया
उनका उत्साही स्वर, हो-हल्ला
बच्चों के बोलने में
बढ़ने के बजाय
घट गए शब्द ।

हकलाहट के गीत गाते
बड़े हुए वो बच्चे
भेदने की हद तक घूर रही थीं
उधार के पानियों वाली आँखें
बुरादे-सी भुरभुरी उनकी सम्वेदनाएँ
जल उठीं अँगीठियों में ।

शक के लाल घेरे में बनता-बिगड़ता
उभरा था एक बूढ़े का प्रतिबिम्ब
एक पुराना बाकस
खोला गया लालची उम्मीदों से
चारपाई पर दम तोड़ती
काँपी थी एक मरियल आवाज़
काँपते हुए उठे थे हाथ ।

न अभिशाप
न आशीर्वाद
जीवन अनुभव से पैदा शान्ति
पुरखों की सब चीज़ें बाँट लो
लो हड़प लो हण्डा
लोग सबकुछ छोड़
दौड़े आँगन की ओर
दो उजरी धोतियाँ
एक पुराना ट्राँजिस्टर और
काग़ज़ों में लिपटी पुरानी गन्ध
बन्द थी बाकस में रहस्य-सी ।

तब निराशा की भद्दी तुकबन्दियों में
बौखला उठे लालची लोग
औरतें भी जल्दी में थीं
इकठ्ठा कर रहीं थीं
मायके से विदा में मिली
छोटी-बड़ी सब चीज़ें
थार, परात, गगरा
लोटा,थाली, कजरौटा ।

बस, इन्हीं चीज़ों पर
था इनका अख़्तियार
फुसफुसाहट व्यक्त हुई
एक अश्लील विचार की तरह
कि दसरथ के घर इस बार
सीता और रुक्मिणी का नहीं
सुपनखा का डोला घूमा है
यही है बँटवारे की जड़
इन्हीं के पेट मडार हैं
नहीं भरते ।

जबकि उनकी देह पर नहीं था
तोला भर अधिक मांस
दूर से ही दिखाई देता
उनका पीला डरावना दाँत
ढकर-ढकर करती आँखोंवाली
ये औरतें,
कमज़ोर पक्ष थीं बँटवारे का ।

बँटवारा रोकने की
करने को कोई भी बँटवारा
सामर्थ्य नहीं थी इनमें
फिर भी बँटवारे का पहला लाठा
चला इन्ही की पीठ पर
कहाँ बेईमानियाँ हुईं
कहाँ बरती गईं ईमानदारियाँ
पता नही, फिर भी सीलबन्द मुहरें
जड़ी गईं इनके माथे पर ।

इन्ही को बनाया गया नाक का सवाल
इन्ही पर लगाई गईं तोहमतें
ये क्या-क्या थीं
थीं कहाँ-कहाँ
ख़ुद इन्हें मालूम नहीं
बँट रही थी इँच-इँच ज़मींन
मुट्ठी-मुट्ठी अनाज
हरा पेड़
खड़ी खेती

बँट रहा था
चुटकी-चुटकी दुःख
चुटकी भर स्वार्थ के लिए
लेकिन चुटकी से ज़्यादा
हिस्से नही आया नमक
जहाँ सीझतीं थीं रोटियाँ
जहाँ सोन्धे भात की महक से
खनकती थीं थालियाँ
उस जलते हुए चूल्हे में
झोंक दी गईं लाल मिर्चें
यह कोई टोटका नहीं
मिर्चोंवाला ज़हरीला धुआँ
अब भी बरसता है
काले और भूरे बादलों संग ।

रोटियाँ 

उम्र के सातवें साल में
गोल रोटियाँ नहीं बेल पाती थीं हम
दादी की तरह हाथ से ही
रोटियाँ पलटने का हुनर नहीं था हममें
रोटी बेलते समय
ख़ाली तवा जलता रहता
हम इतनी सधी हुई नहीं थीं
कि समय का ठीक से संयोजन कर सकें

जब बेलने सेकने और ख़ाली रह जाने का
हिसाब नहीं लगा पाती थीं हम
तब हमारी अँगुलियाँ
रगड़ दी गईं
खाली जलते तवे पर
कि हम जल्दी-जल्दी रोटियाँ बेल सकें
कि झटापट रोटियाँ उलट सके तवे पर
चिमटे के इन्तज़ार में बैठी न रहें
डरती न रह जाएँ अँगुलियाँ जलने से
कि हम दादियों जैसी हुनरमन्द हो जाएँ
चौके पर मेहमान को
पहुँचती रहें बिना जले रोटियाँ

सच ! हमने सीख लिया है
ख़ूब अच्छी तरह गोल रोटियाँ बनाना
रोटियों के साथ ही सीझ गई
बचपन कि इच्छाएँ
परोस दिया गर्म रोटियों के साथ
थालियों में।

तुम्हारा छूना

मत छुओ इस तरह बार- बार
तुम्हारे छूने से
मैं गल कर राँग हो जाती हूँ
कहीं अन्दर ही अन्दर
यह जानते हुए भी
की तुम्हारा छूना एक छलावा है

