अब्दुल ग़फ़ूर ‘शहबाज़’ की रचनाएँ

अंजाम ख़ुशी का दुनिया में सच कहते

 अंजाम ख़ुशी का दुनिया में सच कहते हो ग़म होता है
साबित है गुल और शबनम से जो हँसता है वो रोता है

हम शौक़ का नामा लिखते हैं के सब्र ऐ दिल क्यूँ रोता है
ये क्या तरकीब है ऐ ज़ालिम हम लिखते हैं तू धोता है

है दिल इक मर्द-ए-आख़िर-बीं अपने आमाल पर रोता है
गर डूब के देखो अश्क नहीं मोती से कुछ ये पिरोता है

घर इस से इश्क़ का बनता है दिल सख़्ती से क्यूँ घबराए
शीरीं ये महल उठवाती है फ़रहाद ये पत्थर ढोता है

ठुकरा कर नाश हर ईसा कहता है नाज़ से हो बरहम
उठ जल्द खड़े हैं देर से हम किन नींदों ग़ाफ़िल होता है

हम रो-रो अश्क बहाते हैं वो तूफ़ाँ बैठे उठाते हैं
यूँ हँस हँस कर फ़रमाते हैं क्यूँ मर्द का नाम डुबोता है

क्या संग-दिली है उल्फ़त में हम जिस की जान से जाते हैं
अनजान वो बन कर कहता है क्यूँ जान ये अपनी खोता है

ले दे के सारे आलम में हम-दर्द जो पूछो इक दिल है
मैं दिल के हाल पे रोता हूँ दिल मेरे हाल पे रोता है

दुख दर्द ने ऐसा ज़ार किया इक गाम भी चलना दूभर है
चलिए तो जिस्म-ए-ज़ार अपना ख़ुद राह में काँटे बोता है

वो उमंग कहाँ वो शबाब कहाँ हुए दोनों नज़्र-ए-इश्क़-मिज़ा
पूछो मत आलम दिल का मेरे नश्तर सा कोई चुभोता है

बूँद अश्कों से अगर लुत्फ़-ए-रवानी माँगे 

 बूँद अश्कों से अगर लुत्फ़-ए-रवानी माँगे
बुलबुला आँखों से ख़ूना-बा-फ़िशानी माँगे

बहर-ए-उल्फ़त में चला है तो पहले मस्तूल
तीर से आह के कश्ती-ए-दुख़ानी माँगे

नुक्ता-ए-वस्ल दम-ए-अर्ज़ क़लम पर रक्खे
बोसा चाहे तो लब-ए-शौक़ ज़बानी माँगे

ता-क़यामत दिल-ए-बेदार सुनाए हर रोज़
ख़्वाब-ए-राहत तेरा गर रोज़ कहानी माँगे

दिल तो दिल अफ़ई-ए-गेसू वो बला है काफ़िर
इस का काटा कोई अफ़आ भी न पानी माँगे

तेरे क़दमों की ब-दौलत है निशाँ तुर्बत पर
इस से बढ़ कर कोई क्या मर के निशानी माँगे

उस जवाँ के ग़म-ए-हिज्राँ ने किया है बूढ़ा
ख़िज़्र भी देख के जिस बुत को जवानी माँगे

चाह में उस मह-ए-नख़शब के शब ओ रोज़ हैं ग़र्क़
क़ाज़ जिस का मह-ए-कनआँ से शबानी माँगे

ख़ारिज इम्काँ से है ‘शहबाज़’ शहीदों का शुमार
कोई किस किस के लिए मर्सिया-ख़्वानी माँगे

है इश्क़ तो फिर असर भी होगा

 है इश्क़ तो फिर असर भी होगा
जितना है इधर उधर भी होगा

माना ये के दिल है उस का पत्थर
पत्थर में निहाँ शरर भी होगा

हँसने दे उसे लहद पे मेरी
इक दिन वही नौहा-गर भी होगा

नाला मेरा गर कोई शजर है
इक रोज़ ये बार-वर भी होगा

नादाँ न समझ जहान को घर
इस घर से कभी सफ़र भी होगा

मिट्टी का ही घर न होगा बर्बाद
मिट्टी तेरे तन का घर भी होगा

ज़ुल्फ़ों से जो उस की छाएगी रात
चेहरे से अयाँ क़मर भी होगा

गाली से न डर जो दें वो बोसा
है नफ़ा जहाँ ज़रर भी होगा

रखता है जो पाँव रख समझ कर
इस राह में नज़्र सर भी होगा

उस बज़्म की आरज़ू है बे-कार
हम सूँ का वहाँ गुज़र भी होगा

‘शहबाज़’ में ऐब ही नहीं कुल
एक आध कोई हुनर भी होगा

कहा नसीब ज़मुर्रद को सुर्ख़-रूई ये

कहाँ नसीब ज़मुर्रद को सुर्ख़-रूई ये
समझ में लाल की अब तक हिना नहीं आई

ख़जिल है आँखों से नर्गिस गुलाब गालों से
वो कौन फूल है जिस को हया नहीं आई

उमड़ रहा है पड़ा दिल में शौक़ ज़ुल्फ़ों का
ये झूम झूम के काली घटा नहीं आई

हो जिस से आगे वो बुत हम से हम-सुख़न वाइज़
कहीं हदीस में ऐसी दुआ नहीं आई

ज़बाँ पे उस की है हर दम मेरी बला आए
बला भी आए तो समझो बला नहीं आई

शब-ए-फ़िराक़ का छाया हुआ है रोब ऐसा
बुला बुला के थके हम क़ज़ा नहीं आई

नज़र है यार की ‘शहबाज़’ कीमिया-तासीर
पर अपने हिस्से में ये कीमिया नहीं आई

न अपना बाक़ी ये तन रहेगा न तन में

 न अपना बाक़ी ये तन रहेगा न तन में ताब ओ तवाँ रहेगी
अगर जुदाई में जाँ रहेगी तुम्हीं बताओ कहाँ रहेगी

मिज़ा के तीरों से छान दिल को जो छाननी हो निगह को गहरी
खिंची हुई दिल से कब तलक यूँ तेरी भवों की कमाँ रहेगी

ख़ुदा ने मुँह में ज़बान दी है तो शुक्र ये है के मुँह से बोलो
के कुछ दिनों में न मुँह रहेगा न मुँह में चलती ज़बाँ रहेगी

बहार के तख़्त ओ ताज पर भी गुलों को रोते ही हम ने देखा
के गाड़ कर ख़ार ओ ख़स का झंडा चमन में इक दिन ख़ज़ाँ रहेगी

दिखाएगा अपना जब वो क़ामत मचेगी याँ तरफ़ा इक क़यामत
न वाइज़ों में ये ज़िक्र होगा न मस्जिदों में अज़ाँ रहेगी

बजेगा कूचों में यूँही घंटा अज़ाँ यूँही होगी मस्जिदों में
न जब तलक उन को तू मिलेगा तमाम आह ओ फ़ुग़ाँ रहेगी

न देंगे जब तक निगह को दिल हम क़रार हासिल न होगा दिल को
कभी न हम साँस ले सकेंगे उड़ी हुई इक सिनाँ रहेगी

ज़बाँ पे ‘शहबाज़’ की हैं जारी मदाम शीरीं-लबों की बातें
ख़ुदा ने चाहा तो नोक-ए-ख़ामा हमेशा रत्ब-उल-लिसाँ रहेगी

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