यह भी पता है की तुम्हारे इस छलावे
और अपने घुलते जाने की अन्तिम अवस्था मे
कुछ भी शेष नहीं रह जाऊँगी
फिर भी अच्छा लगता है तुम्हारा छूना

तुमको पाने की ललक
मेरी कोई स्नायविक कमजोरी नहीं
अपने को पाने और बचाए रखने की
अन्तिम कोशिश है।

एक तलैया की याद में 

गाँव के बीचों-बीच
लहराती थी एक तलैया
जेठ की दुपहरिया में
ठण्डी हवा बनकर ।

उसकी पीठ पर ऐसे स्वर होते
बच्चे जैसे दादी से कह रहे हों
मेला चलने के लिए ।

भैंसें चली आतीं नहाने
अपना कुनबा लिए
मुँह बोर-बोर नहातीं
सगी बहनों-सी भेटती
एक-दूसरे से ।

लड़कियाँ हर साँझ आतीं किनारे पर
बतियातीं
उनकी बातों को सुन-सुन हंसती रही वह
कभी शिकायती नहीं हुई
उनके पिताओं से ।

रात होते ही खरहे
दिन की लुका-छिपी
डर-भय भूल
आते उसके पास
उसे सलामी देते
फिर पीते पेट भर पानी ।

लौट आती
तुनक कर चली गई खिचुही
लोमड़ी, सियारिनें आतीं
पानी पीतीं, दम भरतीं
मछलियों से बाते करतीं
फिर आने को कह
लौट जातीं अपने बच्चों के पास ।

जिन पेड़ों को उसने सींचा था
बड़ा किया था
बिना एहसान जताए
वे गजब के समझदार थे
बिना थके छाया करते रहे उस पर ।

चिड़ियों के बच्चे जब चीं..चीं..कर गला फाड़ते
चिड़िया झिझक-झिझक कर
माँगती दो बून्द पानी
चिड़िया की झिझक से
लाल-पीली हो तलैया
चली जाती उस किनारे
कि तुम दो बून्द पानी के लिए
क्यों शर्मिंदा करती हो मुझे

तब चिड़िया कहती –
‘बहन दो बून्द पानी की क़ीमत पर ही
ज़िन्दा रहेंगे हमारे बच्चे’
चिड़िया की बात सुन
नम हो जाती मछलियों की आँखें
वे फिर-फिर भर जातीं आभार से
इस तरह मज़बूत होता
उनके बीच भरोसे का पुल ।

तलैया अपनी आत्मा पर कोई कलुष लिए बिना
रात-दिन
साँझ-दोपहर
सबको पिलाती रही पानी ।

मेंढ़क, कछुए, मछलियाँ
उसकी रसोईं में भोजन कर
सोते उसी की तलहटी में
तितिलियाँ उड़ते-उड़ते
धप्पा कर जातीं उसकी पीठ पर ।

हम जो मनाते रहे अपना त्यौहार
बान्धते रहे एक दूसरे से गिरह
हम जो धरती के छाती पर लगाते रहे
बारूद का ढेर
और नदियों की पीठ पर
पाँव का निशान छोड़ विजयी हुए
हम जो इतराते रहे अपने कर्ता
और निर्माता भाव पर
सोखते रहे उसकी आत्मा का जल
बिना क्षमाभाव के
और ख़ाली होती रही वह बिना शिकायती हुए ।

एक दिन जब
चटकने-चटकने को हुई उसकी आत्मा
उसने समेट लिया अपना असमय बुढ़ापा
और दूर जाकर बिखेरी अपनी क्षार
कि जिससे सुखी रहें वे बच्चे
जो सवार हुए थे उसकी पीठ पर
कि उन लड़कियों को लग न जाय
असमय बुढ़ापे का रोग ।

जब गाँव छोड़कर चली गई वह तलैया
गाँव के किनारे पर सर पटक
फेकरने लगी सियारिने
भैंसों ने सूनी आँखों से दूर तक निहारा उसे
पेड़ों को बुखार चढ़ा उत्तप्त हो गईं उनकी सांसें
भरोसा टूट गया चिड़ियों का
बेघर हो मरी मछलियाँ
कछुए, मेंढ़क, खरहे
लोमड़ियाँ, सियारिनें
सब छोड़कर चले गए गाँव ।

एक बार जब आग लगी उसी गाँव में
लोग नहीं छटका पाए
खूँटे से अपनी भैंसे
अपने जानवर
आग लगे छप्परों के गुर्रे काटे गए
फिर भी नहीं बचा उनका घर
गुहार लगाती औरतों के मुँह फेफरी पड गई
बच्चे आग से ऐसे सहमे
कि जीवन भर उबर न पाए ।

घर जले
खूँटें, पगहे और गायें जलीं
बुधनी की बकरियाँ जलीं
खेत-खलिहान जले
रमई काका की दुकान जली
झुलस गए सब पेड़
औरतें ज़ार-ज़ार हो रोईं
कि कूची, बढ़नी सब जल गईं
बून्द भर पानी न मिला बुझाने को आग ।

गाँव की दशा-दिशा देखने पुरोहित बुलाए गए
मन्त्र पढ़े गए
कुएँ पूजे, जगतें पूजीं ,
ताल-तलैया उसके किनारे पूजे
गाँव भर की औरतों ने अर्घ्य दिया
गँगा से आँचर पसार कहा –
‘हे गंगा ! हमारी इस तलैया में जल भर दो
हे सागर के पुरखों का उद्धार करने वाली गंगा !
हमारे बच्चों को
हमारी फ़सलों को
हमारी भैसों, गायों, बैलों की
आँखों में यह जो आग जल रही है, बुझाओ, माँ !

औरतें गँगा से
अपनी उस तलैया से
लौट आने के लिए
फिर से लहराने के लिए
कहती रह गईं
गँगा न लौटी ।

कहते हैं, जैसे सियारिनें फेकर कर मार गईं
वैसे ही फेकरती रह गईं औरतें
जब से सूखी वह तलैया
जब से चटकी उसकी आत्मा
वह दरार कभी न भर पाई
तब से वहाँ, बस, कहर ही बरसा है ।

माएँ 

पिताओं के
मर जाने के बाद
माँओं की शामें
लम्बी और उदास हो जाती हैं

उनके पास बचती है
सिर्फ़ एक गठरी
जिसमेँ समय-समय के
संघर्षों का हिसाब होता है
उसी गठरी मेँ एक छोटी पोटली रहती है
जिसमें पिताओं द्वारा
मारे गए थप्पड़ों का भी
बचा हुआ हिस्सा रखा रहता है सहेज कर
थोड़ा सासुओं के अत्याचार
और ननद की ईर्ष्या होती है
जेठानियों के गहनों का नाम भी रहता है कोने मेँ

माँयेँ बताती हैं कि
अपनी चारों अँगूठियाँ
अपनी ननदों को बेटे की छटठी मेँ
काजर लगाने पर दे दिया था
शाम को जब माँयेँ कभी अकेले मेँ भी
वह गठरी खोलतीं हैं
तो सबसे पहले अपनी नसीब को कोसते
कोंख को धिक्कारते हुए
पिताओं को खूब गलियाँ देतीं हैं

लड़कियाँ जवान हो रही हैं 

हम लड़कियाँ बड़ी हो रही थीं
अपने छोटे से गाँव में
लड़कियाँ और भी थीं
छोटी अभी ज़्यादा छोटी थीं
जो बड़ी थीं वे
ब्याह दी गई थीं सही सलामत

इस तरह हम ही लड़कियाँ थीं
जिनकी उम्र बारह-तेरह की थी
हम सड़कों के बजाय
मेड़ों के रास्ते आती-जातीं
चलती कम
उड़ते हुए अधिक दिखतीं

गाँव मे नई-नई ब्याह कर आईं
दुल्हन हुईं लड़कियों की भी
सहेलियाँ बन रही थीं हम
किसी के शादी-ब्याह में
हम बूढ़ी और अधेड़ उम्र की
स्त्रियों से अलग बैठतीं
और अपने ज़माने के गीत गातीं
हमारी हंसी गाँव में भनभनाहट की तरह फैल जाती

गाँव के छोटे भूगोल में
हमारे जीवन के विस्तार का समय था
अब हम सब अपने देह के उभारों के अनुभव से
एक साथ झुककर चलना सीख रही थीं
कभी तो जीवन को
हरे चने के खटलुसपन से भर देती
तो कभी माँ की बातों से उकताकर
आधे पेट ही सो जाती थीं

हम उड़ना भूलकर
अब भीड़ में बैठना सीख रहीं थीं
भीड़ से उठतीं, तो कनखियों से
एक दूसरे को पीछे देखने के लिए कहतीं
जब कभी हमारे कपड़ों में
मासिक धर्म का दाग लग जाता
तो देह के भीतर से लपटें उठतीं
और चेहरे पर राख बन फैल जाती

हम दागदार चेहरे वाली लड़कियाँ
उम्र के कच्चेपन में सामूहिक प्रार्थनाएँ करतीं
हे ईश्वर – बस हमारी इतनी-सी बात सुन लो
हम लड़कियाँ, अनेक प्रार्थनाएँ करती हुई
जवान हो रही थीं ।

लड़कियाँ जवान हो रही थीं
उनके हिस्से की धूप, हवा, रात
और रोशनियाँ कम हो रहीं थीं
अब हम बाग़ में नहीं दिखतीं
गिट्टियाँ खेलते हुए भी नहीं

हम घरों के पिछवारे
लप्प-झप्प में
एक दूसरे से मिल लेती हैं
दीवार से चिपक कर ऐसे बतियातीं
जैसे लड़कियाँ नहीं छिपकलियाँ हों हम

घरों के बड़े कहीं चले जाते
तब बूढ़ी स्त्रियाँ चौखट पर बैठ
हमारी रखवाली करतीं और
किसी राजकुमार के इन्तज़ार
और अनिवार्य हताशा मे
हरे कटे पेड़ की तरह उदास होतीं हम
लड़कियाँ जवान हो रही हैं ।

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